Wednesday, 6 November 2013

0-425-"आंसू समझने की भूल

आंसू समझने की भूल न करो, जो आँखों से निकल रहें हैं,
ये बरसों पुराने गम हैं, जो अब जाकर बाहर निकल रहें हैं.
और कब तक सम्भालूँ मै इनको अपनी बेगुनाह आँखों में,
जिन्होंने दिए थे, वो भी अब मेरी जिंदगी से निकल रहें हैं. ..(वीरेंद्र)/0-425


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Tuesday, 5 November 2013

1-413-"आजाओ मेरी अँधेरी ज़िन्दगी

आजाओ मेरी अँधेरी ज़िन्दगी में तुम रौशनी की तराह,
अमावस में मानो छा जाए उजियारा, चांदनी की तराह...(वीरेंद्र)/1-413

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-412-" कबसे लगाए बैठा

कब से लगाये बैठा था उम्मीद आसमान में उजियारे की,
तुमने खोलके भीगी जुल्फें, उमीदों पे मेरी पानी फेर दिया...(वीरेंद्र)/1-412

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-411-"उसकी जुल्फों को हवाओं ने

उसकी जुल्फों को हवाओं ने ऐसा बिखेर दिया,

हसरत-ऐ-दीदार पर मेरी, पानी सा फेर दिया...(वीरेंद्र)/1-411


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-270-"तुम्हारे नेह का याचक

तुम्हारे नेह का याचक मै,
अंतहीन इच्छाओं का नहीं,
सौगात यदि मिले मुझे तो,
बस प्रेम की मिले अन्य नहीं,.(वीरेंद्र)/2-270

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-936-"तुम जब भी आना इंसान बनके

तुम जब भी आना इंसान बनके आना ज़िन्दगी में,
फ़रिश्ता बनके अबतक जो आये, रिश्ता न जोड़ पाए  ...(वीरेंद्र)/१-९३६

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Monday, 4 November 2013

0-351-"अपनी रौशनी से मैंने

अपनी रौशनी से मैंने दूर किये अँधेरे तुम्हारे, खुद को जला कर,

सहर होने पर तुमने फ़ेंक दिया मुझे, बुझा हुआ दीया बता कर,

सहर देगी साथ तुम्हारा चंद घंटों को, आएगी मेरी याद फिरसे,

उठा लेना मुझे, रौशनी दे दूंगा तुम्हे, फिरसे खुद को जला कर..(वीरेंद्र)



रचना: वीरेंद्र सिन्हा ('अजनबी')/0-351

0-391-"उसके साथ लड़ाई मुझे

उसके साथ लड़ाई मुझे बहुत भाती है,
मेरी व् उसकी भड़ांस निकल जाती है,
जितनी भी ज्यादा वो लडती है मुझसे,
उतनी ही अधिक पहलू में आ जाती है. ...(वीरेंद्र)/0-391

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-937-"तूने मुझसे प्यार किया, जबतक

तूने मुझसे प्यार किया, जब तक तुझे ज़रुरत थी,
राहों में मेरा साथ दिया, जब तक तुझे फुरसत थी,
मुझे अब नहीं ज़रुरत, न रही फुर्सते-इश्क तुझसे,
अब वो दौर ही ख़त्म जब मुझे तुझसे मुहब्बत थी...(वीरेंद्र)/१-९३७

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")
 

2-240-"आपकी कलम से जो झाड़ते

आपकी कलम से जो झड़ते हैं शब्दों के मोती,
वो सारे के सारे यह कागज़ ही समेट लेता है,
हमतो बस रह जाते हैं वंचित इन मोतियों से,
प्रथम प्रसाद रचना का, कागज़ ही लेलेता है. ..(वीरेंद्र)/2-240

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-338-"मेरे मन तुझपे अन्याय

मेरे मन तुझ पे अन्याय कर रहा हूँ मै,
हरेक घडी तुझे कमज़ोर कर रहा हूँ मै,
तेरे बहते आंसुओं को नज़रंदाज़ करके,
बेवफाओं से ही वफादारी कर रहा हूँ मै...(वीरेंद्र)/0-338

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-102-"किसी को ऊंचाइयों पर चढाओ

किसी को ऊंचाईयों पर चढाओ उतना,
कि, वक्ते-ज़रुरत वो नीचे भी देख सके,
झूंटी तारीफ ना करो किसी की इतनी, 
कि आइना में खुदको न कभी देख सके ..(वीरेंद्र)/0-102

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-141-" दिल नहीं पिंघलते, माँ बनने

दिल नहीं पिंघलते,मोम बनने की बात वो क्यों करते हैं,
भरी है आग खुद ही में, बुझाने की बात वो क्यों करते हैं,
कुछ दूर हम कदम हो ना सके जो, ज़िन्दगी की राहों में, 
बारबार साँसों से साँसें मिलाने की बात वो क्यों करते हैं...(वीरेंद्र)/0-141

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-931-"कितने नादां हम इंसान होते



रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-269-"पर्वत पर पहुंचे,

पर्वत पर पहुंचे,
पवन पुत्र श्री हनुमान,
पर बूटी पहचान न पाए,
उठा लाये पूरी की पूरी चट्टान..(वीरेंद्र)/2-269

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-023-"चोट देने वाले भी अब तो

चोट देने वाले भी अब तो शायरी करने लगे हैं, "वीरेंद्र"
हमने तो सुना था चोट खाने वाले ही शायरी किया करते हैं...(वीरेंद्र)/1-023

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-422-"कैसा दर्द, कौनसा दर्द,

कैसा दर्द, कौन सा दर्द, लोग भी क्या मज़ाक करते हैं,
अजीब लगता है जब संगदिल भी दर्द की बात करते हैं..(वीरेंद्र)/1-422

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-087-"खुमार उतर गया जैसे नशा

खुमार उतर गया, जैसे नशा उतर गया कोई,
पिलाने का वादा करके जब मुकर गया कोई...(वीरेंद्र)/1-087

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-410-"धरती प्यासी रह लेगी

धरती प्यासी रह लेगी, बादलों का घमंड तोड़ने को,
बादल भी अपनी सी पर आ जाए तो सोचो क्या होगा. ..(वीरेंद्र)/1-410

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-443-"ठंड और कोहरे का कुफ्र

ठंड और कोहरे का कुफ्र जब हो जाय,
मुंह से निकले भाप कुल्फी जम जाय,
उंगलियाँ अकड़ें और हड्डी कड़कड़ाऐ,
कुल्हड़ में अमृत लगे गर्मा-गर्म चाय..(वीरेंद्र)/0-443

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-409-" कंजूसी न कर, आँखों से

कंजूसी न कर, आँखों से पिलाने में साकी,
कहीं तेरे मैखाना में हम बगावत न कर बैठे ..(वीरेंद्र)/1-409

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-408-"चिराग बनके रौशनी सा अंधेरों

चिराग बनके रौशनी सा अंधेरों पे बिखरा हुआ हूँ,
जल तो रहा हूँ, मगर आँधियों से भी डरा हुआ हूँ....(वीरेंद्र)/1-408

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-421-" साँसों को साँसों से लबों को

साँसों को साँसों से, लबों को लबों से मिल जाना था,
और क्या आएगा तूफ़ान, आ लिया जितना आना था. ..(वीरेंद्र)/1-421

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-420-"कमबख्त दिल भी मेरा कितना

कमबख्त दिल भी मेरा किस कदर अजीब है,
टुकड़े कर डाला जिसने इसे, उसी के करीब है...(वीरेंद्र)/1-420

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-247-"तुम्हे निहार कर झंकृत

तुम्हे निहार कर झंकृत मेरे मन के तार हो जाते हैं,
उठने लगती हैं तरंगे जैसे सपने साकार हो जाते हैं..(वीरेंद्र)/2-247

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-419-"पत्थर से, मै मोम बन तो जाऊं

पत्थर से मै मोम बन तो जाऊं, मगर
डर है, ता-उम्र वो मुझे जलाती ही न रहे..(वीरेंद्र)/1-419

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-414-"मत तलाशों मुहब्बतें, नफरतों से

मत तलाशो मुहब्बतें, नफरतों से भरी दुनिया में,
के मयखाने में शराब मिलती है आबे-हयात नहीं...(वीरेंद्र)/1-414

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-351-"वो दर्द का परिंदा है

वो दर्द का परिंदा है दर्द का मारा है मेरी तराह,
हमदर्द समझके आ जाता है उड़कर मेरे पास..(वीरेंद्र) /1-351

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-230-"तुम्हारे बगैर ये ज़िन्दगी

तुम्हारे बगैर यह ज़िन्दगी बस सरक रही है,
बुझने से पहले चिराग की लौ  भड़क रही है. ..(वीरेंद्र)/1-230

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-418-"वो मुहब्बत ही क्या जिसका

वो मुहब्बत ही क्या जिसका हम इज़हार न कर सकें,
वो दोस्ती ही क्या जिसमे किसी का ऐतबार न कर सकें..(वीरेंद्र)/1-418

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-417-"अच्छा है जो दूर-दूर

अच्छा है जो दूर-दूर तुम हमसे अब रहने लगे,
ये दूरियां बढ़ा देंगी इमकान तेरे-मेरे पास आने के,.(वीरेंद्र)/1-417

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-267-"याद आये, वो दिन आज


याद आये,
वो दिन आज,
कितने दिनों के बाद,
फिर से प्रेम-प्रसंग संवाद......(वीरेंद्र)/2-267

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-140-"रिश्ते हो गए हैं बहुत ही

रिश्ते हो गए हैं अबतो बड़े सस्ते,
वक्त ही कहाँ है,निभाने के वास्ते,
दुनियां में हैं बहुत से काम ज़रूरी,
वक्त कहाँ फालतू बातों के वास्ते...(वीरेंद्र)/0-140

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-300-"न तो कोई चाँद, न कोई सूरत

न तो कोई चाँद, न कोई सूरत, तुम्हारे मुकाबिल है,
मगर वफ़ा प्यार तुम्हारा, किसी और का हासिल है,
इस दिल में रहे तुम, और रहोगे आखरी सांस तक,
करूंगा प्यार इकतरफा ही,मेरा दिल इसी काबिल है..(वीरेंद्र)/0-300

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")