Monday, 30 September 2013

1-225-"मिलते नहीं हैं दिल बड़ी बड़ी

मिलते नहीं हैं दिल, बड़ी बड़ी कोशिशात से,
टूट मगर जाया करते हैं छोटी छोटी बात से...(वीरेंद्र)/1-225

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-40-"तुम्हारे सपनो में मै

तुम्हारे सपनों में मै आती हूँ,
मालूम नहीं तुम कैसे सोते हो,
कितनी बार तुम्हे जगाती हूँ,
पर तुम घोड़े बेच के सोते हो,
बार बार तुम्हे मै पुकारती हूँ,
पर तुम तो आँखें मूंदे रहते हो,
जब भी सपनों में मै आती हूँ,
तुम सदैव मूक बने रहते हो. ..(वीरेंद्र)/2-40


रचना: वीरेंद्र सींह ("अजनबी") 

1-403-"बहुत दिन हो गए

बहुत दिन हो गए वो मुझसे एक बार  भी रूठा नहीं है,
कहीं ऐसा तो नहीं, अब वो मुझसे मुहब्बत करता नहीं है...(वीरेंद्र)/1-403

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-227-"चंद लम्हे तेरे साथ गुजरें

चंद लम्हे तेरे साथ गुजरें, फिर चाहे न ज़िन्दगी रहे बाकी,
जाम तेरी आँखों से पियूं, फिर चाहे मेरी तिश्नगी रहे बाकी...(वीरेंद्र)/1-227

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-390-"'प्यार' और 'प्याज़' दोनों ने हमें

'प्यार' और 'प्याज' दोनों ने, हमें खूब रुलाया है,
हम भूले अपनी हैसियत, दोनों ने 'भाव' खाया है,
प्यार को 'मेरी सरकार' ने पनपने न दिया, और
'मुल्क की सरकार' ने प्याज का दाम चढ़ाया है....(वीरेंद्र)/0-390

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-236-"चंद लम्हे तेरे साथ गुजरें

चंद लम्हे तेरे साथ गुजरें, फिर चाहे न ज़िन्दगी रहे बाकी,
जाम इन आँखों से पियूं, फिर चाहे यह तिश्नगी रहे बाकी,
नशीली आँखों की नीली गहराइयों में डूब जाऊं इस तराह,
नसीब मेरा रौशन हो जाय, फिर चाहे यह तीरगी रहे बाकी. ...(वीरेंद्र)/0-236

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रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Friday, 27 September 2013

0-422-"दर्द अपने दिल के हम बयाँ

दर्द अपने दिल के, हम बयाँ कर नहीं सकते,
सीने में भी ज्यादा उन्हें जमा कर नहीं सकते,
जाने क्यों तुमने हम पर लगा रखी है पाबन्दी,
दिल हो परेशां तोभी याद तुम्हे कर नहीं सकते...(वीरेंद्र)/0-422


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-350-"आतिशे-इश्क कसूरवार नहीं

आतिशे-इश्क कसूरवार नहीं तुझे जलाने की,
जलाती है ये तुझे अगर, तो बुझाती भी तो है,
गर्मिए-इश्क से मत घबराया कर, तू इतना,
आंच देती है ये गर,तो ठंड पहुंचाती भी तो है...(वीरेंद्र)/0-350

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")


0-421-"तन्हाई में दीखता नहीं

तन्हाई में दीखता नहीं जब कोई दूसरा चेहरा,
आईने में खुद का ही चेहरा मै देख लेता हूँ,
सुनाई नहीं देती जब किसी के आने की आहट,
दरवाज़े खिड़कियाँ यूंही खोल कर देख लेता हूँ....(वीरेंद्र)/0-421

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-192-"ये इश्क का रोग बहुत हसीन

ये इश्क का रोग बहुत हसीन है, 
दूसरे मर्ज़ तो हमें लग जाते हैं,
पर इसको हम खुद ही लगाते हैं,
इसकी न दवा है, न वैक्सीन है.

टी.बी., केंसर का टेस्ट हो जाता है
शूगर और हार्ट चेक हो जाता है,
पर इस रोग का कोई चेकअप नहीं,
ये बड़ा कमीना है, बड़ा कमीन है,

हरेक मर्ज़ की एक मुद्दत होती है
कोई न कोई दवा भी होती है,पर
इश्क का रोगी खूब जानता है,
बचेगा नहीं वो, मर्ज़ बड़ा संगीन है.

इसका होता है नहीं कोई डाक्टर,
नही कोई क्लिनिक न कोई सेंटर,
लव-गुरु भी बेकार साबित हुए हैं,
कहते हैं डरो मत रोग ये रंगीन है.

इसका रोगी दुनिया से कट जाता है,
कलेजा उसका पूरा फट जाता है,
बस एक ही शख्स याद रहता है उसे,
वही उसका आकाश वही ज़मीन है.

पर इश्क का रोग बहुत हसीन है........(वीरेंद्र)/2-192

----वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")----


Tuesday, 24 September 2013

1-405-"कोई उनकी साफगोई

कोई उनकी साफगोई तो देखे ज़रा
तोड़ भी देते हैं दिल, और मान भी लेते हैं...(वीरेंद्र)/1-405

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-556-"पाबंदियां न कर सकीं उसे



पाबंदियां न कर सकीं उसे जुदा मुझ से,
चुप रहके भी बात वो करता रहा मुझ से..(वीरेंद्र)/1-556



रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-558-"खुशनसीब हैं जिनके दिल

खुशनसीब हैं जिनके दिल पत्थर के होते हैं,
न एहसासात रखते हैं, न जज़्बाती वे होते हैं..(वीरेंद्र)/1-558

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-419-"हम इन्तजारे-शाम भला

हम इन्तजारे-शाम भला कैसे करें, 
शाम में अभी कई सदियाँ बाकी हैं,
दर्द और हरारत देख कर लगता है, 
जैसे हमारी चंद ही घड़ियाँ बाकी हैं...(वीरेंद्र)/0-419

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-226-"अपने दिल के मकाँ में

अपने दिल के मकान में मुझे वो रखता भी तो कहाँ रखता,
निकलवा दिए उसने सभी कोने, नए मकाँ की तामीर के वक्त...(वीरेंद्र)/1-226

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-138-"मैंने माना ना था, पर


मैंने माना ना था, पर वादा तेरा टूट चुका है,
यादें भी बिखर गईं, सपना मेरा टूट चुका है,
पिरो कर रक्खा था, जिसमे हमने यादों को,
वह धागा भी, इस दिल के साथ टूट चुका है ..(वीरेंद्र)/0-138

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-319-"मै प्यासा हूँ, सावन मुझ से

मै प्यासा हूँ,  सावन मुझ से रूठ गया है,
मै तन्हा हूँ, दोस्त का दामन छूट गया है,
कितनी उम्मीद से मैंने पुकारा था उसको,
अब तो प्यार से, मेरा भरोसा टूट गया है...(वीरेंद्र)/0-319

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-173-"मै कभी ज़माने के बिगड़े

मै कभी ज़माने के बिगड़े हालात पर लिखता हूँ,
अक्सर  इंसानियत के सवालात पर लिखता हूँ  
मै गाफिल नहीं अपने दिल की कैफियत से भी,
टूटता है ये तो इसकी तकलीफात पर लिखता हूँ..(वीरेंद्र)/0-173

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-370-"खुशियों को घर में समेट कर

खुशियों को घर में समेटकर, दरवाज़ा कर लिया था बंद,
मै खुश था, मेरी खुशियों को परिंदा भी ना मारेगा पंख,
सोचा बाहर न जा सकेंगी खुशियाँ भीतर न आयेंगे गम,
पता न था घर में भी घुट सकता है मेरी खुशियों का दम...(वीरेंद्र)/0-370

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी") 

Wednesday, 18 September 2013

2-190A-"वो ऊर्जा भी अब समाप्त

वो ऊर्जा भी अब समाप्त हो गई,
पुनर्जीवित जिसने कर दिया था,
वो आशा भी अब परास्त हो गई,
प्रोत्साहित जिसने कर दिया था....(वीरेंद्र)/१-१९०A

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-298-"मैंने चाहा था जी भर के

मैंने चाहा था, जी भर कर प्यार दूंगा उसे,
लेके गम उसके, खुशियों के हार दूंगा उसे,
पर भूल ही गया, मै हारता आया हूँ सदा,
ये क्यूँ न सोचा, कभी भी मै हार दूंगा उसे...(वीरेंद्र)/0-298

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-369-"मालिक ने भाग्य में पत्थर

मालिक ने भाग्य में पत्थर होना ही लिखा था,
मै ठहरा पत्थर,मान लिया जो होना लिखा था,
मूर्तिकार ने तराश के बदल दिया मेरा मुकद्दर,
तकदीर में मेरी, भगवान् होना भी लिखा था ....(वीरेंद्र)/0-369

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-297-"ऐ हमसफ़र ले चल तू

ऐ हमसफ़र, ले चल तू मुझे उस जहाँ में,
जिसके आगे दूसरा कोई और जहाँ न हो,
खो जाएं हमदोनों एकदूजे के आगोश में,
बस मै और तू हों, कोई तीसरा वहां न हो...(वीरेंद्र)/0-297



रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-402-"ढूंढता फिर रहा हूँ मै खुद

ढूंढता फिर रहा हूँ मै खुद को कई दिन से,
ज़रा देखो तो, कहीं मै तुम्हारे वजूद में तो नहीं.?..(वीरेंद्र)/1-402

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-554-"अच्छा किया तो मुझसे

अच्छा किया जो मुझसे अलग हो गए,
तुम भी भला क्यों चलते ज़माने से अलग..(वीरेंद्र)/1-554


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-224-"लाख कोशिशें कीं, मगर मै

लाख कोशिशें कीं, मगर मै न अब तक तुम्हे भुला पाया,
मुझे भी तो बताओ, तुमने इतनी जल्दी मुझे कैसे भुलाया...(वीरेंद्र)/1-224

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-077-"नादान है वो, मेरे प्यार

नादान है वो, मेरे प्यार की संजीदगी को नहीं समझे,
मैंने किया प्यार उन्हें, पर वो हुस्न की खुशामद समझे. .(वीरेंद्र)/1-077

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Thursday, 12 September 2013

1-278-"अपने टूटे दिल की बेचैनी

अपने टूटे दिल की बेचैनी की दवा जो मै लेने गया,
चारागर ने फिर वही मुट्ठी-भर वक्त मुझे थमा दिया..(वीरेंद्र)/1-278

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-151-"मेरी नाचीज़ शायरी को नए

मेरी नाचीज़ शायरी को नए आयाम देकर,
आपने खुद क्यों मुझसे किनारा कर लिया,
मेरी गजलों को हसींन मौजू देकर, आपने,
बज़्म में नहीं आना क्यों गवारा कर लिया..(वीरेंद्र)/0-151

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-099-"मज़हब की दीवार मै तोड़

मज़हब की दीवार मै तोड़ तो दूं,
सबसे इंसानी रिश्ता जोड़ तो लूं,
वो देखो आगये मज़हबी ठेकेदार,
पहले मै अपनी कब्र खोद तो लूं..(वीरेंद्र)/0-99

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-555-"आइना समझ कर मेरा

आइना समझ कर मेरा दिल तोड़ डाला आपने,
टुकड़े जोड़के भी अब इसमें खुदको देख न पाओगे..(वीरेंद्र)/1-555

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-436-यह कैसा रिश्ता है मेरा

यह कैसा रिश्ता है मेरा तेरा,
जिसमे न तू मेरी न मै तेरा,
वो कौनसी है डोर हमारे बीच,
जिसने बांधा है मन मेरा तेरा...(वीरेंद्र)/0-436

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Wednesday, 11 September 2013

3-60-"रूखे-रौशन से तेरे महरूम

रूखे-रौशन से तेरे महरूम कहीं हम हो न जाएं,
जुल्फों को संभाल, रुख पे कहीं गिर वो न जाएं,

यूंतो इन काली बदलियों से भी मुहब्बत है हमें,
शर्त मगर ये, दीदारे-चाँद के रास्ते में वो न जाएं,

काजल को बसा लिया तूने इन शोख निगाहों में,
छिनवा दिया बसेरा मेरा, दरबदर हम हो न जाएं,

सुराहीदार गर्दन है और आँखों से छलकते जाम,
डरते हैं, कहीं इनसे पीने के आदी हम हो न जाएं,

खुमारे-शादाब में मत खो जा इतना ऐ नाजनीन,
रूखसार को देखके, मदहोश कहीं हम हो न जाएं,

मत बिखेर हुस्न की खुशबू इतनी दरियादिली से,
बादे-नसीम का रुख इधर है कहीं हम सो न जाएँ,

छिपना न कहीं बद्र की मानिंद तू ऐ माहेज़बीन,
हकीकतें हैं जो आज, वो कहीं ख्वाब हो न जाएं. ...(वीरेंद्र)/3-60
 
(रूखे-रौशन=मुखमंडल; खुमारे-शादाब=यौवन का खुमार;
बादे-नसीम=ठंडी बयार; बद्र=पूरा चाँद;) 
रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-553-"हमने तो बदला है अपना


हमने तो बदला है अपना नजरिया ही,
लोग तो सर से पाँव तक बदल गए हैं..(वीरेंद्र)/1-553

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-552-"कौन न मर जाए गुफ्तगू

कौन न मर जाए गुफ्तगू की इस अदा पर उनकी,
होटों को आराम और आँखों को ज़हमत वो देते हैं..(वीरेंद्र)/1-552

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-401-"हमने ता-उम्र खोया ही खोया

हमने ता-उम्र खोया ही खोया जिन्हें पाने के लिए,
वो हैं कि, उन्होंने हमें पाया भी तो बस खोने के लिए....(वीरेंद्र)/1-401

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-347-"मेरे दर्द भरे शेरों को

मेरे दर्द भरे शेर लोग इसलिए पसंद करते हैं,
क्योंकि वो उनकी दिलबस्तगी का सामाँ होते हैं...(वीरेंद्र )/1-347

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-551-"शिकायत नहीं, ज़माने वाले

शिकायत नहीं, ज़माने वाले क्यों बदल गए,
गिला तो इतना है भला तुम क्यों बदले गए ..(वीरेंद्र)/1-551

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-223-"निकल गया वो शख्स

निकल गया वो शख्स मेरी ज़िन्दगी में चहलकदमी करके,
न जाने किसने कौन सा इंतकाम मुझसे लेने भेजा था उसे....(वीरेंद्र)/1-223

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-400-"सवाल वो करे जिनको हो

सवाल वो करें जिनको हो जवाब की उम्मीद बाकी,
वो क्या करें सवाल जिनकी किस्मत ने जवाब दे दिया हो..(वीरेंद्र)/1-400

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-395-"तौबा ये कैसा उल्टा ज़ुल्म

तौबा, ये कैसा उल्टा ज़ुल्म मुझ पर वो ढा रहे हैं,
छीन ली नींद उन्होंने मेरी, और खुद सोने जा रहे हैं...(वीरेंद्र)/1-395

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-388-"मै जानता हूँ कि मै इकतरफा

मै जानता हूँ कि मै इकतरफा प्यार कर रहा हूँ,
मालूम है मै अपने ग़मों का सामान  कर रहा हूँ,
रकीबों के जैसी किस्मत पाई नहीं मैंने इसलिए,
अरमानों का अपने, काम मै तमाम कर रहा हूँ...(वीरेंद्र)/0-388

रचना: वीरेंद्र सिन्हा  ("अजनबी")

0-367-"जोश-ओ-खरोश से चिल्ला रहे

जोश-ओ-खरोश से चिल्ला रहे थे भूखे और नंगे इंसान,
हाथों में लेकर एक सियासी पार्टी का झंडा और निशान,
तभी आई सत्ता-पार्टी की गाडी, लेकर कुछ रोटी कपडे,
बदले सुर उनके, चिल्लाने लगे, हो रहा भारत निर्माण. ...(वीरेंद्र)/0-367

रचना: वीरेंद्र सिन्हा  ("अजनबी")

0-420-"अँधेरे कमरे में झिर्रियों से

अँधेरे कमरे में झिर्रियों से जैसे आजाती है हलकी रौशनी,
तुम आगईं, मेरी अँधेरी जिंदगी में, उस रौशनी की तराह,
जाते हुए भी, न जाने का एहसास देती है जो हलकी धूप,
तुमभी निकल गईं जिंदगी से शाम की उस धूप की तराह...(वीरेंद्र)/0-420

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-389-"ना तो मै मिस कर रहा

ना तो, मै मिस कर रहा हूँ आपको,
और ना ही आप मुझको कर रहे हैं.
काट क्यूं नहीं देते रिश्तों की रस्सी,
पकडके जिसे हम यूंही घिसट रहे हैं..(वीरेंद्र)/0-389

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Sunday, 8 September 2013

1-550-"अच्छा हुआ तूने ही मुंह


अच्छा हुआ तूने ही मुंह फेर लिया,
तुझे भुलाना आसान तो हुआ मेरे लिए .(वीरेंद्र)/1-550

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-296-"यूं तो मेरी ज़िन्दगी उदास

यूं तो मेरी ज़िन्दगी उदास हो गई,
फिरभी ये शाम कुछ ख़ास हो गई,
जाने कैसे आज पुकार लिया उसने,
दूर बैठी थी जाने क्यों पास हो गई. ...(वीरेंद्र)/0-296

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-368-"अपनी ऊंचाइयों गहराइयों पे

अपनी ऊंचाइयों गहराइयों पर गरूर करते हैं लोग,
खुदको मसरूफ, हमें बड़ा फ़ालतू समझते हैं लोग,
खुद को तो ज़रा सब्र नहीं है,  हमारे बिना रहने का,
पर हमें ज़रूर प्यासा तड़पने को छोड़ देते हैं लोग. ...(वीरेंद्र)/0-368

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")


0-137-"हमने यह माना हालात

हमने यह माना हालात बदल जाते हैं,
यह भी सच है जज़्बात बदल जाते हैं,
वाजिब हो जितना, उतना ठीक है पर,
लोग सर से पाँव तक क्यूँ बदल जाते हैं..(वीरेंद्र)/0-137

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Saturday, 7 September 2013

0-136-"दूर हो जाते हैं अजनबी,

दूर हो जाते हैं अजनबी, अरसा गुज़र जाने के बाद,
आँखें पथरा जाती हैं इंतज़ार लंबा हो जाने के बाद,
कहते हैं, दरो-दीवार से रूबरू होना चाहिए बारबार,
वरना वो भी नहीं पहचानते, मुद्दत हो जाने के बाद..(वीरेंद्र)/0-136

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")