Tuesday, 27 August 2013

2-274-"मेरी आशाएं किंचित

मेरी आशाएं किंचित सूक्ष्म थीं,
तुम्हारी आँखों से, ओझल थीं,
तुम्हारा दोष नहीं इसमें कुछ,
उन्हें टूटना था, वो कोमल थीं...(वीरेंद्र)/2-274

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-172-"जब तुम ही नहीं आये

जब तुम ही नहीं आए मेरे जीवन में,
रिक्त रहा तुम्हारा स्थान अंतर्मन में,
हज़ार मै दीपक जलाऊँ सब व्यर्थ है,

जिन राहों पर मुझे अब चलना नहीं,
जिस आँगन में तुम्हारी पदचाप नहीं,
उनमे उजाले का भी रहा नहीं अर्थ है,

ह्रदय-तरंगों को तुम तक पहुँचाने में,
ह्रदय-भाव अपने तुमको समझाने में,
ये ह्रदय मेरा अंततः रहा असमर्थ है. ...(वीरेंद्र)/२-५६

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Thursday, 22 August 2013

0-235-"तेरी आँखों की गहराई में

तेरी आँखों की गहराई में, डूबना चाहता हूँ,
सुना है सारा प्यार तूने उनमे छुपा रखा है,
डूबकर इनमे मौत भी आगई तो गम नहीं,
तेरी आँखों के सिवा दुनिया में क्या रखा है...(वीरेंद्र)/0-235

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

3-58-"मेरी कलम से झड़ते हैं

मेरी कलम से झड़ते हैं लफ़्ज़ों के मोती ,
कोई रंगीन कागज़ उनको समेट लेता है,

कागज़-कलम के संगम का एक शरार,
पूरे आलम को आगोश में लपेट लेता है,

कोई डूब जाता है जज़्बात के समंदर में,
कोई दोज़ख में भी जन्नत देख लेता है,

लेपता है कोई लफ़्ज़ों का मर्रहम ज़ख्मों पे,
तो उनसे कोई दिल की चोट सेक लेता है.

तासीरे-अलफ़ाज़ से कोई पिंघल जाता है,
मुनकिर भी चौखट पे मत्था टेक लेता है....(वीरेंद्र)/३-५८

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-548-"मैंने खोया था तुम्हे,


मैंने खोया था तुम्हे, अब तुमने भी मुझे खो दिया,
अच्छा हुआ हमने एकदूजे बिन जीना सीख लिया...(वीरेंद्र)/1-548

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

3-55-"चढ़ रहा था ऊंचाइयों पर

चढ़ रहा था ऊंचाइयों पर,
गहराइयों में मै आ गिरा,
ज़माने को सहन न हुआ,
तन्हाइयों से मै आ घिरा,
हकीकतें ख्वाबीदा होगईं,
रुसवाइयों से मै जा घिरा....(वीरेंद्र)/३-५५

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी"). 

0-295"मेरे बुझे बुझे से अरमानों

मेरे बुझे बुझे से अरमानों को,
अपने प्यार की गर्मजोशी देदे,
दोनों जहाँ की ख़ुशी पा जाऊं,
मेरे दिलबर ऐसी मदहोशी देदे...(वीरेंद्र)/0-295

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-549-"तुमसे गिला,तुमसे शिकवा

तुमसे गिला, तुमसे शिकवा, तुमसे तकरार,
फिरभी तुम्ही से प्यार, तुम बिन जीना दुश्वार..(वीरेंद्र)/1-549

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-191-"बहुत ही सुकून देती हैं टपकती

बहुत ही सकून देतीं हैं टपकती बूँदें, बारिश की,
मै तो खो जाता हूँ प्रकृति की मनोरम छटा में,
बंद कर के अपनी आँखें गहराई में खो जाता हूँ,
नदी की बहती धारा अनायास ही जगा देती है,
हरियाली से ढके पहाड़, कल-कल करते ये झरने,
मदहोश करती चहचाहट की भिन्नभिन्न आवाजें,
स्वागत करती जैसे धरती-आकाश के संगम का.
परन्तु फिर लगता है, यह सब क्षण भर का है,
फिर नदी सूख जायगी, पहाड़ आकर्षण खो देंगे,
हरियाली न होगी, मेघ न ...बरसेंगे, हम तरसेंगे,
कोलाहल न होगा, धरती-आकाश संगम न होगा,
बारिश न होगी, बूँदें न होंगी, ये सकून न होगा.
अभी नहीं पर अग्रिम-कल्पना से मै डर जाता हूँ,
और कितना प्रकृति-असंतुलन नहीं जान पाता हूँ. ....(वीरेंद्र)/२-१९१

 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Wednesday, 21 August 2013

1-399-"जला ही नहीं है देती आग

जला ही नहीं है देती आग बदन को,
ठंडा भी कर देती है वक्त के आने पर...(वीरेंद्र)1-399

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-215-"उसे क्या अंदाज़ा मेरी

उसे क्या अंदाज़ा मेरी मुहब्बत की गहराई का,

उसने तो बस, समंदर की गहराई ही देखी है..(वीरेंद्र)/1-215

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Tuesday, 20 August 2013

3-51-"आज मुझसे न कहो तुम

आज मुझसे न कहो तुम मुस्कुराने को,
आज मै मुखौटा घर भूलके आ गया हूँ,
कब तलक छुपाऊँ अपने दर्द दुनियां से,
झूटी हंसी से अबतो मै तंग आ गया हूँ,
रूदादे-गम थी मेरे जिन शेरों में महदूद,
वो शेर सुनाने अब बज़्म में आगया हूँ.....(वीरेंद्र)/३-51

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-172-"तेरी दी हुई चोट

तेरी दी हुई चोट को हम सलाम कर रहे हैं,
जुबां से हमारी, दर्द भरे शेर निकल रहें हैं,
बे-इंतहा दाद मिल रही है महफ़िल में हमें,
हम तेरी मेहरबानियों पर फक्र कर रहे हैं...(वीरेंद्र)/0-172

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-234-"हकीकत में, जो न कभी

हकीकत में, जो न कभी मिलते हैं, 
मुहब्बत में जो न कभी पिंघलते हैं,
सपनों में वो लग जाते हैं सीने से,
इसीलिए ख्वाबों को मन मचलते हैं ...(वीरेंद्र)/0-234

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-336-"ऐसा क्या है जिसके पीछे

ऐसा क्या है जिसके पीछे ये दिल भागता रहता है,
कितने फूल सुहाने छोडके, शूल तलाशता रहता है,
मुडके भी पीछे नहीं देखे, जो इंसान कभी राहों में,
बेबस सा ये दिल क्यूँ उसी की राह देखता रहता है....(वीरेंद्र)/0-336

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-547-"पूरी हो न सकी दिल की किताब

पूरी हो न सकी दिल की किताब, खाली रह गए कुछ पन्ने,
तेरा ज़िक्र अधूरा रह गया, तेरा चेहरा पूरा न पढ़ा था हमने..(वीरेंद्र)/1-547

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-206-"जिनके आ जाने से

जिनके आ जाने से अँधेरे चले जाते हैं,

जिनसे चाँद सितारे भी शरमा जाते हैं,

उन्हें क्या है दरकार दीगर रौशनी की,

चंद लम्हों में मेरे सरकार चले आते हैं...(वीरेंद्र)/0-206  


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Monday, 19 August 2013

1-398-"हम तो हैं खुशनसीब

हम तो हैं खुशनसीब, ता-उम्र तन्हाइयों में ही रहे,
वरना अक्सर तरस जाते हैं लोग तन्हाई के लिए ...(वीरेंद्र)/1-398

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-293-"तुम रहने लगे हो

तुम रहने लगे हो मुझसे खिंचे-खिंचे,
यह जताने की भला क्या ज़रुरत थी,
एक छोटा सा लफ्ज़ कहना बहुत था,
लम्बी ख़ामोशी की क्या ज़रुरत थी.....(वीरेंद्र)/0-293

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-221-"तमाम उम्र ही कटती जा

तमाम उम्र ही कटती जा रही है उदासियों में,
तुमने भी एक उदास शाम दे दी तो क्या हुआ...(वीरेंद्र)/1-221

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-258-"संघर्ष मेरा शौक है,

संघर्ष मेरा शौक है, मिलता है संतोष मुझे,
यूंही कुछ मिल जाना आता नहीं रास मुझे,
तूफानी लहरें रोकती हैं रास्ता, कायरों का,
पर वोही लहरें देती हैं रास्ता बना कर मुझे..(वीरेंद्र)/2-258

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी") 

1-346-"दिल को दबा दिया

दिल को दबा दिया मैंने, जज़्बात को कैसे दबाऊँ,
अश्क रोक लिये मैंने, आँखों की नमी कैसे छुपाऊँ...(वीरेंद्र)/1-346

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-394-"वो करते रहे गुफ्तगू

वो करते रहे गुफ्तगू, हंस-हंस के  इस कदर,
मै सोचता रहा, कितना खुशनसीब मेरा रकीब है..(वीरेंद्र)/1-394

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-397-"शाख से जुदा हुआ पत्ता

शाख से जुदा हुआ पत्ता, वापस नहीं लग जायगा,
उठा कर रखोगे शाख पर, फिर से वो गिर जायगा...(वीरेंद्र)/1-397

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-396-"गर्मी से जिसकी मै


गर्मी से जिसकी मै फिर जी उठा था,
वो गर्माहट भी रूठकर अब सर्द हो गई,..(वीरेंद्र)/1-396

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-246-"प्यासा था मन और बादल

प्यासा था मन और बादल बेवफा निकला,
राही था मजबूर, पनघट भी नाराज़ निकला,...(वीरेंद्र)/2-246

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-257-"खुशबुएँ मै तुझपर

खुशबुएँ मै तुझ पर बिखेर दूं,
प्यार अपना तुझपर उंडेल दूं,
बना दूं प्रेम की नई ऊंचाईयां,
आ रहे तूफानों को भी फेर दूं...(वीरेंद्र)/2-257

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-546-लिक्खे जो शेर हमने ज़माने


लिक्खे जो शेर हमने ज़माने पर, वो नहीं थे ज़माने के लिए,

ज़माना यूंहीं बदनाम हो गया, वो तो थे तुम्हे सुनाने के लिए..(वीरेंद्र)/1-546




रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-255-"रोज़ निकलते हैं घर से

रोज़ निकलते हैं घर से आइना देख कर,

फिर भी जाने क्यों खुद को भुला देते हैं,

आसानी से ढूंढ लेते हैं हम ऐब दूसरों के,

स्वयं के दोष हम जाने कहाँ दबा देते हैं..(वीरेंद्र)/2-255


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-393-"अच्छा हुआ जो तुमने इस

अच्छा किया जो तुमने इस दिल की अक्ल ठिकाने लगा दी,
कमबख्त मुहब्बत, मुहब्बत की रट भी बहुत लगाए रहता था...(वीरेंद्र)/1-393

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-342-"प्यार इंसान की भूख हो

प्यार इंसान की भूख हो सकता है,
मगर इस भूख से कोई मरता नहीं. ..(वीरेंद्र)/1-342

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-545-"ख़ाक हो गए हम हुस्न की

ख़ाक हो गए हम हुस्न की इबादत करते-करते,
हुस्न है कि फिर भी जलाने पर आमादा हुआ है...(वीरेंद्र)/1-545

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-008-"मैंने उससे किया था वादा

मैंने उससे किया था वादा, ग़मगीन ग़ज़ल न लिखने का, मगर 
आज उसकी नज़र क्या हटी, दिल फिर अपनी-सी पे उतर आया...(वीरेंद्र)/1-008

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-544-"कभीअपने दिल में झाँक

कभी अपने दिल में भी झाँक कर देख लिया करो,
क्यों तलाशते हो मंजिल, मंजिल पर खड़े हो कर..(वीरेंद्र)/1-544


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-392-"किसी से नफरत कर लेना

किसी से नफरत कर लेना तो बहुत आसान है,
तकलीफ बड़ी होती है जब नफरत खुद से होती है ..(वीरेंद्र)/1-392

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-233-"नादाँ हो तुम, जो मुझको

नादां हो तुम,जो मुझको खोजते हो,
व्यर्थ में ही तुम मुझको पुकारते हो,
देखो, तुम्हारे इर्द-गिर्द ही तो हूँ मै,
क्यों तुम खुदकी छाया को ढूंढते हो...(वीरेंद्र)/0-233

रचना : वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-250-"वफ़ा है नेह की अमूल्य

वफ़ा है नेह की अमूल्य सौगात,
जीवन जीने के लिए यही पर्याप्त..(वीरेंद्र)/2-250

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-098-"लोग कहते हैं तू भी बदल

लोग कहते हैं, तू भी बदल जा,
ज़माना भी अब बदल गया है,
मै अपनी आदत को कैसे बदलूँ,
'वो' जो मेरी आदत बन गया है....(वीरेंद्र)/0-98

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-814-"चढ़ाकर कभी ऊंचाइयों पे

चढ़ाकर कभी ऊंचाइयों पे, डुबाकर कभी गहराइयों में,
अजीब सी एक जद्दोजहद पैदा करके वो गायब हो गए,
हम तश्नगा रहे, मगर तश्नगी को छुपाते फिरे उनसे,
हमारी आरज़ू जुर्म, और उनके अरमां जायज़ हो गए....(वीरेंद्र)/१-८१४

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-294-"उमीदों के चराग जले और बुझ

उमीदों के चराग जले और बुझ भी गए,
हम आसमान में चढ़े और गिर भी गए,
पूछना न पड़ा सबबे -ख़ामोशी किसी से,
सब सवालों के जवाब खुद मिल भी गए....(वीरेंद्र)/0-294

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-232-"काश, तुम जल्दी आ जाते

काश, तुम जल्दी आ जाते इन वीरानों में,
हरगिज़ ना होता मै, यूं शुमार दीवानों में,
तुम ही जला डालो अब ये ग़मगीन ग़ज़लें,
मुझे होगी तकलीफ बहुत इन्हें जलाने में ..(वीरेंद्र)/0-232

रचना : वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-400-"सेंटीमेंट्स को मारने की कोई

सेंटीमेंट्स को मारने की कोई दवा है क्या,
मेरे दिल में, बहुत ही सेंटीमेंट्स हो गए हैं,
धीरे-धीरे इन्होने कर दिया है मुझे खोखला,
बार-बार पैदा हो जाते हैं बड़े ढीठ हो गए हैं...(वीरेंद्र)/0-400

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-231-"मेरे इल्जाम ज़माने पे

मेरे इल्जाम ज़माने पे हैं, तुझ पर नहीं,
तुझ पर है जितना यकीं, खुद पर नहीं,
तेरे इसरार पर तुझको भूल तो जाऊं मै,
मुझे खुद पर है काबू, जज़्बात पर नहीं...(वीरेंद्र)/0-231

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी") 

0-047-"लोगों ने प्यार को बस एक

लोगों ने प्यार को बस एक सिगरेट बना डाला,
लबों के बीच मुंह में लगाया, और जला डाला,
खींचे लम्बे कश, और उड़ा दिया धुंआ बनाकर,
बचा-खुचा वजूद भी उसका पैरों तले रौंद डाला,...(वीरेंद्र)/0-047

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-074-"वो काली रातें ही भलीं थीं

वो काली रातें ही भलीं थीं इस ज़िन्दगी मे,
कुछ देर को सहर क्यों हो गई ज़िन्दगी में,
मेरी तन्हाईयां मुकम्मल साथ दे रही थी,
फिर ये परछाईंयां क्यों आ गईं ज़िन्दगी में ...(वीरेंद्र)/0-074

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-049-"रात भर बहुत समझाया

रात भर बहुत समझाया अपने दिल को हमने,
न माना तो पत्थर पर दे मारा दिल को हमने 
देखें तो अब कैसे रोयेगा ये, उस बेदर्द के लिए,
मुस्तकिल  कर दिया खामोश, दिल को हमने. ...(वीरेंद्र)/0-049 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-171-"लोग अपने साथ खोखले

लोग अपने साथ खोखले जज़्बात लिए फिरते हैं,
इज़हार करते नहीं, कलम दवात लिए फिरते हैं,
ज़रुरत पर, हमदर्दी के दो अल्फाज़ निकलते नहीं,
शायरी के लिए लफ़्ज़ों की सौगात लिए फिरते हैं...(वीरेंद्र)/0-171

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी") 

0-230-"सदियाँ बीत गईं, तुझे

सदियाँ बीत गईं, तुझे मगर भूला नहीं हूँ मै,

वो बातें, समां, हसीन मंज़र, भूला नहीं हूँ मै,

अपनी जिद में तूने किनारा कर लिया मुझसे,

पर तेरा वो जोशे-ए-मुहब्बत भूला नहीं हूँ मै....(वीरेंद्र)/0-230

U

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-435-"मै भला क्यों नाराज़

मै भला क्यों नाराज़ हो जाऊं तुझसे,
क्या कभी कोई नाराज़ हुआ है खुदसे,
तुझे जुदा न कर सकीं पाबंदियां कभी,
खामोशी में भी मै बात किये गया तुझसे ./..(वीरेंद्र)/0-435

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

--366-"अजीब से क़र्ज़ हैं तेरे

अजीब से क़र्ज़ हैं तेरे मुझ पर ,
मै ना कभी उन्हें चुका पाऊंगा,
मेरी शायरी मकरूज़ रहेगी तेरी,
तेरे बगैर ना कभी लिख पाऊंगा...(वीरेंद्र)/0-366

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-260-"जिसकी है कृति

जिसकी है कृति,
व्योम-वसुंधरा ब्रह्माण्ड की,
जिसने की व्यवस्था पवन-पानी की,
अर्चना करू उस जीवन-दात्री प्रकृति की,

समस्त विश्व में कीर्ति है जिस शक्ति की,
श्रद्धा अर्पित होती है जिसको विभिन्न रुपी,
हर प्राणी पर जिसकी दया दृष्टि,
वंदना करूं उस प्रकृति की

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-230-"मै हूँ,

मै हूँ,
तू भी है,
फिर क्या नहीं है,
शायद आपसी सामंजस्य नहीं है.


आपसी सामंजस्य क्यों नहीं है,
वो ही तो है प्रेमाधार,
मानता तू है,
मै भी.

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-149-"बहुत आशाएं थीं, बड़ी

बहुत आशाएं थीं, बड़ी आकांक्षाएं थीं,
मगर, जब कटु वास्तविकताएं देखीं,
पाया, सब व्यर्थ की महत्वकांक्षाएं थीं,
माँ-बाप को सुख देने की मनो-कामना,
स्वयं को व्यवस्थित करने की लालसा,
देश व् समाज को कुछ देने की ललक,
सब धरी की धरी रहती दीख रही है,
आरक्षण की तलवारें ललकार रही हैं,
बुद्धि पाकर भी बुद्धू बनाया जा रहा हूं,
पाप न किया पर पापी बनाया जा रहा हूँ,
मै आज विद्या-मंदिर छोड़के जा रहा हूँ...(वीरेंद्र)/२-१४९

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-254-"भावनाएं भी डंक मारने

भावनाएं भी डंक मारने लगीं हैं, अब तो,
जहाँ सर उठाती हैं, कुचल देता हूँ मैं उन्हें./2-254 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-206-"भीतर न आ सकें गम


भीतर न आ सकें गम, खुशियों को परिंदा भी न मार सके पंख,
खुशियों को मैंने घर में समेट लिया और दरवाज़ा कर लिया बंद..(वीरेंद्र)/2-206

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-171-"मेरी आरज़ू, मेरी आबरू.

मेरी आरजू,
मेरी आबरू,
मेरी जान,
हो जा रूबरू
सता लिया,
रुला लिया,
मान जा तू,
तरसा दिया,
तडपा दिया,
माफ़ी दे तू,...
भुलाया तूने
झटका तूने,
मै क्या करू.
दिल दिखाऊँ,
घाव दिखाऊँ,
अथवा अश्रू.
पूरी हो जा,
मेरी आरजू.. . . (वीरेंद्र)/२-१७१

राचन: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Friday, 16 August 2013

1-216-"भूल जाना उसे और आसान

भूल जाना उसे, और भी आसान हो जाता,
थोड़ी सी बेवफाई काश वो और कर जाता ..(वीरेंद्र)/1-216

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-076-"मै भी अगर बेवफा होजाऊं

मै भी अगर बेवफा हो जाऊं ,तो माफ़ कर देना दोस्त,
मै करूँ भी तो क्या, मेरा वास्ता बेवफाओं से ही जो पड़ा है...(वीरेंद्र)/1-076

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-542-"अब न दे पाएंगे हम अपनी

अब न दे पाएंगे हम अपनी बेगुनाही का कोई सबूत,

गुज़रे वक्त का नामोनिशां अब ना रहा हमारे पास है..(वीरेंद्र)/1-542 


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-543-"दिल क्यों दे दिए

दिल क्यों दे दिये खुदा ने इंसान को,
जब इंसान के लिए जिस्म ही काफी थे ..(वीरेंद्र)/1-543

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-220-"मुख़्तसर से एक मुहब्बत में

मुख़्तसर सी एक मुहब्बत में हम टूटकर रह गए,
कोई सिखा दे हमें भी, टूटने के बाद फिर से जीना...(वीरेंद्र)/1-220

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-391-"मुस्कुराहटों को अपनी जो

मुस्कुराहटों को अपनी जो होठों में दबाये बैठे हो,
आज तुम हमसे अपनी पहचान क्यों छुपाये बैठे हो..(वीरेंद्र)/1-391

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-390-"तुम न आतीं आज

तुम न आतीं आज तो हम बीता हुआ कल हो जाते,
तुम अगर ठहर जातीं आज, तो हम सदियों जी जाते..(वीरेंद्र)/1-390

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-442-बहुत अरसे बाद अब


बहुत अरसे बाद अब जाके सुकून मिला है,

लम्बी दुआओं का आज जाके फल मिला ह,

एक पुराना ज़ख्म जो बन रहा था नासूर,

उसे काट फेंकने को नश्तर माकूल मिला है..(वीरेंद्र)/1-442



रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-386-"दुनिया से खुदगर्जी का

दुनिया से खुदगर्जी का नाम उड़ जाए,
गर हर इंसान एक आइना घर ले आए...(वीरेंद्र)/1-386

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-389-"मै भी शायद अच्छा इंसान

मै भी शायद अच्छा इंसान बन जाता,
अगर ये दुनिया मेरे हिसाब से चलती..(वीरेंद्र)/1-389

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-219-"अब ख़त्म भी कर डालो

अब ख़त्म भी कर डालो उन बच-खुचे रिश्तों को भी,
रख छोड़े थे महज़ नुमाइश के लिए तुमने जो कभी...(वीरेंद्र)/1-219

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-345-"बेवफा ने लगा ली मुझसे बाज़ी

बेवफा ने लगा ली मुझसे बाज़ी जान-जान की,
उसे इल्म था मुझे उससे हार जाने की आदत है...(वीरेंद्र)/1-345

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-218-"सोचते थे, एक पल भी न

सोचते थे, एक पल भी न रह पाएंगे हम उनके बिना,
आज किस तरह इतनी सदियाँ बीत गयीं उनके बिना ...(वीरेंद्र)/1-218

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-217-"कोई ना होता बेवफा, सब

कोई ना होता बेवफा, सभी बा-वफ़ा ही कहलाते,
अगर आरज़ू पूरी हो जाया करती तसल्लियों से...(वीरेंद्र)/1-217

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-384-"किसी को हमें याद नहीं

किसी को हमें नहीं याद करना तो ना करे, पर
जब हम भूल जाएँ उसे, तो शिकायत ना करे..(वीरेंद्र)/1-384

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-385-"मौसम बदलकर बहुत कुछ

मौसम बदल कर, ख़ुशी बहुत कुछ दे जाता है,
पर इंसान रंग बदलकर बस गिरगिट बन जाता है...(वीरेंद्र)/1-385

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-439-"ज्यूं ज्यूं दिल पथरीले

ज्यूँ ज्यूँ दिल पथरीले होते जा रहे हैं,

मेरे शेर बड़े ही दर्दीले होते जा रहे हैं,

मै तो शेरों में सिर्फ दर्द ही भर देता हूँ,

लोग तो मगर ज़हरीले होते जा रहे हैं


रचना: © वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")  ..(वीरेंद्र )/0-439

Wednesday, 14 August 2013

1-388-"मेरी मुहब्बत का लेगी

मेरी मुहब्बत का लेगी इम्तहान और कितनी बार तू,
कब तक यूंही करता रहूँगा  कुर्बान मै दिल की आरज़ू...(वीरेंद्र)/1-388

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-229-"आरज़ू थी शाम ढले तुम

आरज़ू थी शाम ढले तुम आते,
जुल्फों की खुशबू में मुझे सुलाते,
ना तुम आये, ना नींद ही आयी,
चाँद तारे कबतक साथ निभाते...(वीरेंद्र)/0-229

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-406-"कहते हैं जो लोग,सुख-दुःख

कहते हैं जो लोग, सुख-दुःख बांटेंगे मिलकर,
अक्सर ही छीनकर सुख, वो निकल जाते हैं,
कन्धों पे लाद जाते हैं, दुखों की भरी झोली
बोझ अपना हल्का करके,  वो बदल जाते हैं ..(वीरेंद्र)/0-406

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-183-"प्रिये तुम हो हजारों मील

प्रिये, तुम हो हजारों मील दूर मुझसे,
पर इन हवाओं से मुझे स्पर्श तुम्हारा मिल रहा है,

तुम न कहो कुछ भी चाहे मुझसे,
पर मेरे दिल को, तुम्हारे दिल का हाल मिल रहा है,

तुम मुझे याद आती रहती हो हर पल,
बस इसीलिए वक्त मेरा कुछ सुकूं से निकल रहा है,

मेरे ख्वाबों में तुम आती रहना प्रतिदिन,
सोचना न तुम, मेरा काम तुम्हारे  बिन चल रहा है,

यूं तो यादें तुम्हारी साथ दे रहीं हैं मेरा,
पर पाने को मुस्कान तुम्हारी, मन मेरा मचल रहा है,

विरह क्या चीज़ है मुझे पता नहीं था,
आज यूं बिछड़ कर तुमसे, पता सब मुझे चल रहा है,

प्रिये तुम  हो हजारों मील दूर मुझसे,
पर इन हवाओं से, मुझे स्पर्श तुम्हारा मिल रहा है.

2-182-"काश एक ऐसी भी फेसबुक

काश एक ऐसी भी फेसबुक होती,
जिसमे सिर्फ मै होता, तुम होती,
मै तुम्हे 'लाईक 'करता रहता,
तुम मुझे 'कमेन्ट 'करती रहतीं,

न कोई टैगिंग की ज़रुरत होती,
न कोई फ्रेंड रिक्वेस्ट ही होती,
बस मै और तुम ही छाये रहते,
कोई फालतू फ्रेंडलिस्ट न होती,

भावनाएं हमारी खूब व्यक्त होतीं,
न मै शरमाता न तुम शरमातीं,
कोई हमें ब्लोक नहीं कर पाता,
न अन्फ्रेंड की कोई नौबत होती,

लाईक कमेन्ट की आज़ादी होती,
एकदूजे पे न कोई पाबन्दी होती,
न मै झांकता तुम्हारी लिस्ट में,
न ही तुमको  कोई जलन होती,

तुम मुझे निर्भय हो लाईक करतीं,
मना करने से किसीके न रुकतीं,
न कोई ग्रुप होता न कोई राजनीति,
मै मेंबर होता, तुम एडमिन होतीं......(वीरेंद्र)/२-१८२

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")
 

 

2-181-"कब से व्याकुल था मन

कब से व्याकुल था मन,
भटका भटका सा था हर क्षण,
न जाने किसे तलाशता था,
आज हुआ रहस्योद्घाटन,

तुम्हारे चमकीले ये दो नयन,
अम्बर को देते नीला रंग,
तुम्हारे गेसुओं से बनती घटाएँ,
तुम्हारी मुस्कान से आता बसंत,

खुशबुएँ तुम पर बिखेर दूं,
प्यार अपना तुम पर उंडेल दूं,
आज जो मैंने पा लिया तुम्हें,
शेष खुशियों को मै फेर दूं.   . . . . .(वीरेंद्र)/२-१८१

रचना: वीरेंद्र सिन्हा )"अजनबी")

2-177-"कुदरत का कहर भी है

कुदरत का कहर भी है कैसा प्रचंड,
चाहे बिहार हो या चाहे उत्तराखंड,

कुदरत कैसी हुई बेरहम गरीब पर,
आकाशी-आफत गिरी, तो गरीब पर,

गरीब ने दिया दरबदर अमीरों को सहारा,
मगर खुद घर समेत बह गया बेचारा,

गरीब का बच्चा अगर भूख से मरा,
तो सरकारी खाना खाकर भी मरा,

ये कैसा मंज़र भगवान् तू दिखा रहा,
एक पिता बच्चे की चिता जला रहा ... (वीरेंद्र)/२-१७७

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी") 

2-175-"कौन कहता है आरजुएं

कौन कहता है आरजुएं पूरी नहीं होतीं,
मेरी तो हर एक आरज़ू पूरी हो रही है,

मैंने ही बुलाया था दिलकश बारिश को,
आज ये बरसात यूं ही नहीं हो रही है,

तुम्हें चाहिए थी शीतलता जल-वर्षा की,
पर तुमसे ज्यादा ज़रुरत मुझे हो रही है,

भीग रहा हूँ मै भावनाओं के समंदर में,
आलिंगनों की मुझपर बारिश हो रही है,

कैसे कहते हैं लोग, बारिश बंद हो गई,
मेरे भीतर तो वह,  अब भी हो रही है,

कौन कहता है आरजुएं पूरी नहीं होतीं,
मेरी तो हर एक आरज़ू, पूरी हो रही है.....(वीरेंद्र)/२-१७५

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-188-"न जाने तुम दूर हो या मौन

न जाने तुम दूर हो, या मौन हो,
तुम स्वयं नहीं, तो फिर कौन हो,
अद्रश्य ऊर्जा आ रही है मुझ तक,
ऊर्जा स्त्रोत तुम नहीं तो कौन हो...(वीरेंद्र)/२-१८८

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-187-"तुम एक व्यक्तित्व ही नहीं

तुम एक व्यक्तित्व ही नहीं, एक एहसास भी हो,
संभावना ही नहीं, तुम यथार्थ का आभास भी हो,
ऊर्जान्वित हो जाता हूँ मै तुम्हारा सामीप्य पाकर,
तुम भावना ही नहीं, भावनाओं की मिठास भी हो...(वीरेंद्र)/२-१८७

रचना : वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-186-"तुम न मिलते तो न जाने

तुम न मिलते तो ,मै कितना उदास होता,
बीते हुए दौर की दर्दीली यादों के पास होता,
मै क्या बताऊँ तुम्हें मेरे हमदम मेरे दोस्त,
दर्द के किस मुकाम के, मै आस पास होता ...(वीरेंद्र)/२-१८६

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-185-"ये कैसी सुखद घडी आगई

ये कैसी सुखद घडी आ  गई मेरे जीवन में,
तेरी आवाज़ की प्रतिध्वनि गूंजी आँगन में,
किसी मरुस्थल में प्यासा मै भटक रहा था,
आगमन पर तेरे, नहां रहा हूँ मै सावन में . .  (वीरेंद्र)/२-१८५

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-184-"तुम्हे निहारकर आज मौसम

तुम्हे निहारकर आज मौसम भी बदल गया है,
तुम्हारे रूप की आंच से, संयम पिंघल गया है,
मै अनभिग्य था सावन की इतनी चंचलता से,
आज ये मन बावरा हाथ से मेरे निकल गया है .. (वीरेंद्र)/२-१८४

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-180-"मैंने थमा था तुम्हारा हाथ

मैंने थामा था, तुम्हारा हाथ,
निभाने को , तुम्हारा साथ,
तुमने क्या समझ लिया ?
चाहिए था हाथ, नहीं साथ ? ..(वीरेंद्र)/२-१८०

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-179-"आज मुझे कुछ अलग

आज मुझे कुछ अलग अनुभूति हो रही है ,
मेरे विचारों की दिशा परिवर्तित हो रही है,
निराशाओं में आशाओं का हो रहा मिश्रण,
भावों में आशावादिता प्रस्फुटित हो रही है...(वीरेंद्र)/२-१७९

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-178-"तुम कौन थीं द्रुतगति

तुम कौन थीं द्रुतगति से अवतरित हो गईं मेरे जीवन में,
मेरी पीडाओं व् संवेदनाओं को भांप लिया कुछ ही क्षण में,

पर निद्रा टूटी , बज्र-पात हुआ, वो तो मीठा सपना निकला,
कल्पित खुशियाँ लुप्त हो गईं द्रुतगति से दुसरे ही क्षण में. ...(वीरेंद्र)/२-१७८

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-174-"मस्तक पर चिंता-रेखाएं

मस्तक पे चिंता-रेखाएं चन्दन नहीं भरता,
अग्नि की प्रताड़ना से,  कुंदन नहीं मरता,
मिल ही जाती है सांत्वना ह्रदय को वरना,
देव-द्वार पे कोई दुखी वंदन नहीं करता. ...(वीरेंद्र)/२-१७४

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-167-"भावना-विहीन दोस्ती

भावना -विहीन दोस्ती ,
दो पत्थरों में हो सकती है,
पर, दो इंसानों में नहीं....(वीरेंद्र)/२-१६७

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-190-"प्यार अत्यंत अमूल्य भाव है,

प्यार अत्यंत अमूल्य भाव है,
प्यार को भुलाने की कीमत नहीं,
प्यार जिसे भुला सकें, वो प्यार ही नहीं,

प्यार में इंतज़ार बेकार है,
प्यार में इकरार का मूल्य भी नहीं,
प्यार जो सहमती मांगे, वो प्यार ही नहीं,

प्यार खुद ही रौशन होता है,
प्यार को प्रज्वलित करने की ज़रुरत नहीं,...
प्यार की लौ स्थायी है, उभारने की ज़रुरत ही नहीं,

प्यार एक भाव है, विचार नहीं,
प्यार त्याग है, अधिकार नहीं,
प्यार आत्मिक सम्बन्ध है कोई व्यवहार नहीं. .(वीरेंद्र)/२-१९०
 
रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")