Sunday, 14 July 2013

1-387-"बेरहमी से तोड़ डालते हैं

बेरहमी से तोड़ डालते हैं बार बार वो दिल मेरा,

उन्हें क्या फ़िक्र, खुद का दिल तो पत्थर का ठहरा...(वीरेंद्र)/1-387


रचना: वीरेंद्र सिन्हा  ("अजनबी")

Saturday, 13 July 2013

0-292-"गनीमत है तेरी बेवफाई

गनीमत है तेरी बेवफाई की शहर में चर्चा नहीं होती, 
क्योंकि किसी का दिल टूटने में, आवाज़ नहीं होती,
छुपाये फिर रहा हूँ मै टूटा हुआ दिल अपने सीने में,
कैसे बताऊँ, अब दिल धड़कने की आवाज़ नहीं होती. ..(वीरेंद्र)/0-292

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Friday, 12 July 2013

0-387-"तेरा प्यार, प्यार ना था

तेरा प्यार, प्यार ना था,
एक वहम था, टूट गया,
मुझे बस एक बुखार था,
जो चढ़ा, और उतर गया. ..(वीरेंद्र)/0-387

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-135-"मै तो सो जाऊँगा कब्र में

मै तो सो जाऊंगा कब्र में बगैर कफ़न,
बदन मेरा तो ढक देगी खाक-ऐ-वतन,
मेरी फ़िक्र ना  करो दौलतमंदों, मगर,
किसी मजलूम का ज़रूर ढक देना बदन ..(वीरेंद्र)/0-135

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-194-"गम नहीं उसने मेरी

गम नहीं उसने मेरी मुहब्बतों का क्या सिला दिया,
मलाल है मैंने जज़्बात को संगदिल पर क्यों लुटा दिया. .(वीरेंद्र)/1-194

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-538-"इंसानियत दफन हो चुकी

इंसानियत दफन हो चुकी, रोने का फायदा कोई नहीं,
दिलों में रहमो-जज़्बात नहीं, तो दर्द होता कोई नहीं...(वीरेंद्र)/1-538

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-537-" रिहा कर दिया जब तुमने

रिहा कर दिया जब तुमने मुझे, रिश्तों की कैद से,
अभी तक बाँध क्यों रक्खा है, एहसासों की डोर से .(वीरेंद्र)/1-537

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-536-"रखने को अपना वजूद कायम

रखने को अपना वजूद कायम, चिराग को अँधेरा चाहिए,
रखने को जिंदा अपनी शायरी, हमें दिल पर चोट चाहिए...(वीरेंद्र)/1-536

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-193-"हम तो अपनी वफ़ा

हम तो अपनी वफ़ा का सिला पाकर चुप बैठ गए,
तुम थक न जाना, रकीबों को आजमाते-आजमाते..(वीरेंद्र)/1-193

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-535-"बड़ा खुशनसीब होगा वो,

बड़ा खुशनसीब होगा वो, जिससे आप खफा हैं,
जानना ये ज़रूरी नहीं कि किस बात पे खफा हैं...(वीरेंद्र)/1-535

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-531-"ज़िन्दगी को किसी ने ख्वाब

ज़िन्दगी को किसी ने ख्वाब कहा किसी ने लाचारी,
इंसान को क्या क्या दे छोटी सी ये ज़िन्दगी बेचारी..(वीरेंद्र)/1-531

 रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-383-"सबको मालूम है, फिसलन है

सबको मालूम है फिसलन है, और हैं ज़ुल्मों-सितम, फिरभी 
बड़े अरमान से प्यार की दुनिया में रखते हैं लोग पहला कदम..(वीरेंद्र)/1-383

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-757-"मुझसे मिली तुझे तन्हाई



रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-075-"कोई न रहा याद,

कोई न रहा याद , जुबां से सदा तेरा ही नाम निकला
कट गए ज़माने से हम, दोस्ती का ये अंजाम निकला..(वीरेंद्र)/1-075

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-380-"इतना गुमाँ न करो,

इतना गुमाँ न करो, अपने पत्थर-दिल पर,
तोड़ने वाले तो उसे भी तोड़ डालेंगे एक दिन ...(वीरेंद्र)/1-380

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-344-"ले आओ मेरे पास, जितने

ले आओ मेरे पास, जितने भी दर्द इस शहर में हैं,
मुझे शौक-ऐ-दर्द है, सारे जहाँ के दर्द मेरे जिगर में हैं..(वीरेंद्र)/1-344

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Saturday, 6 July 2013

2-176-"इंसान की ज़िन्दगी में" (पानी)

इंसान की ज़िन्दगी में यूं तो खुशहाली लाता है पानी,
मगर कभी-कभी हालात में आग भी लगा देता है पानी.

बेपनाह ताकत है पानी में इन्सान को सबक देने की,
देता है ये दाना-पानी उसे, तो छीन भी लेता है पानी,

संवारता चला आया है ये जिंदगियों को अनंतकाल से,
छेड़ा इंसान ने कुदरत को, तो तबाही भी मचा देता है पानी,

पर्वतों जंगलों को अंधाधुंध काटता जा रहा है मूर्ख इंसान,
रोके से वो नहीं रुकता, अक्ल पे उसकी फिर जाता है पानी,

प्रकृति को सब्र बहुत है, देती है बारम्बार चेतावनी उसको,
वो नहीं सुनता जबतक सर से ऊपर नहीं उतर जाता है पानी,

मुट्ठी-भर प्रकृति-प्रेमी यूं तो करते हैं लाख उपाय जतन से,
पर प्रकृति-शत्रु उनकी मेहनतों पर हर बार फेर देता है पानी.....(वीरेंद्र)/२-१७६

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")