Tuesday, 25 June 2013

1-074-"दोस्ती को प्यार का नाम

दोस्ती को प्यार का नाम देके, क्यूं रूखापन दिखा दिया,
देकर खुशियाँ चन्द दिन की, बरसों को क्यों रुला दिया. ..(वीरेंद्र)/1-074

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-382-"तेरी जुस्तजू मे

तेरी जुस्तजू में, उम्र गुज़ार कर हमें क्या मिला,
पा लेते खुदा कभी का, गर तेरी तलाश न होती...(वीरेंद्र)/1-382

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-253-सबकी अपनी अपनी सुविधाएँ


सबकी अपनी अपनी सुविधाएँ,

जितने लोग, उतनी परिभाषाएँ,

जिसने चाहा तोड़ मरोड़ लिया,

क्या है अर्थ, क्या हमें समझाएं...(वीरेंद्र)/2-253



रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-381-"चांदनी कर रही थी जद्दोजहद

चांदनी कर रही थी जद्दोजहद ज़मीं पर बिखर जाने की,
किस्मत से उसकी, हटाके काली घटाएं चाँद निकल आया...(वीरेंद्र)/1-381

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-170-"स्वयं बढ़ाया तुमने जब

स्वयं बढ़ाया तुमने जब मित्रता का हाथ,
फिर क्यों छोड़ दिया, आधे रस्ते ये साथ,
बोलो मुझ पर क्यों किया तुमने बज्रपात,
मै तो एकाकीपन में ही प्रसन्नचित था,
तुमने क्यों शुरू किया अन्तरंग वार्तालाप,
नित नयी नयी पीडाओं से मै मुक्त था,
अपरिभाषित जटिलताओं से अनभिग्य था,
बनकर हमराही, राहों में क्यों छोड़ दिया,
पनघट के बहाने सहरा में क्यों छोड़ दिया,
भावनाएं पुनर्जाग्रत न करते अच्छा था,
कीं थीं, तो उन्हें विसर्जित क्यों कर दिया,
विशाल ह्रदय को संकुचित क्यों कर लिया....(वीरेंद्र)/२-१७०

रचना : वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-173-"आदमी की तराह ही अब

आदमी की तरह ही अब मौसम भी बदलने लगे हैं,
शब्द जो कल तक थे फूल, अब शूल लगने लगे हैं,
प्रेम की वर्षा और ह्रदय-स्पर्श जो करते थे भाव मेरे,
अब उन्हें तलवार की मानिंद लहूलुहान करने लगे हैं. ....(वीरेंद्र"अजनबी")

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")/२-१७३

0-444-खुद कभी देखें न देखें


खुद कभी देखें न देखें आइना लोग, मगर 

आइना साथ रखने की हमें सलाह देते हैं,

हम क्यों उठाएं ज़हमत आइना रखने की,

बिन मांगे जब आइना वे हमें दिखा देते हैं...(वीरेंद्र)/0-444



रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Friday, 21 June 2013

1-378-"खुद होकर फनाह हमने

खुद होकर फनाह हमने, मुहब्बत तुझे सिखा दी,
यह और बात है, तूने वो किसी और पर लुटा दी...(वीरेंद्र)/1-378

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-192-"बहुत मुबारकबाद कबूल

बहुत मुबारकबाद कबूल कर मुझसे ऐ बेवफा,
मेरा दिल दुखाने में मिली बड़ी कामयाबी पर...(वीरेंद्र)/1-192

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-191-"सुन सुनके बेवफाई के

सुन सुनके बेवफाई के किस्से, तंग आ गया हूँ,
अब बंद भी करो, मेरे यार का ज़िक्र मेरे सामने...(वीरेंद्र)/1-191

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-377-"मेरा शिकायत करना, उन्हें

मेरा शिकायत करना, उन्हें नागवार लगता है,
उन पर अब भूत किसी और का सवार लगता है...(वीरेंद्र)/1-377

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-11-चलो एक बार फिर से

चलो एक बार फिर से कसम खाएं,
"आतंकवाद बर्दाश्त नहीं करेंगे,"
"उसका मुंह तोड़ जवाब देंगे"
"पकड़ लिया तो छोड़ेंगे नहीं"
आओ आतंकवाद की फिर निंदा करें,
कुछ सबूत इकठ्ठा करें,
कसम खाएं सज़ा दिलाने की.........(वीरेंद्र)/2-11

रचना; वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-743-"उनके शहर के तूफ़ान

उनके शहर के तूफ़ान, आज ये कैसा कहर ढाने लगे हैं,

बामुश्किल भूले थे जिन्हें हम, आज फिर याद आने लगे हैं..(वीरेंद्र)/1-379


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी") 

1-190-"बेकार हैं रखने सबूत

बेकार हैं रखने सबूत बेवफाई के उनकी,
मुंसिफ भी वो ही हैं, अदालत भी उनकी..(वीरेंद्र)/1-190

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-376-"लोग करते हैं नेकी और

लोग करते हैं नेकी और दरिया में डाल आते हैं,
ज़रुरत पर नेकी की, हम दरिया से निकाल लाते हैं...(वीरेंद्र)/1-376


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-375-"वो पत्थर होता तो

पत्थर भी होता तो पूजने के काम आ जाता,
मगर वो तो बस पत्थर-दिल इंसान निकला..(वीरेंद्र)/1-375

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-374-"हमें क्यों हो दरकार

हमें क्यों हो दरकार, अल्फाज़ और जुबान की,
मेरी आँखें पढ़ती हैं, उनकी आँखें सुनती हैं ग़ज़ल...(वीरेंद्र)/1-374

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-343-"मै"अजनबी" हूँ,

मै  "अजनबी "हूँ तुम्हारे लिए,
कुछ तो हूँ 'सिर्फ' तुम्हारे लिए,
दुनिया मुझे अपना मानती है,
पर मै बेगाना हूँ तुम्हारे लिए..(वीरेंद्र)/0-343

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी") 

1-737-"मेरा खुदा गवाह है,

मेरा खुदा गवाह है,
प्यार मेरा परवान चढ़ा है,
जितना नज़रंदाज़ किया तूने,
प्यार मेरा और भी बढ़ा है.   .    .  ...(वीरेंद्र)/१-७३७

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-373-"अपने होठों से ज़रा हटा

अपने होठों से ज़रा हटा लो बंदिश अपनी,
इनमे दबी मुस्कान को हंसी बन जाने दो...(वीरेंद्र)/1-373

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-363-"मेरे मासूम दिल के इतने

मेरे मासूम दिल के इतने नज़दीक आकर न करो बात,
बड़ी जद्दोजहद से, मैंने इसे फासले रखना सिखाया है..(वीरेंद्र)/1-363

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-331-"दबा दिया दिल में उठी

दबा दिया दिल में उठी तेरी चाहत को,
तुझ पर जब से कोई आंच आने लगी,
ज़िन्दगी को भी कह देंगे अब अलविदा,
इसमें भी हमें नदामत नज़र आने लगी. .(वीरेंद्)/0-331

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Friday, 14 June 2013

3-53-"जाने कौनसी दुनिया का

जाने कौनसी दुनियां का कौनसा दस्तूर निभाया उसने,
मेरे जज्बातों को कभी जगाया, तो कभी दबाया उसने,

करता गया समझौते हरदम बदलते हालात से मै तो,
जब चाहा किनारा किया उसने, जब चाहा बुलाया उसने,

जब भी ज़रुरत दरपेश आयी उसके साथ की मुझे,
अकेलेपन का ही एहसास बस मुझे दिलाया उसने.

मुझ पर बेवफाई की तोहमत वो लगा न सका,
हर बार मै खरा उतरा, जितनी बार आजमाया उसने,

रिश्ते तोडना मुश्किल है ज़रूर, मगर नामुमकिन भी नहीं,
खूबसूरती से तोड़ देता, इलज़ाम जाने क्यों लगाया उसने.

कैसे यादें संभाल कर रख लेते हैं लोग ता-उम्र, "वीरेंद्र",
शिकायतों को तो मेरी याद रक्खा, मुहब्बतों को भुलाया उसने....(वीरेंद्र)/३-५३

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Tuesday, 11 June 2013

1-734-"ये तेरा फैसला है कि तू


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-20-दर्द कराहने से नहीं

दर्द कराहने से नहीं, दवा से दूर होता है,

ज़ुल्म रोने से नहीं, लड़ने से ख़त्म होता है,..(वीरेंद्र)/2-20


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-188-"मेरे वजूद को बस इतना ही

मेरे वजूद को बस इतना ही माना उसने,
भूलना पड़े उसे किसी को, तो मुझे भुला सके...(वीरेंद्र)/1-188

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-372-"और कितने ज़ब्त का

और कितने ज़ब्त का मुजाहिरा करें, ऐ जाहिद हम,

ये क्या कम है जिए जाते हैं उनकी बेरुखी के बाद भी हम...(वीरेंद्र)/1-372


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Friday, 7 June 2013

1-371-"बचाए फिरता था प्यार की

बचाए फिरता था प्यार की कीमती दौलत ज़माने से,
जब वोही न रही तो आओ ज़माने वालों लूट लो मुझे..(वीरेंद्र)/1-371


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-170-"अच्छी खासी छोड़ दी थी

अच्छी खासी छोड़ दी थी मैंने शायरी,
उठाकर रख दी थी कलम और डायरी,
तूने आकर मेरी ज़िन्दगी में, खामखाँ,
फिरसे शुरू करवा दी मेरी शेरो-शायरी...(वीरेंद्र)/0-170

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-37-एकाकीपन

सामाजिक प्राणी होने का गर्व,
संबंधों रिश्तों नातों का घिराव,
चहुँ ओर अपने परायों का जुड़ाव,
जीवन व्यतीत होता सबके बीच,
उत्सव अनेक त्यौहार अनगिनत,
सब ही तरफ गीत और संगीत,
किसी से बैर तो किसी से प्रीत,
जीवन बस ऐसे ही रहा बीत, 

विचित्र युग का हुआ पदार्पण,
सिलसिला चला विदाई का, 
रिश्ते टूटे सम्बन्ध हुए समाप्त,
स्वार्थ ने गला दबाया भलाई का,
सुनाई नहीं देते, गीत संगीत,
प्रीत अद्रश्य हुई शत्रु गए जीत,
हर व्यक्ति बेबस, जीवन नीरस
न आवाज़ दे, न करे पुकार कोई,
दर्पण सिवा एक नहीं संगी साथी,
वही प्रतिभा वही गुण-अवगुण,
न कोई देख रहा न रहा है सुन.

क्या यही है परिवर्तन,
क्या यही है एकाकीपन.............(वीरेंद्र)/2-37 
रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-51-मेनू मिल गई सी ओ

मैनू मिल गई सी ओ बैसाखी दे मेले विच,
फड लिया हथ मै ताँ सारेयां दे सम्मने,
पै गया वड्डा स्यापा रौला पांदे लोकी ने,
हो गई पेशी मेरी पिंड वाल्यां दे सम्मने,
कोई मैनू दस्से ज़रा हून जी मै की कराँ...(वीरेंद्र)/2-51

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-072-"क्यों की हमने दोस्ती

क्यों की हमने दोस्ती, इस जहां में,
जब हमें भी वही मिला जो दुश्मनों ने पाया. ..(वीरेंद्र)/1-072


रचना : वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Wednesday, 5 June 2013

0-228"मुझे खुद नहीं पता मै

मुझे खुद नहीं पता मै क्यों चाहता हूँ तुझे,
क्या बात है जो औरों में नहीं दीखती मुझे,
हजारहा कोशिशें कीं तुझे भूलने की मगर,
हर मर्तबा ही नाकामयाबी हाथ लगी मुझे. ...(वीरेंद्र)/0-228

रचना : वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-367-"दूर रहने को कह रहे हैं

दूर रहने को कह रहें हैं, मेरे करीब आकर,

आग बुझाने को कह रहे हैं, आग लगा कर..(वीरेंद्र)/1-367

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-368-"मत हटा देना ये बंदिशें

मत हटा देना ये बंदिशें तुम मुझ पर से,
वरना मेरे जज़्बात मुझपे हावी हो जायेंगे..(वीरेंद्र)/1-368

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-370-"उसकी आवाज़ न सुनी सदियाँ

उसकी आवाज़ न सुनी सदियाँ बीत गईं इंतज़ार करते,
कौन कहता है ,"ख़ामोशी भी बोल उठती है कभी-कभी"..(वीरेंद्र)/1-370

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-72-अति हर्षित आज्ञापक

अति हर्षित आज्ञापक मेरा अंतर्मन,
कहे मुझे बारम्बार औ आत्यंतिक,
जाने को लोक-कल्याण के रण में,
कष्टों से आच्छादित मेघ हटाने.....(वीरेंद्र)/2-72

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-169-"उस पर कुर्बान सभी


उस पर कुर्बान सभी दौलतें और ये बहार,
सदियों तक कर लूंगी मै इन्तजारे-यार....(वीरेंद्र)/1-169

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-80-दो कौड़ी की कविता

दो कौड़ी की कविता पर दो कौड़ी के मिलें कमेंट्स,
दो कौड़ी का मै कवि, दो कौड़ी की हुई ओडीएन्स,
दो कौड़ी की हो गई फेसबुक भी अब तो ग्रुप वालों,
हर बार दिखाती "एरर" और हर बार हो जाती हेंग,
दो कौड़ी का ही नेटवर्क भी अब सब मित्रों के पास,
कभी चले, कभी रुके, बीच-बीच में करता रहे बेंग,
न रहा कोई पर्याय उठा कर रख दिए डायरी कलम,
जोइन करूंगा अब अच्छा सा ठलुओं का कोई गैंग..(वीरेंद्र)/2-80

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Tuesday, 4 June 2013

0-318-"अब मै निकला हूँ दुश्मनों

अब मै निकला हूँ दुश्मनों की तलाश में,
दोस्त तो अब तक बहुत देख लिए मैंने,
खानी है चोट तो दुश्मनों से क्यों न खाऊँ,
दोस्तों को तो बहुत से मौके दे लिए मैंने. ...(वीरेंद्र)/0-318


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Monday, 3 June 2013

2-169-"वो मेरे हैं, लगे सीने से हैं

वो मेरे हैं,
लगे सीने से हैं,
उनके बिना मै रह नहीं सकता,

औरों से न्यारे हैं,
मुझे वो प्यारे हैं,
उन्हें मै किसी को दे नहीं सकता,

जाने पहचाने हैं,
बहुत ही पुराने हैं,
उनका साथ मै छोड़ नहीं सकता,

वो यादें वादे हैं,
अपनों ने दिए हैं,
ये निशानी किसीको दे नहीं सकता,

इनमे खो चूका हूँ,
इनमे जी चूका हूँ,
ये अज़ीज़ गम हैं, इन्हें भुला नहीं सकता. ...(वीरेंद्र "अजनबी")/2-169


रचना: वीरेंद्र सिन्हा  ("अजनबी")