Tuesday, 21 May 2013

1-366-"मत छुपाओ, छुपेगा नहीं,

मत छुपाओ, वो छुपेगा नहीं, वो तो प्यार है,
मत भूलो इसका छुपाना भी इसका इज़हार है...(वीरेंद्र)/1-366

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-359-"बच न सके चराग

बच न सके चराग बुझने से, और अब ये आलम है,
आंधियां चली गईं, बुझे चराग अब भी खौफ खाए हैं..(वीरेंद्र)/1-359

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-168-"मुद्दत गुज़र गई ,

मुद्दत गुज़र गई ,जब उसने अलविदा कहा,
इन्तजारे-यार मगर आज भी कायम क्यूँ है...(वीरेंद्र)/1-168


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-038-"मै 'अजनबी' ज़रूर हूँ मगर सिर्फ

मै 'अजनबी' ज़रूर हूँ मगर सिर्फ उसके लिए,
बाकी दुनिया तो मुझे बदस्तूर पहचानती है. ...(वीरेंद्र)/1-038

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-369-"ज़माना हो जाय अमीर

ज़माना हो जाय अमीर,मुझे क्या गम है,
मेरे पास है मेरा ज़मीर, यही क्या कम है..(वीरेंद्र)/1-369

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-365-" तेरे आंसू मेरे दर्द की

तेरे आंसू मेरे दर्द की तस्दीक अब करने लगे हैं,
शायद, मै और तुम मुहब्बत अब करने लगे हैं..(वीरेंद्र)/1-365

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-259-"पवन पैगाम पहुंचाए

पवन पैगाम पहुंचाए पल-पल,
प्यारे परदेसी प्रियतम तलक,
मै मंत्र-मुग्ध मुस्काऊँ मंदमंद,
मनमीत का मंगल आने तलक ..(वीरेंद्र)/2-259

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-168-"क्यों साथ निकले थे हम,

क्यों साथ निकले थे हम,
क्यों साथ में बढे थे हम,
किसी मोड़ पे मुड़े क्यों नहीं,
भीड़ में हम बिछुडे क्यों नहीं,
क्यूँ हम दूर इतनी आ गए,
क्यूँ बातों में दिल की आ गए,
मालूम था थक जाओगे तुम,
पता था चल नहीं पाओगे तुम,
तो कोई पूछे चले ही क्यों थे,
कदम राहों में रखे ही क्यों थे,
अब थोड़ी दूर तो और चलो,
शायद कोई दोराहा मिले आगे,
तुम अपनी राह पकड़ सको,
मै 'अजनबी' बन सकूँ और....
और 'अलविदा' कह सकूँ तुम्हे. ......(वीरेंद्र)/2-168

 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-227-"तुम्हें सिर्फ चाहता था, पर

तुम्हें सिर्फ चाहता था पर मुहब्बत मै, अब  करने लगा हूँ,
चाहत में मरना नहीं आया इश्क में पर, अब मरने लगा हूँ.
मुकद्दर में न यकीं था मेरा कभी, देखके रकीब का नसीब,
किस्मत के खेल पे मुकम्मल यकींन मै, अब करने लगा हूँ..(वीरेंद्र)/0-227

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Wednesday, 15 May 2013

1-073-"है तो तू बेवफा,

है तो तू बेवफा, फिरभी दोस्ती के काबिल है,
तुझमे है कोई बात जो और कहीं नहीं हासिल है...(वीरेंद्र)/1-073


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-133-"मुझे क्यों हो तुझसे कोई

मुझे क्यों हो तुझसे कोई शिकायत,
तुझे भी ज़माने के साथ चलना था,
ये रिवाज ये रस्म कब तक चलते,
एक दिन तो तुझको भी बदलना था..(वीरेंद्र)/0-133


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Tuesday, 14 May 2013

3-52-"हकीकतें नहीं बदल जातीं,

हकीकतें नहीं बदल जातीं, खुशफहमी पाल लेने से,
इंसान नहीं बदल जाया करते, मुखौटे डाल लेने से,

तोहमतें लगाके खुद को कुछ तसल्ली हो जाती है,
रूह मगर तड़प जाया करती है, आहें मोल लेने से,

हक अदा करना पड़ता है इंसानियत का जहाँ में,
हालात नहीं बदल जाया करते चश्मा ओढ़ लेने से.


खुदा बनाता, लिखता है इंसान की तकदीरें, वरना,
नसीब मिट जाया करते, तहैय्या कर लेने से.???..(वीरेंद्र)/3-52


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")



 





1-362-"हुस्न की तस्दीक होना


हुस्न की तस्दीक होना भी ज़रूरी है, चाहने वाले की जुबां से,
कोई यूंही हसीन नहीं हो जाता खुद को हसीन समझ लेने से..(वीरेंद्र)/1-362
रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")
 

Friday, 10 May 2013

1-167-"मुझे जन्नत की तलाश


मुझे जन्नत की तलाश क्यों हो,
मुझे तो बस इन्तजारे-यार बहुत है....(वीरेंद्र)/1-167


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-703-"बहुत जल्दी कर दी तोड़ने


दिल तो तोडा ही था, अब दोस्ती भी तोड़ दी तुमने,
कुछ तो बाकी रखते तोड़ देने की धमकी के वास्ते. ..(वीरेंद्र)/१-७०३

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")





 

Thursday, 9 May 2013

0-291-"मुझसे इतनी वफ़ादारी होती

मुझसे इतनी वफ़ादारी होती नहीं,
तो फिर क्यों मुझे तू छोडती नहीं,
छोड़ भी दे मुझे, अब तू ऐ जिंदगी,
ज़िद इतनी भी, अच्छी होती नहीं....(वीरेंद्र)/0-291

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Wednesday, 8 May 2013

0-073-"वही रास्ते और वही आसमान

वही रास्ते और वही आसमान, पर वो हमसफ़र नहीं,
उजड़ा-उजड़ा, वीराना सा है, हरा भरा वो मंज़र नहीं,
मंजिल पीछे रह गई, सामने तो धुंध है और कुछ नहीं,
क्यों ना रोक लूं कदम, जब रहा मकसदे-सफर नहीं...(वीरेंद्र)/0-073

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Tuesday, 7 May 2013

0-226-"तुझको नहीं भुला सका

तुझको नहीं भुला सका, तमाम कोशिशें कर लीं मैंने,
तेरे वास्ते नफरतें भी दिल में जगा कर देख लीं मैंने,
मुझे बेहद नाज़ था, अपने इस दिल की मजबूती पर,
मगर नाकामी मिली और शिकस्त मंज़ूर कर ली मैंने. ..(वीरेंद्र)/0-226
 


रचना  :वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-213-"चाहत का गला मैंने घोंट

चाहत का गला मैंने घोंट दिया, आंसू सारे पोंछ लिए,
उड़ान ख़त्म हुई मेरी, सैय्याद ने पंख सारे नोंच लिए...(वीरेंद्र)/1-213

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-166-"उसको क्या अंदाज़ा

उसको क्या अंदाजा मेरी हदे-मुहब्बत का,
इन्तेजारे-यार बढ़ता जायगा सदियों तक...(वीरेंद्र)/1-166


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-166-"बहुत नष्ट कर लिया अपनी

बहुत नष्ट कर लिया अपनी भावना को,
हिला भी न सका मै एक पत्थर दिल को,
ठहरे हुए  पानी में फ़ेंक कर एक कंकड,
सुकून मिला देखके हिलते हुए पानी को. ....(वीरेंद्र)/2-166

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-103-"कद्र नहीं जज्बातों की,

कद्र नहीं जज्बातों की, दुनियां को हमने आजमा लिया,
तंग आ गए जब इंसानों से, बुतों को ही गले लगा लिया...(वीरेंद्र)/1-103

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Saturday, 4 May 2013

2-165-"वो प्यार ही तो था मेरा

वो प्यार ही तो था मेरा,
बस विश्वास ही तो था मेरा,
जो अब तक जीवित रह सका,
वरना कभी का वो मर गया होता,
पौधा लगाकर छोड़ा था, आखिर,
कब तक रहता प्रकृति के सहारे,
वोभी कब तक सींचती पौधे सारे,
कब तक प्यासा रहता वो नन्हा,
और कितना बचता आक्रामकता से,
कबतक ना होता त्रस्त भावुकता से,
अंततः उसे मरना ही था, मर गया. .....(वीरेंद्र)/२-१६५


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Friday, 3 May 2013

0-317-"दोस्त अगर बेगाना भी हो

दोस्त अगर बेगाना भी हो जाय कभी,
तो भी तसव्वुर में हमेशा वो रहता है,
भले उम्मीद न रही हो उसके आने की,
हसीन इमकान फिर भी बना रहता है...(वीरेंद्र)/0-317

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Thursday, 2 May 2013

1-071-"दोस्त, तुझमे और दुश्मन में

दोस्त, तुझमे और दुश्मन में फर्क ही क्या रह गया,
तू भी क़त्ल करके मुझे, छाँव में नहीं धूप में फ़ेंक गया...(वीरेंद्र)/1-071

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-212-"क्यों कर रहे हो भला

क्यों कर रहो हो भला , तुम बगावत खुद से,
मान क्यों नहीं लेते, तुम्हे भी है मुहब्बत मुझसे. ..(वीरेंद्र)/1-212

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Wednesday, 1 May 2013

2-61-"वीराने घर में आये पक्षियों

वीराने घर में आये पक्षियों से भी एक सम्बन्ध सा हो जाता है,
रेल के डिब्बे में मुसाफिरों से भी कुछ दोस्ताना सा हो जाता है,
पहचाने जाने लगते हैं कुछ अनजाने भी रास्तों में कभी-कभी,
परिचित लगने लगते हैं 'अजनबी', फिर क्यों ऐसा हो जाता है. ....(वीरेंद्र)/२-६१

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")