Tuesday, 30 April 2013

2-164-"मै भी रहती सुकूँ से, काश

मै भी रहती सुकून से, काश मुझमे संवेदनाएं न होतीं,
मै भी दोष न देती तुम्हे, काश मुझमे भावनाएं न होतीं,
बहुत आसान है पत्थर दिल हो जाना तुम पुरुषों के लिए,
मै भी हो जाती, काश प्रकृति-प्रदत्त मुझमे ममतायें न होतीं. ...(वीरेंद्र)/२-१६४

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-123-"ग़ज़ल के चोरों का तो वास्ता


ग़ज़ल के चोरों का तो वास्ता है अलफ़ाज़ से,
उन्हें भला क्या लेनादेना किसी के जज़्बात से..(वीरेंद्र)/1-123


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-165-"फींकी दीखती है


फींकी दीखती है रोशनियाँ तमाम शहर की,
जबसे रौशन हुआ घर इन्तजारे-यार के बाद...(वीरेंद्र)1-165

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

3-68-मिलना है जो किस्मत में

मिलना है जो किस्मत में किसी को उसे कोई रोक नहीं सकता,
तू लिखा है मेरी किस्मत में, तो किसी और का हो नहीं सकता,

ये तेरी नम आँखें कर रहीं हैं तस्दीक मेरी पाकीज़ा मुहब्बत की,
वरना बिना जज्बातो-एहसास के, कोई शख्स यूं रो नहीं सकता,

मैंने भी झेलीं तोहमतें, तूने भी देखी हैं नफरतें ज़माने भर की,
इसके आगे इन्तहा-ऐ-इश्क का इम्तिहान कोई हो नहीं सकता,

इश्क भी क्या शै है, गुलाम बना लेती है आज़ाद इंसान को भी,
अपनी मर्ज़ी से बेचारा जाग नहीं सकता, और सो नहीं सकता...(वीरेंद्र)/3-68


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-364-"ऐ खुदा मुझे तौफीक दे,

ऐ खुदा मुझे तौफीक दे,कैसी ये हिमाकत मै कर रहा हूँ,
जिसे तूने बनाया पत्थर, उसमे मुहब्बत मै भर रहा हूँ...(वीरेंद्र)/1-364

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-037-" अजनबी वो समझता ही चला

अजनबी वो समझता ही चला गया मुझे,
ज्यों-ज्यों रकीबों से शनासाई बढती गई ..(वीरेंद्र)/1-037

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-359-" गम नहीं हमें, जो

गम नहीं हमें, जो दुश्मन बना दिया यारों ने,
गम तो है, ख़ाक में मिला दिया खाकसारों ने..(वीरेंद्र)/1-359

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-539-"मैंने बुझा दिए थे उमीदों के



मैंने बुझा दिए थे उमीदों के चिराग, फिर ये आज कैसे जल गए,

सभी अरमान मैंने दबा दिये थे, फिर ये कौन से आज उभर गए...(वीरेंद्र)/1-539



रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-358-"इतनी भीड़ से घिरकर भी

इतनी भीड़ से घिरकर भी, आज मै तन्हा तन्हा सा क्यों हूँ,
उठ रहे हैं कदम उसकी तरफ, पर मै थमा थमा सा क्यों हूँ..(वीरेंद्र)/1-358

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-164-अब ख़त्म होने वाला लगता

अब खत्म होने वाला लगता है मेरा इन्तजारे-यार,
मुझे उसकी महक सी आने लगी है इन हवाओं में...(वीरेंद्र)/1-164


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-357-"कौन बांटेगा दर्द

कौन बांटेगा दर्द, खुद ही से गुफ्तगू अब करनी चाहिए,
तन्हा छोड़ ही दिया है तो  मुझे एक आईना भी चाहिए....(वीरेंद्र)/1-357

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Monday, 29 April 2013

1-361-"मेरे तुम्हारे बीच ना कोई

मेरे तुम्हारे बीच ना कोई गिले होते, न कोई शिकवे होते,
कितना अच्छा होता, गर मै गूंगा होता या तुम बहरे होते...(वीरेंद्र)/1-361

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-343-"मुझमे बचा नहीं है कुछ

मुझमे बचा नहीं है कुछ, शमशान में जलाने को,
बेदर्द ज़माने ने मुझे तो, ता-उम्र बेहद जलाया है..(वीरेंद्र)/1-343

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-341-"हम में ही न रही वो बात

हमीं में न रही वो बात, जो फासले ऐसे हो गए,
ज़ैरे-नज़र तो रहते, भले वो दुश्मन मेरे हो गए. .(वीरेंद्र)/1-341

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-187-"वफ़ा छोड़ कर अब वो

वफ़ा छोड़कर अब वो बेवफा हो गए, मगर
खुदा ध्यान रख, उन्हें कोई बेवफा न मिले. ..(वीरेंद्र)/1-187

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-070-"सूख चुके थे अश्क इन

सूख चुके थे अश्क इन आँखों के अंदर ही अंदर,
अच्छा हुआ आज तेरे जवाब ने जी भर के रुला दिया...(वीरेंद्र)/1-070

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-671-"मुझमे न थी किसी दोस्त को भूल

मुझमे न थी किसी दोस्त को भूल जाने की ताकत,
एक बेवफा की बेरुखी ने वो कूबत भी बक्श दी मुझे. ...(वीरेंद्र)/१-६७१

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-186-"हमने तो वफ़ा करके,

हमने तो वफा करके, रखी है वफा की उम्मीद,
लोग तो बेवफाई करके भी वफ़ा की उम्मीद रखते हैं...(वीरेंद्र)/1-186

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-171-"यूं तो मै बेसब्र बहुत


यूं तो मै बेसब्र बहुत हूँ फितरत से अपनी,
पर बला का सब्र है मुझे इन्तजारे-यार में..(वीरेंद्र)/1-171

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-340-"इतने तो न थे तुम मजबूर

इतने तो न थे तुम मजबूर, कि दूर इतने हो गए,
पर अच्छा हुआ इन फासलों से फैसले तो हो गए...(वीरेंद्र)/1-340

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-140-"अपना सा मुंह लेकर

अपना सा मुंह लेकर ओंधे मुंह जा गिरा मेरा दिल,
बड़ा आया था मेरे और उनके बीच सुलह करवाने.,(वीरेंद्र)/1-140


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-339-"खुदा की दी खुशी

खुदा की दी खुशी मैंने ये सोचकर लौटा दी,
के वो किसी अपने का दर्द न बन जाय कहीं ..(वीरेंद्र)/1-339

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-441-दुनिया से असलियत


दुनियां से असलियत छुपा ली,

पर अपने आपसे छुपाऊँ कैसे।

दिल दिमाग को धता पिला दी,

ढीठ आईने को पिलाऊँ कैसे।..(वीरेंद्र)/0-441



रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-252-"दिमागों से मजबूर हो जाते

दिमागों से मजबूर हो जाते हैं हम,

जिद पर अपनी अड़ जाते हैं हम,



रह कर भी एक दूसरे के दिल में,

बेहद अजनबी से बन जाते हैं हम.



प्यार पर बस नहीं है किसी का,

ये मानने से सदा कतराते हैं हम,



रोता है दिल किसी को याद कर,

अहम् के कारण उसे छुपाते हैं हम,



हर किसी को नहीं मिलता प्यार,

हमें मिला, तो क्यूँ ठुकराते हैं हम,


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-189-"कर दिया नफरतों को

कर दिया नफरतों को मज़बूत,
काश मुहब्बतों को किया होता..(वीरेंद्र)/1-189

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-134-"कुछ यादें भी सीना चाक

कुछ यादें भी, सीना चाक कर देती हैं,
हरेक याद सीने से लगाईं नहीं जाती,
कुछ लोग गर बेवफा निकल जांयें तो,
उनके लिए दुनिया भुलाई नहीं जाती..(वीरेंद्र)/0-134

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-521-"तेरी आँखों में समा जाऊं

तेरी आँखों में समा जाऊं, थोड़ी जगह तो कर ले,
तेरे दिल में उतर जाऊं, थोड़ी तन्हाई तो कर ले...(वीरेंद्र )/1-521

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-185-"बदल भी जाय चेहरा

बदल भी जाय चेहरा हमारा, हम अपनी आँखों से पहचाने जायेंगे,
उनका क्या मगर, चेहरे संग जिनकी नज़रें भी बदल जाया करती हैं..(वीरेंद्र)/1-185

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-338-"मुहब्बत से जाकर

मुहब्बत से जाकर कोई कह दो अब 
हम तैयार हैं इश्क में फिर बर्बाद होने को..(वीरेंद्र)/1-338

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-211-"मै देखता रहूँ तुझे

मै देखता रहूँ तुझे ख्वाब में हमेशा ही,
नींद मुस्तकिल भी आ जाय तो गम नहीं. ..(वीरेंद्र)/1-211

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-143-"आ जायगी नींद देर सबेर


आ जायगी नींद देर सबेर से, करवटें बदलते-बदलते,
करवटें बदलता रह, चादर की सिलवटों को न देख ..(वीरेंद्र)/1-143


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-145-" मेरे मासूम दिल के इतने


मेरे मासूम दिल के इतने नज़दीक आकर न करो बात,
मुश्किल से सुलाया है फिरसे न कहीं जग जांय इसके जज़्बात.

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")/1-145

Friday, 26 April 2013

2-95-"मैंने तो खोया ही था


मैंने तो खोया ही था तुम्हे,
अब तुमने भी मुझे खो दिया,
दूर रहे इतना क्यों तुम मुझसे, 
तुम बिन मैंने जीना सीख लिया...(वीरेंद्र)/2-95 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा  ("अजनबी")

0-057-"तेरी ये तल्खियाँ अगर हैं

तेरी ये तल्खियाँ अगर हैं अपनी जगह,
और नफरतें भी कायम हैं अपनी जगह,
तो सुन, कायनात भी खत्म होगई अगर,
तो मेरी ये मुहब्बतें रहेंगी अपनी जगह. ..(वीरेंद्र)/0-057


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Thursday, 25 April 2013

2-155-"बड़े सुंदर लगते हैं पक्षी

बड़े सुंदर लगते हैं पक्षी रंगबिरंगे पंखों वाले,
खुले आकाश में विचरते रहते ये मतवाले,
बहुत आकर्षक इनकी उड़ान और बनावट,
मधुर मधुर इनकी आवाज़, और चहचहाहट,
कितने आज़ाद कितने खुश सब भोले-भाले,
काश इंसान भी होते तनाव-मुक्त इनके जैसे,
प्रेम, भाईचारा ,आनंद भरा होता आपस में ,
ना होते कोई अपराध, न होते कोई घोटाले. .....(वीरेंद्र)/२-१५५

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")
 

2-159-"जिंदगी का कर्जा पल पल

जिंदगी का कर्जा पल पल है सताय,
जितना उतारूं उतना ही चढ़ता जाय../(वीरेंद्र

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-163-"सफर में खो जांय

सफर में खो जांय हम कहीं भी,
महक के सहारे तुम्हें ढूंढ लेते हैं,
खोजने जाते हैं इष्ट देव को हम,
घूम फिर कर तुम्हे खोज लेते हैं. ...(वीरेंद्र)/२-१६३

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")


 

2-162-"मै कैसे कहूँ कि

मै कैसे कहूँ कि मैंने खो दिया तुम्हे,
मैंने तो कभी पाया ही नहीं था तुम्हे,
मुझे ही क्यों लगा मेरा कुछ खो गया,
जब ऐसा कुछ भी तो नहीं लगा तुम्हे. ...(वीरेंद्र)/२-१६२

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-154-"स्त्रोत हैं समापन की ओर

स्त्रोत जा रहे समापन की ओर,
संचय हो रहे नष्ट धीरे-धीरे,
जीवन बढ़ रहा संशय की ओर,
प्रकृति प्रदत्त सौख्य न रहेंगे,
जीवों का कल्लोल न दिखेगा,
जो प्रकृति से की खिलवाड और...(वीरेंद्र)/२-१५४

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-151-"मेरी आँखों की रौशनी

मेरी आँखों की , तुम ज्योति हो प्रिये,
मेरी राहों को उजाले तुम देती हो प्रिये,
तुम्ही लाकर खुशियाँ उदास जीवन में,
मन को ऊर्जान्वित तुम कर देती हो प्रिये  ....(वीरेंद्र)/२-१५१

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-148-"प्रबल इच्छा मेरी,

प्रबल इच्छा मेरी,
हार्दिक यही भावना मेरी,
मानव सेवा में व्यतीत करूं,
संपूर्ण जीवन मै, यही प्रार्थना मेरी.
************************
प्रार्थना करूं, जाती धर्म से ऊपर उठकर,
चलूँ ,परस्पर सौहार्द को मै अपनाकर,
स्वयं का प्रस्तुत करूं आदर्श उदहारण,
जीवन में होता जाऊं मै निरंतर अग्रसर.

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")/२-१४८

2-43-A-"मौसम को ये क्या हुआ

मौसम को क्या हुआ,
कैसी उमस हो गई,
उबासी क्यों आ रही,
ठंडी हवा कहाँ गई,
उदासी क्यों छाई है,
ऐसी क्या बात हो गई,
मौसम को क्या हुआ,
कैसी उमस हो गई. ......(वीरेंद्र)/2-43A

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-22-"अपनों पर ही हुक्म चलाया

अपनों पर ही हुक्म चलाया जाता है, गैरों पर नहीं,
अपनों पर ही हक जमाया जाता है, औरों पर नहीं,
जब अपने, अपने ही ना रह जांय जिंदगी में तो,
कोई घर बस एक मकान ही कहलाता है, घर नहीं. ....(वीरेंद्र)/2-22

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")
 

Monday, 22 April 2013

0-385-"तुम्हारे मेरे बीच न कोई

तुम्हारे मेरे बीच न कोई गिले होते, न कोई शिकवे होते,
कितना अच्छा होता, गर मै गूंगा होता, तुम बहरे होते,
तल्खियों में, बेरुखियों में एक दूसरे को पाकर भी क्या मिला,
बेहतर होता हमने ताउम्र एकदूजे के महज़ ख्वाब ही देखे होते..(वीरेंद्र)/0-385

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Sunday, 21 April 2013

0-053-"पूछ रहें हैं लोग अंधेरों का

पूछ रहें हैं लोग अंधेरों का सबब हमसे,
हम हैं कि मुंह पर चुप्पी लगाये बैठे हैं,
उनके आने पर घर हो जायगा रोशन,
इसीलिए हम सब चिराग बुझाये बैठे हैं. ..(वीरेंद्र)/0-053

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-052-"खुशियाँ और गम ज़िन्दगी में

खुशियाँ और गम ज़िन्दगी में आते जाते हैं,
दुश्मनी भूलके दुश्मन भी दोस्त बन जाते हैं,
जिन दोस्तों पर एतबार हो कि न बदलेंगे वो,
खुदा जाने अक्सर, वो ही क्यों बदल जाते हैं...(वीरेंद्र)/0-052


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-029-"इंसान भयभीत नहीं कतई

इंसान भयभीत नहीं कतई भी वक्त से,
डरता नहीं अपने आने वाले बुरे वक्त से,
हँसता रहता है वो दूसरे के बुरे वक्त पर,
रोता है जब मार खाता है अपने वक्त से. ...(वीरेंद्र)/0-029

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")  

0-062-"जो दिखाई दें वो बस

जो दिखाई दें वो बस ख्वाब होते हैं,
जो ना दिखें वो दिल के घाव होते हैं,
कुछ आंसू , आँखों का पानी होते हैं,
कुछ मगर, ग़मों का सैलाब होते हैं. ..(वीरेंद्र)/0-062 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-028-"चेहरे पर मुस्कुराहटों के यूँ तो

चेहरे पर मुस्कुराहटों के यूँ तो अलामात होते हैं,
पर दिल में पोशीदा बड़े ग़मगीन हालात होते हैं,
किसी तनहा ग़मज़दा को कुछ दिखाई नहीं देता 
उसके लिए हर शय, ख्वाब और ज़ख्मात होते हैं.. ...(वीरेंद्र)/0-028

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-290-"जुदा होने पर भी, तेरे दीदार

जुदा होने पर भी, तेरे दीदार से न महरूम रहेंगे,
पहले आँखों से करते थे, अब तसव्वुर में करेंगे,
तमाम उम्र तूने करवाया है इंतज़ार ही इंतज़ार,
पहले किया करते थे तेरा, अब तेरे खत का करेंगे./0-290

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-365-"हम पर लगाये इल्जाम


हम पर लगाये इल्ज़ाम बेशुमार,
खुद पे लगा बस एक, तो उन्हें याद आया. 
हम पर तो चलाये तीर बार बार,
खुद को लगी हल्की सी ठसक तो याद आया...(वीरेंद्र)/0-365

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-225-"एक मुद्दत अब हो चली

एक मुद्दत अब हो चली है, तेरा इंतज़ार करते-करते,
कासिद भी सदियों लगा रहाहै, यहाँ पहुँचते-पहुँचते ,
कर-करके तसव्वुर तेरे खत का, हर पुराने कागज़ में,
रोज सो जाता हूँ, तमाम कागजों को अलटते-पलटते...(वीरेंद्र)/0-225


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")


Friday, 19 April 2013

0-386-"अच्छा हुआ जलाये नहीं

अच्छा हुआ जलाये नहीं मेरे शेर,
सिर्फ फाडकर ही फ़ेंक दिए उसने,
राख समेटना मुश्किल हो जाता,
टुकड़े कागज के तो उठा लिए मैंने...(वीरेंद्र)/0-386


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-223-"बेवफाई ही करनी थी तो

बेवफाई ही करनी थी तो कर लेते अहिस्ता अहिस्ता ,
जल्दी क्या थी तुम्हे, बदल जाते अहिस्ता आहिस्ता,
अगर मुतास्सिर थे तुम, रकीबों के अंदाज़ से इतना,
बेताबी क्या थी, मिल जाते उनसे अहिस्ता अहिस्ता. ..(वीरेंद्र)/0-223


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-325-"जिंदगी में अब न रही

जिंदगी में अब न रही कोई उम्मीद बाकी,
पिला दे मुझे शराब आखरी बार ऐ साकी,
ज़हर-ऐ-जफा का असर होने में कुछ देर है,
फ़िक्र न कर, ना रखूंगा तेरा क़र्ज़ मै बाकी...(वीरेंद्र)/0-325


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-097-"गिरते हैं वही जो ऊंचाई पर

गिरते हैं वही जो ऊंचाई पर बैठे हैं,
ज़मीन पर रहने वाले क्या गिरेंगे,
अट्टालिकाओं वाले डरें भूकम्प से,
झोंपडियों में रहने वाले क्या डरेंगे..(वीरेंद्र)/0-097


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-289-"ये ज़लज़ले मेरी जिंदगी के

ये ज़लज़ले मेरी जिंदगी के सिलसिले हैं,
मुहब्बत में मुझको मेरे दोस्त से मिले हैं,
अब तो खूब आशना हो गए हैं ये मुझसे,
मै, मेरी जिंदगी इनसे बार-बार मिले हैं. .(वीरेंद्र)/0-289


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-224-"जबसे हम उनकी दीद के

जबसे हम उनकी दीद के तलबगार हो गए हैं,
वो  किसी  खुशफहमी  के  शिकार हो गए हैं,
हमने गलती से ज़रासा क्या चाह लिया उन्हे,
समझते हैं वो हुस्न वालों में शुमार हो गए हैं. ..(वीरेंद्र)/0-224


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Tuesday, 16 April 2013

2-161-खो चुका हूँ मै अस्तित्व

खो चुका हूँ मै अस्तित्व अपना,
फिर भी सपने संजोये मै बैठा हूँ,
संभावनाएं  हो गईं  हैं समाप्त,
फिर भी  उन्हीं  पर मै जीता हूँ.
ना जाने क्यों है अन्धविश्वास,
क्यों स्वयं को धोखा मै देता हूँ,
फिर सूरज डूबा,  फिर शाम हुई,
फिर सुबह की बाट मै जोहता हूँ.
कुछ  भी  अंकुरित हो ना सका,
बंजर थी ज़मीन भाग्य की मेरे,
फिरभी आशा के बीज मै बोता हूँ.

खो चुका हूँ  मै अस्तित्व अपना,
फिर  भी सपने  संजोये मै बैठा हूँ. .........(वीरेंद्र)/2-161

 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Sunday, 14 April 2013

3-50-"खामोश रहकर मै आजिज

खामोश रहकर मै आजिज आ गया हूँ,
सब्र का इम्तिहाँ देकर थक सा गया हूँ.


 ख़ामोशी न तोडूं तो और क्या करूं मै,
अब तो, गूंगों में शुमार सा हो गया हूँ.


 क्या मै कोई बेजान सा मुजस्सिमा हूँ,
यह सोच सोच कर मै तंग आ गया हूँ.


 खुदा ने दी थी जुबां, इजहारे दिल को,
छोडके उसे, बस कलम पे आ गया हूँ.


कलम की स्याही भी अब सूख चली,
अब मै किताबों से, बाहर आ गया हूँ.


 कद्रदानी को अपनी ज़ाया न करो तुम,
अब मै नाकामी के दायरे में आ गया हूँ. .....(वीरेंद्र)/3-50

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")