Sunday, 31 March 2013

0-288-"कोई सुनहरी याद नहीं...

कोई सुनहरी याद नहीं,  जो याद आ जाय,
दिलकश मंज़र नहीं जिसे याद किया जाय,
इस लम्हे को ही तू यादगार कर दे, दोस्त,
शायद यही जिंदगी में कभी याद आ जाय...("वीरेंद्र")/0-288

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")


Friday, 29 March 2013

3-49-"दास्ताने-दर्द अपनी हमसे

दास्ताने-दर्द अपनी हमसे पूरी न सुनाई गई,
भर आईं आँखें, और कैफियत न बताई गई,

अँधेरे कबूल कर लिए, आखिरकार हमने,
ढूंढते फिरे वो रौशनी, जो हमसे न पाई गई,

बांटने लगे मुस्कुराहटें औरों के लबों पर हम,
हंसी जब अपने चेहरे पर, हमसे न लाई गई,

खामोशी से मंज़ूर कर लीं तोहमतें-ज़माना,
हमसे किसी पर मगर ऊँगली न उठाई गई,

ना पूछो वक्ते-आखिरी में दीदार के वास्ते,
'किन बहानों से तबियत  राह पर लाई गई',

दफन हो चुके हैं हम तनहाइयों में 'वीरेंद्र',
फिर क्यूँ तमाशबीनों की भीड़ है बुलाई गई....(वीरेंद्र)/3-49

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Thursday, 28 March 2013

0-222-"नादान ख़ामोश ही

नादान ख़ामोश ही वो रहता गया, 

निगाहों से सवाल वो करता गया,

मेरी धडकनों को भी वो न समझा,

गो साथ साथ मेरे वो चलता गया...(वीरेंद्र)/0-222


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Sunday, 24 March 2013

2-97-"बुड्ढा बैठिन बीच में

बुड्ढा बैठिन बीच में तनिक भंग खाय,
जेंय-तेंय गोपियां देखकें,जी ललचाय,
जतन  करें  हैं छूवन की वा तिनको,
पर उठें तो, वाकी हड्डियन चरमराय,
तनिक सहारा लेवन गोपियन बुलाय,
गोपियन चतुर भईं, समीपेई न आय,
दूरन से ही रंग डालिन झट भग जांय.......(वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी")

0-027-"तेरी चाहत थी, मेरी जिंदगी

तेरी चाहत थी, मेरी जिंदगी का एक हादसा,
तेरी बेरुखी ने सही वक्त पर उसे टाल दिया,
वर्ना अबतक संगीन चोटें दिलपे मै खा लेता,
शुक्र तेरा, जो तूने मुझे दिल से निकाल दिया....(वीरेंद्र)/0-027


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-399-"आज मुझे खुद पर ही ..

आज मुझे खुद पर ही गुस्सा आ रहा है,
समझ पर से विश्वास उठता जा रहा है,
तंग आके खुद ही एक भेंस ने कह दिया,
बेवकूफ मेरे आगे बीन क्यों बजा रहा है..(वीरेंद्र)0-399


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")


Saturday, 23 March 2013

0-132-"पुराने ज़ख्म अब बे-असर

पुराने ज़ख्म अब बे-असर हो गए हैं,

हम भी इनके अब आदी हो गए हैं,

हम न करेंगे अब इनकी कोई दवा,

अबतो ये हमारे हमसफ़र हो गए हैं..(वीरेंद्र)/0-132

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी ") 



0-117-"आजाते हैं लोग यूँ जिंदगी..

आजाते हैं लोग यूँ जिंदगी में, तूफ़ानों की तराह,
मचाके दिल में तबाही, दबे पाँव निकल जाते हैं,
पीछे मुड़के भी वो देखते नहीं तबाही का आलम,
घिरेंगे कभी वो भी तूफानों में ये वो भूल जाते हैं..(वीरेंद्र)/0-117

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Wednesday, 20 March 2013

0-269-"मेरी जिंदगी में लौटके फिर

मेरी जिंदगी में लौटके फिर कभी वो खुशी ना आई,
जबसे छूटा साथ तेरा, मुझे ये दुनिया रास ना आई,
यूँ तो आईं चांदनी रातें, पर तेरे बगैर नींद ना आई,
तेरे साथ बीते जो, वो दिन ना आये, वो रात ना आई...(वीरेंद्र)/0-269


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-221-"इंतज़ार में तेरे, इतना बदहवास

इंतज़ार में तेरे, ऐसा बदहवास मै हो बैठा हूँ,
वीराने घर में, आवाज़ मै खुद ही को देता हूँ,
तेरे आने के तसव्वुर में, मशगूल हो कर मै,
खुद ही दस्तक देकर, दरवाज़े खोल देता हूँ...(वीरेंद्र)/0-221

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Sunday, 17 March 2013

0-220-"कैसे जज़्बात आज दिल

कैसे जज़्बात आज दिल में उठ रहे हैं
उसकी यादें है या शब्द जो गूँज रहे हैं,
भूलने  वाला क्यों  देगा आवाज़ मुझे,
शायद, मेरे  ही कान आज  बज रहे हैं..(वीरेंद्र)/0-220

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Sunday, 10 March 2013

0-131-"सभी ख्वाब जिंदगी के पूरे..

सभी ख्वाब ज़िन्दगी के, पूरे नहीं होते,
दिल के जज़्बात बयाँ,जुबां से नहीं होते,
आँखें भी कभी खा जाती हैं,,ऐसा धोखा,
दिखाई देते हैं जो, वो हालात नहीं होते. ..(वीरेंद्र)/0-131

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Sunday, 3 March 2013

1-210-"तुम ख्वाब तो थीं मेरा...

तुम ख्वाब तो थीं मेरा, हकीकत हो किसी और की,
वल्लाह ये कैसा दौर, ख्वाब भी अब चोरी होने लगे ..(वीरेंद्र)/1-210

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-612 काश मै एक गीत होता,

काश मै एक गीत होता, कभी कभी गुनगुना लिया करतीं तुम मुझे,
मगर मै एक कहानी हूँ, जिसको पढकर खत्म भी कर दिया तुमने...(वीरेंद्र)/1-007

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"
(Also see 1-007)

0-019-"इंसानियत उन्सियत मुरव्वत

इंसानियत, उन्सियत, मुरव्वत, अपनायत,
वफादारी को ताक पर रख देते हैं जो लोग,
पछताने का भी मौका नहीं देती जिंदगी उन्हें,
यूँ ही घुट-घुट कर जीते रहते हैं रूखे वो लोग...(वीरेंद्र)/0-019

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Saturday, 2 March 2013

1-184-"मेरी बर्बादियां देखकर

मेरी बर्बादियां देख कर, आज वो बेवफा भी उदास है,
पत्थर का ही सही, आखिर दिल तो उसके भी पास है...(वीरेंद्र)1-184

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"