Wednesday, 27 February 2013

2-160-"वो तो तुम्हारा 'व्यवहर' था..

वो तो तुम्हारा 'व्यवहार' था जिसे मैंने प्यार समझ लिया,
वो मेरी 'हार' थी जिसे मैंने प्यार का उपहार समझ लिया,
'बातों' और जज्बातों में अन्तर भला मै क्यों ना कर सका,
सपने मेरे टूट रहे थे और मैंने उनको साकार समझ लिया....(वीरेंद्र)/2-160

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Monday, 25 February 2013

3-48-"खुश रहने की दुआ देकर,,

खुश रहने की दुआ देकर तूने मेरा दिल और दुखाया है,
खुशियाँ ही तो हैं ये जिन्होंने मुझे इस हाल पहुंचाया है,

अक्सर जिंदगियां उजड जाती हैं, दिलों के टूट जाने से,
मेरी दुनिया तो मगर उजड़ी है, जबसे दिल लगाया है,

तेरा प्यार पाने के मै काबिल न था, मुझे भी  है कबूल,
ये बात खुद ही कह देते, मेरे रकीब से क्यों कहलवाया है,

शिकवा- शिकायत तुझसे भला क्यों ना होती मुझे,
कितने लिए  मेरे इम्तिहान, कितना मुझे आजमाया है,

कतै-ताल्लुक किया तो ऐसा, ना गुफ्तगू, ना वास्ता,
फिर क्यों कहता था तू मुझसे,  के तू मेरा हमसाया है.

कत्ल-ऐ-चाहत आसाँ था, मगर वो खून कैसे भूलूँ मै,
बंद करवा कर मेरी शायरी, जो तूने मुझसे करवाया है......(वीरेंद्र)/3-48

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")  

Tuesday, 19 February 2013

0-155-"तानाशाहों की तलवारें

तानाशाहों की तलवारें करती हैं सरों को कलम,
साहित्यकारों की कलमें करती हैं तलवारों को कलम,
तवारीख गवाह है जब जब हुआ है इंसानियत पे सितम,
अदीब की म्यान में से निकल कर हमेशा आई है ये कलम..(वीरेंद्र)

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")/0-155

Monday, 18 February 2013

0-021-"प्यार वो शय है जो सिर्फ

प्यार वो शय है जो सिर्फ बढती है,
भूलने की कोशिश से घटती नहीं ये,
मिटाने से दबाने से ये जाती नहीं,
खफा होने से तो और बढती है ये.  (वीरेंद्र)/0-021 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Wednesday, 13 February 2013

0-020-"इश्क का अंजाम कुछ भी

इश्क का अंजाम कुछ भी हुआ करे,
सिर्फ चाहत का मगर ये अंजाम क्यूँ?
नफरत करने वाले सलामत रहते हैं,
चाहने वाले हो जाते हैं बदनाम क्यूँ ?....(वीरेंद्र)/0-020


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Tuesday, 12 February 2013

0-032-"तुम बिन रास आती

तुम बिन रास आती नहीं जिंदगी,
अब तुम ही आकर इसको संभालो,
नहीं तो ख़त्म करने को इसे तुम,
एक बार मेरी झूंटी कसम खा लो....(वीरेंद्र)/0-032


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Saturday, 9 February 2013

0-024-"बला के पत्थर दिल लोग

बला के पत्थर-दिल लोग होते हैं,
जज्बात से कोसों दूर वो रहते हैं,
दर्द चीज़ क्या है, जानते ही नहीं,
आंसू भी उनके लिए पानी होते हैं ...(वीरेंद्र)/0-024


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Thursday, 7 February 2013

0-023-साथ में निकले थे, लड़ने

साथ में  निकले थे, लड़ने दुश्मन से हम,

वो दुश्मन के हो लिए, तन्हा हो गए हम,

जिन्हें अपने ज़ख्म  हम दिखाने को गए,

उन्होंने ही हम पर ढहाए  ज़ुल्मों-सितम. ..(वीरेंद्र)/0-०२३ 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी") 


Wednesday, 6 February 2013

0-178-"मुझे जन्नत की तलाश

मुझे जन्नत की तलाश क्यों होगी,
मुझे बस इन्तजारे-यार ही बहुत है,
जन्नत की हूरों से मुझे क्या वास्ता,
मुझे तो बस दीदारे-यार ही बहुत है..(वीरेंद्र)/0-178


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")


1-031-"मुझे अजनबी करार देकर

मुझे अजनबी करार देकर, मुझे वापस पाने को तू बेकरार रहेगा,
मै तो खो जाऊंगा गुमशुदगी में, तू मगर दुनियां में बेज़ार रहेगा..(वीरेंद्र)/1-031

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")


Tuesday, 5 February 2013

1-302-" ज़हमत ना कर मुझे

ज़हमत ना कर मुझे भुलाने की,
ले मैंने ही छोड़ दी जिद तुझे पाने की..(वीरेंद्र)/1-302


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Monday, 4 February 2013

1-183-"हदे-सितम की सूरत में.

हदे-सितम की सूरत में, कैफियत ऐसी भी आती है,
सूख जाते हैं अश्क तमाम और खुद पे हंसी आती है..(वीरेंद्र)/1-183

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")/

0-034-"बहुत सुकून होता, अगर


बहुत सकून होता, अगर मै भी तेरी तरह बेवफा होता,

तुझे शर्मिंदगी न होती मुझको तुझसे ना शिकवा होता,

बहुत खुशनसीब होते हम, अगर हम जज़्बाती न होते,  

हम पत्थर ही बने रहते, हमसे न कभी कोई खफा होता...(वीरेंद्र)/0-034



रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Sunday, 3 February 2013

1-135-"चाँद का मिजाज़ भी मेरे

चाँद का मिजाज़ भी मेरे जैसा है,
मै भी तेरी याद में आधा हो जाता हूँ...(वीरेंद्र)/1-135


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-101-"खुद को तो मैंने समझा

खुद को तो मैंने समझा लिया, तू बेवफा नहीं,
कमबख्त ज़माने को मगर मै समझाऊँ कैसे..(वीरेंद्र)/1-101


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-662-तुमने समझा तुम

तुमने समझा, तुम निकल गए मेरी जिंदगी से,
पर तुम तो आ गए और करीब मेरी ज़िन्दगी के ..(वीरेंद्र)/1-662


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Saturday, 2 February 2013

2-146-"संस्कृति कैसे रह सकेगी

संस्कृति कैसे रह सकेगी सुरक्षित हमारी?
प्रतिदिन हो रहे प्रहार इसपर,
उछ्रंखलता उद्दंडता हैं हावी,
चारो और लाचारी.
.............................................
लाओ क्रांतिकारी परिवर्तन,
कड़ा करना होगा अनुशासन,
प्रतिबंधित करना होगा नैतिक प्रदूषण,
तभी संभव होगा संस्कृति का संरक्षण .... (वीरेंद्र)/2-146


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-129-"लफ्ज़-ए-मुहब्बत पर अब

लफ्ज-ए-मुहब्बत पर अब यकीन नहीं होता,
के बेरुखियाँ में हुई बसर हमारी है ज़िन्दगी,
जलवतें भी अब तो महसूस नहीं कर सकते,
तन्हाईयों में जबसे हमने गुज़ारी है जिंदगी...(वीरेंद्र)/0-129


(जलवतें=रौनकें, oppo. of तन्हाइयां)

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")