Thursday, 31 January 2013

1-209-"सिल दो होंठ हमारे

सिल दो होंठ हमारे, के इन्होने भी बहुत प्यार किया तुम्हे,
इन्हें भी देदो सज़ाऐ-ख़ामोशी, के इल्ज़ाम दें न सकें तुम्हे...(वीरेंद्र)/1-209


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-540-"तुमसे क्यों हो शिकायत


तुमसे क्यों हो शिकायत तुमने मुझे चाहा ही नहीं,
पर ये भी तो है नाइंसाफी मुझे ये बताया ही नहीं..(वीरेंद्र)/1-540

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Wednesday, 30 January 2013

3-15-"मै कट गया था दुनियां से

मै कट गया था दुनियां से, ऐ बेवफा तेरे लिए,
आज तू दुनिया से जुड़ा है बस एक मेरे सिवा,

मुझे हर वक्त एहसास रहा है तेरे दर्द का, मगर,
आज मेरा दर्द सभी ने महसूस किया बस एक तेरे सिवा,

तू और तेरी खुशियाँ ही मंजिल थीं मेरी हमेशा से,
आज सबने चाहा मंजिल मिले मुझे, बस एक तेरे सिवा,

आरजू थी मेरी तू हमदर्द हमख्याल होता मेरा,
आज देखा तू वो सब है औरों के लिए बस एक मेरे सिवा,

खुदा ने तो बख्शे थे तमाम हसीं एहसासात तुझे,
आज तूने वो बाँट दिए दुनियां को बस एक मेरे सिवा,

मुगाल्ते में ही रहा मै, तू था राहों में मेरे साथ,
आज देखा तू पूरे कारवाँ के साथ है बस एक मेरे सिवा...(वीरेंद्र)

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

           (संशोधित)

Tuesday, 29 January 2013

0-182-"जिंदगी को तो एक दिन

जिंदगी को तो एक दिन चले जाना था,
ज़ख्मे-मुहब्बत को इल्ज़ाम ना दे कोई,
मैंने ही ज़िन्दगी को फनाह कर डाला है,
मेरे बेक़सूर महबूब का नाम ना ले कोई .(वीरेंद्र)/0-182

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Monday, 28 January 2013

2-157-"प्रेम असीम किन्तु ..

प्रेम असीम किन्तु अभिव्यक्ति में असमर्थ,
शब्द-भण्डार बहुत, मगर सबका सब व्यर्थ,
अर्थ हो जाते अनर्थ, कैसे पूर्ण हो मनोरथ,
परिपूर्ण मेरी मूकभाषा, पर कौन जाने अर्थ,..(वीरेंद्र)/2-157

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-156-"मृदुलता अद्रश्य हुई,

मृदुलता अद्रश्य हुई, शालीनता है विलुप्त,
अनुशासित न रहा कोई, सभी हैं उन्मुक्त,
है फनफना रहा विद्वेश का काल-भुजंग,
क्या काला होगा कल के सूरज का रंग? . . .(वीरेंद्र)/2-156

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Sunday, 27 January 2013

0-177-"मेरा खुद का कुछ भी नहीं

मेरा खुद का कुछ भी नहीं, सब तुम्हारा है,

मासूम सा दिल था, वो भी अब तुम्हारा है,

तोड़ रहे हो तो, तोड़ डालो इस दिल को भी,

आखिर इसके ऊपर हक़ भी अब तुम्हारा है..(वीरेंद्र)/0-177


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")



0-160-"वोही किया करते हैं शिकायत

वोही किया करते हैं शिकायत दर्द की अक्सर, 
जो नहीं जानते, इश्क में दर्द का मज़ा क्या है,
निकलती हैं दर्द-भरी ग़ज़लें जिनकी कलम से,
उन शायरों से पूछिए, दर्दे-इश्क में रखा क्या है..(वीरेंद्र)/0-160

रचना:वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-158-"कल खूब भरा अंखियों में

कल खूब भरा अंखियों में पानी,
याद कर ली शहीदों की कुर्बानी,
भाषण सुने और सुनाये बड़े बड़े,
२६ की बात २७ को हुई पुरानी,
वही जोड़तोड़, वही भ्रष्टाचार है,
६५ साल से  ये चल रही कहानी,
कुशासन खत्म हो रहे विश्व से,
पर आज भी झेलता हिन्दुस्तानी,
सोने की चिड़िया के पंख नौंचके,
देसियों ने रख दिए विदेस में जाके,
रोये ही जा रही है ये चिड़िया रानी,
अब तो उठो जवानों, बदल डालो,
तस्वीर अपने भारत  महान की,
चलने न दो किसी की मनमानी.......(वीरेंद्र)/2-158

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")
(२६ जनवरी के अगले दिन २७ जनवरी २०१३ को रचित)


 

Wednesday, 23 January 2013

0-188-"नज़रें मिलीं, नज़ारे और हो

नज़रें मिलीं, नज़ारे और हो गए,
दुआएं जो कीं, वो हमारे हो गए,
अब और न कुछ चाहिए रब्ब से,
नसीब चमका,वारे-न्यारे हो गए..(वीरेंद्र)/0-188

रचना:वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-051-"आसमान तू भी खूब

आसमान तूभी खूब बरस ले मुझ पर,
दुनियां भी मुझपे जी भरके बरसती है,
जितना मर्ज़ी, तू भी गरज ले मुझ पर,
ये दुनिया भी मुझ पर खूब गरजती है ..(वीरेंद्र)/0-051

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Tuesday, 22 January 2013

1-308-"तुम्ही उम्र-दराज़ होते


तुम्ही उम्र-दराज़ होते, गर देते मुझे दुआ सालगिरह की,
मैंने खुदा से मांग रखी है दुआ, ये उम्र तेरे नाम करने की..(वीरेंद्र)/1-308



रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Friday, 18 January 2013

0-150-"शायरी का शौक दिया

शायरी का शौक दिया, मुझे किसी और ने,
मगर इसको जिंदा रखा है, किसी और ने, 
मशकूर तो हूँ तहे-दिल से,सब अज़ीज़ों का,
मगर नवाज़ा है मेरे शेरों को किसी और ने ..(वीरेंद्र)/0-150

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी") 

Thursday, 17 January 2013

0-088-"शख्सियत को बदल लो.

शख्सियत को बदल लो, मुझसे कहते हैं लोग,
दुनिया के साथ बदलने की सलाह देते हैं लोग,
मुखौटा कोई ओढ़के बदल भी जाता मै कभी का,
यह जाना नहीं, मिजाज़ कैसे बदल लेते हैं लोग...(वीरेंद्र)/0-088


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-082-"मयकदे में, मै पीने नहीं


मयकदे में, मै पीने नहीं, बल्कि पीते हुओं को देखने आया हूँ,


के जब 'वो' बेवफा था तो मै कैसा लगता था यहाँ बैठा हुआ...(वीरेंद्र)/1-082



रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-114-"इतनी मधुरता इस जीवन में

इतनी मधुरता इस जीवन में कहाँ से आती,
तुम अगर मेरे जीवन में ना आती,
सपने न आते, नींद न आती,
तुम बिन मेरे जीवन साथी..............(वीरेंद्र)/2-114

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")





 

Monday, 14 January 2013

0-083-"मै खामोश नहीं था,


मै खामोश नहीं था, खामोश करवा दिया गया हूँ,
प्यार और वफ़ा से, बेदखल करवा दिया गया हूँ,
सीने में छुपाए ज्जज्बात ज़ाहिर करने के जुर्म में,
संगदिलों की महफ़िल से निकलवा दिया गया हूँ...(वीरेंद्र )/0-083

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-18-"आती है जब कभी आंच

आती है जब कभी आंच वतन पर,
माँ के लाल शहीद हो जाया करते हैं,
दुश्मन के आगे वो सर झुकाते नहीं,
शहादत में शीश कट जाया करते हैं,
शर्म से सर झुक जाता है हमारा जब,
कुर्बानी को उनकी हम ज़ाया करते हैं.....(वीरेंद्र)/2-18


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Sunday, 13 January 2013

1-262-"देख खुदा तेरा आधा काम.

देख खुदा तेरा आधा काम कर दिया, इस संग-तराश ने,
अब तूभी कर हक अदा, इस मुजस्सिमे में जान डाल के,..(वीरेंद्र)1-262


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-265-"मुझे खबर है कि वो बेखबर

मुझे खबर है वो बेखबर नहीं है, मेरी नाशाद कैफियत से,
वो दर्द में है बेदर्द नहीं, वाकिफ हूँ मै उसकी ज़हनियत से,
इस बेख़ौफ़ ज़माने के कहर से ज़रूर खौफ खाता होगा वो,
नाम उसका बदनाम करने लगे हैं लोग, बड़ी बेरह्मियत से ..(वीरेंद्र)/0-265

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-156-"चिराग को अपना वजूद

चिराग को अपना वजूद कायम रखने को अँधेरा चाहिए.
शायरी परवान चढ़ने को दिल पे कोई घाव गहरा चाहिए,
खल्वत-जलवत, विसालो-फिराक से क्या सरोकार मुझे,
मुझे तो अपनी ग़ज़ल के लिए बस यार का चेहरा चाहिए...(वीरेंद्र)/0-156


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Monday, 7 January 2013

0-031-"तेरा दिया हर गम मैंने

तेरा दिया हर गम मैने समेट लिया था,
अब और जगाह नहीं बची मेरे सीने में,
फ़क्त तेरे ही गम नहीं मुझे उठाने को,
और भी गम बख्शे हैं मुझको ज़माने ने...(वीरेंद्र)/0-031


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-179-"अंजाम-ऐ-बेसाख्ता चाहत

अंजाम-ऐ-बेसाख्ता चाहत मैंने सोचा ना था, 
तुमने भी न जाने क्यूं मुझे कभी रोका ना था, 
भूल ही गया था मै तो मौसम का ये मिजाज़, 
बहारों के बाद खिज़ा आती है ये सोचा ना था..(वीरेंद्र)/0-179

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Sunday, 6 January 2013

1-047-"अच्छा है किसी ने लगा दी

अच्छा है किसी ने लगा दी बुरी नज़र इस दोस्ती को,
वैसे भी अब और आगे कहाँ चलने वाली थी ये दोस्ती....(वीरेंद्र)/1-047

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-376-बाग़ से चुराके मुफ्त

बाग़ से चुराके मुफ्त आम खाने में जो मज़ा है,
वो बाज़ार से महंगे खरीद कर खाने में कहाँ है,
रचना किसी की चुराने में जो लुत्फो-आराम है,
वो भला खुद का सर खपाके लिखने में कहाँ है...(वीरेंद्र)/0-376

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-059-"मुझे इल्म था वो नहीं करेगा

मुझे इल्म था वो नहीं करेगा, मेरा इंतज़ार,
फितरत है उसकी ठहराने की मुझे खतावार, 
मालूम है, फैसले किसी के लिए रुकते नहीं,
कर दिया होगा ज़िन्दगी से मुझे दरकिनार....(वीरेंद्र)/0-59

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-084-"हम खड़े रह गए वहीँ के

हम तो खड़े रह गए वहीँ के वहीँ,
तुम कितने आगे निकल गए,
बदलने निकले थे तुम ज़माने को,
मगर तुम तो खुद ही बदल गए...(वीरेंद्र)/0-084 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Friday, 4 January 2013

2-152-"कुछ क्षण पहले मै निराश था

कुछ क्षण पहले ,
मै निराश था,
पर अब नहीं हूँ,
मै अस्तित्वहीन था,
पर अब नहीं हूँ,
उसका हस्त-स्पर्श,
दे रहा आकार मुझे,
सुंदर रूप सलोना सा,
दे रहा कुम्हार मुझे,
अब मै निराकार नहीं हूँ,
ओ मेरे कलाकार,
मिटटी के रचनाकार
तेरा बहुत आभार,
मै सार्थक हुआ,
अब बेकार नहीं हूँ.
कुछ क्षण पहले,
मै निराश था,
पर अब नहीं हूँ....
 
रचना : वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-153-"काले उमड़ते बदल, और साथ

काले उमड़ते बादल, और साथ ही तेज ठंडी हवाएं,
आकाश अति मन-लुभावन, झूमें पर्वत श्रंखलाएं,
हो दस्तक हिम-पात की, सब सैलानी करें प्रार्थनाएं,
नीले गगन तले नज़ारा हर भरे पहाड-पहाड़ियों का,
नन्ही पहाड़ियों पर बिछी हो चांदी की चादर जैसे,
ठिठुरते मगर अति उत्साहित लोग,
शब्दों के संग-संग मुंह से निकलती भाप,
अश्रु नहीं वो तो है आँख से निकलता पानी,
लंबे मोटे रंग-बिरंगे कोट से लदे-बदे लोग,
मुंह भी पूरा ना दिखे तो कैसे पहचानें लोग,
प्रेमियों में मचती उछल-कूद धींगा-मस्ती,
हवाओं में उड़ाते फेंकते बर्फ के गोले लोग,
जल्द मिलेगी प्रकृति की ये अनमोल सौगात,
शायद कल ही हो जाय वो प्रतीक्षित 'शुभ्र-प्रभात.'..(वीरेंद्र)/2-153

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-203-"गुलाबी होंठ, नशीली आँखें,

गुलाबी होंठ, नशीली आँखें, काली बिखरी जुल्फें ,चाँद सा चेहरा,
चांदनी-रात तू ज़िद मत कर ढलने की, देख अब न होने दे सवेरा...(वीरेंद्र)/1-203


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-255-" कैसी हलचल,कैसा नूर

कैसी हलचल, कैसा नूर आया है महफ़िल में,
ज़रूर वो बेनकाब तशरीफ़-फरमाँ हुए हैं यहाँ..(वीरेंद्र)/1-255

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-161-"वो जिसकी दोस्ती में बेज़ार हो

वो जिसकी दोस्ती में दुनिया से मै बेज़ार हो गया,
बस उसे छोड कर बाकी दुनिया ने संभाला है मुझे...(वीरेंद्र)/1-161

रचना : वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Wednesday, 2 January 2013

0-058-"तूने जब सभी कुछ

तूने जब सभी कुछ वापस ले लिया,,
तो यह यादें क्यों छोड़ दीं मेरे पास,
कभी आके इन्हें भी वापस लेजाना,
तन्हाई में,  ये नहीं आती मुझे रास.....(वीरेंद्र)/0-058

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-151-"सही अल्फाज़ नहीं मिल रहे

सही अलफ़ाज़ नहीं मिल रहे तेरी ग़ज़ल पर दाद देने को,
कहीं नाकाफी दाद से, तेरी गज़ल की तज्लील न हो जाय....(वीरेंद्र)/1-151

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-050-"मै आज़िज़ आ गया था

मै आजिज आ गया था अपनी इन तन्हाइयों से,
दोस्तों के हज्जूम से निकला हूँ दोस्तों की तलाश में.....(वीरेंद्र)/1-050

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-150-"हाँ, मै हूँ निराशावादी, क्योंकि

हाँ, मै हूँ निराशावादी,
क्योंकि मेरा अनुभव है,
इतिहास है साक्षी,
जग की रीत पता है,
चरित्र-चेहरा देखा है,
नहीं बदलेगा कुछ,
ये अग्नि शांत हो जायगी,
"दामिनी" जल जायगी,
धुंआ भी न बचेगा,
बस राख बच जायगी,
जो याद दिलायगी,
उस निर्दयी पीड़ा की,

संवेदनहीन जनों की,
एहसास तो था ही नहीं,
वो क्या बचेगा यहाँ,
तेरे साथ जल रही है,
शायद अंतिम उम्मीद भी,
ईश्वर ही था एक आशा,
शायद अब वो भी नहीं है,..(वीरेंद्र)/2-150

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-198-"मै जानता हूँ कि यह

मै जानता हूँ कि यह उसका है सिर्फ भोलापन,
है तो वो अपना, पर दिखाता नहीं अपनापन,
मै कहीं आसमांन पर न चढ जाऊं खुश होकर,
यह सोचके व्यर्थ दिखाता है झूंटा बेगानापन..(वीरेंद्र)/0-198

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-205-"चमकती आँखों में हमारी

चमकती आँखों में हमारी साफ़ दीख रही है तस्वीर,
बंद होंठों की खुशनुमा बनावट कर रही है तस्दीक,
हसीन लबों पर हमारा नाम क्यों दबाए बैठे हो तुम,
ज़ाहिर करदो नाम हमारा, बन जाने दो कोई तहरीर...(वीरेंद्र)/0-205



रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-520-"सुना है भूले-बिसरे भी

सुना है भूले-बिसरे भी कभी याद आ जाते हैं,

इसीलिए, शायद हम उनको अब याद आ रहे हैं...(वीरेंद्र)/1-520


रचना: © वीरेंद्र सिन्हा  ("अजनबी")


0-362-"सब कुछ आज के दौर में

सब कुछ आज के दौर में, सस्ता है,
बूढ़े माँ-बाप का रिश्ता भी सस्ता है,
आधुनिकता छाई है हम पर इतनी,
माता के संग बाप,गेरेज में रहता है...(वीरेंद्र)/0-362

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-211-"हमने तो अजनबियत की चादर

हमने तो अजनबियत की चादर ओढ़ ली कभी की,
तन्हाइंयाँ लोरी सुनाकर, सुलाने की कोशिश कर रहीं हैं.(वीरेंद्र)/1-211

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-132-"बार-बार दूसरों से क्यों

बार-बार दूसरों से क्यों पूछता है वो मेरा हाल,
दिल में अपने नज़र डालकर क्यों नहीं देख लेता...(वीरेंद्र)/1-132

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-254-"आज मुझे उससे भी

आज मुझे 'उससे' भी बड़ा बेवफा मिला है,
समझ गया मै बेवफाई एक सिलसिला है.
पकड़के मत बैठो ज़िद वफ़ा पाने की यहाँ,
मंज़ूर कर लो सिला, जिसको जो मिला है....(वीरेंद्र)/0-254



रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-321-"तेरे ग़मों का बोझ और

तेरे ग़मों का बोझ और कितना सम्भालूँ मै,
अब तो मेरे ही गम बहुत पड़े हैं, उठाने को..(वीरेंद्र)/1-321

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-180-"मै तुम्हारे ज़हन-ओ-ख्वाब में

मै तुम्हारे ज़हन-ओ-ख्वाब में ना सही, पर
अपने हालाते-दुश्वार में, मुझे शरीक पाओगे,
यूं तो मै लिखता हूँ मुख्तलिफ एहसासों पर,
मेरे हरेक शेर में खुद को तुम शरीक पाओगे....(वीरेंद्र)/0-180


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Tuesday, 1 January 2013

1-197-"अब जाके मालूम हुआ

अब जाके मालूम हुआ वो तो बहुत बेरहम था,
करता था वह प्यार मुझे, ये तो मेरा वहम था...(वीरेंद्र)/1-197

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-216-"मुझे अपने दिल पर बहुत

मुझे अपने दिल पर बहुत गुस्सा आता है,
चाहत में इतना क्यों आगे ये बढ़ जाता है,
यकीन कर बैठता है मीठी मीठी बातों पर,
हकीकत जानकर, हर बार यह पछताता है...(वीरेंद्र)/0-216


रचना:वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-320-"ऐ ज़माने तू मेरे तर्जे-इश्क

ऐ ज़माने तू मेरे तर्जे-इश्क पर मत जा,
मेरे जज्बात देख, मेरे लफ़्ज़ों पे ना जा..(वीरेंद्र)/1-320

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-255-हमारे जज्बातों की आज

हमारे जज्बातों की आज तुम्हे कदर नहीं है,
चमक पर है ध्यान कीमत पर नज़र नहीं है,
वक्त और लोग बदलेंगे, पर हम ना बदलेंगे,
तुम्हे जब याद आएँगे हम वो दिन दूर नहीं है....(वीरेंद्र)/0-255


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-379-"मेरी जिंदगी में जीत कम

मेरी जिंदगी में जीत कम, हार बहुत है,
मै क्या करूं, मुझे तुझसे प्यार बहुत है,
आ तेरे ठंडे रिश्तों को दे दूं गर्मजोशी मै,
मुझे एहसासो-जज्बात का बुखार बहुत है....(वीरेंद्र)0-379


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-005-"कैसे समझाऊँ तुझे मै

कैसे समझाऊँ तुझे मै अपने एहसासों की गहराई,
काश तुझे भी मेरी शायरी से कुछ लेना-देना होता...(वीरेंद्र)/-1-005


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-222-"सभी कुछ ख़त्म कर

सभी ख़त्म कर दिया, ये यादें क्यों छोड़ दीं मेरे पास,
इन्हें भी ले जाओ, तन्हाई में मुझे नहीं आती ये रास.....(वीरेंद्र).1-222


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-026-"मै नहीं मानता था कुंडलियों

मै नहीं मानता था कुंडलियों को, हस्त-रेखाओं को,
तेरे बिछुड जाने के बाद, मै भी अब मानने लगा हूँ,
मै जानता नहीं था सलीका-ऐ-मरासिम अभी तक,
अब हुआ इल्म ओर तजुर्बा, तो अब जानने लगा हूँ....(वीरेंद्र)/0-026


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-156-"ज़ाया ना कीजिये अपनी दुआ,

ज़ाया ना कीजिये अपनी दुआ, देकर मुझे नए साल की,
बे-असर पड़ी है अभी तो आपकी दुआ पिछले साल की...(वीरेंद्र)/1-156


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")