Saturday, 21 December 2013

1-353-"ज़िन्दगी में मेरी जब भी

ज़िन्दगी में मेरी जब भी ख़ुशी आई है,

कीमत मैंने उसकी बहुत बड़ी चुकाई है..(वीरेंद्र)/1-353


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-446-"दोज़ख भी जन्नत


दोज़ख भी जन्नत में बदल जाती है, 

इंसान की सोच अगर बदल जाती है,

कुछ नहीं है इस दुनियां में मुस्तकिल,

यहाँ दुश्मनी भी दोस्ती में बदल जाती है..(वीरेंद्र)/0-446


रचना :  वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-237-"ज़रा सी बात पर तोड़ दिया

ज़रा सी बात पर तुमने तोड़ दिया रिश्ता,

कोई बड़ी बात होती तो न जाने क्या करते,...(वीरेंद्र)/1-237


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-236-"तुझसे नहीं कोई अदावत

तुझसे नहीं कोई अदावत, पर ये भी वाजे है,

तुझे नहीं रह गई अब कोई मुहब्बत मुझसे..(वीरेंद्र)/1-236

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी") 

1-352-"तुम न आना मेरी कब्र पर

तुम न आना मेरी कब्र पर मेरे मर जाने के बाद,
मै फ़रिश्ता नहीं जो लौट आऊँ चले जाने के बाद...(वीरेंद्र)/1-352

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-235-"तुमसे नहीं शिकवा कि

तुमसे नहीं शिकवा कि क्यों कतै-ताल्लुक कर दिया,
शिकायत है तो बस इतनी, इतनी जल्दी क्यों कर दिया..(वीरेंद्र)/1-235

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-240-"याद में खोकर जिसकी

याद में खोकर जिसकी, वक्त गुज़ार लेता था मै,
ज़ालिम ने पाबन्दी लगा दी है याद करने पर भी उसे.(वीरेंद्र)/1-240

रचना:  वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

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0-079-"बर्फीली हवाओं के कुफ्र में

बर्फीली हवाओं के कुफ्र में, खून जमाती ठंड में,
हद-ए-निगाह तक छाये घने कोहरे की धुंध में,
मै भी कहाँ जिद ले बैठा रिश्तों की गर्माहट की,
बदले मौसम को अनदेखा करके अपनी धुंद में. ..(वीरेंद्र)/0-079

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी") 

0-407-"मेरे ख्याल बड़े खोखले

मेरे ख्याल बड़े खोखले निकले,
अंदाज़ मेरे सारे गलत निकले,
सोचा नहीं था जिन्हें ख्वाब में,
जाने क्यों वही बड़े गैर निकले. ..(वीरेंद्र)/0-407

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-437-"मुझे तो ज़रा भी नहीं जीने

मुझे तो ज़रा भी नहीं जीने देतीं चंद पाबंदियां,
जाने कैसे जी लेते हैं लोग पूरी पूरी जिंदगियां,
नाराजगियां तो  झेल सकता है कोई, ख़ुशी से,
पर दुश्वार है झेलना लम्बी लम्बी खामोशियाँ. ...(वीरेंद्र)/0-437

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-302-"लूट लोगे तुम हमें

लूट लोगे तुम हमें ऐसे मुस्कुराकर,
ललचाओगे हमें यूं मोती दिखाकर,
बाँधोगे बंधन में यूं ज़ुल्फ़ लहराकर,
बता दो ज़ुल्म ये रुकेगा कहाँ जाकर,..(वीरेंद्र)/0-302

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-104-"पत्थर भी पिंघल जाते हैं

पत्थर भी पिंघल जाते हैं लावा बन कर,
अहंकारी लोग मगर नहीं पिंघला करते,
तूफ़ान भी अपना रास्ता बदल लेते हैं,
कुछ लोग मगर, कुछ नहीं बदला करते,...(वीरेंद्र)/0-104

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-394-"हर शय पर हुस्न छाया

हर शय पे हुस्न छाया है, किस पर नहीं है,
किसीको उसपे अकड़ने की ज़रुरत नहीं है,
जिसके पास है किसी के प्यार की दौलत,
उसको किसी और शय की ज़रुरत नहीं है. ..(वीरेंद्र)/0-394

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-301-"प्यार अजब तरीके से वो

प्यार अजब तरीके से वो करते हैं,
बात बात में दूरी हमसे वो करते हैं,
जुर्म तो करते हैं हम जिंदगी में पर 
प्रायश्चित हर एक बार वो करते हैं....(वीरेंद्र)/0-301

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-103-"हर कोई है इंसान उसकी

हर कोई है इंसान, उसकी कुछ ज़रूरतें हैं,
जहां में मुहब्बतें हैं कम, ज्यादा नफरतें हैं,
कितना भी दौड़े इंसान अपनेपन के पीछे,
मिलता नहीं कुछ, मिलती बस अदावतें हैं. ...(वीरेंद्र)/0-103

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-233-"हमारी तो मुहब्बतों की

हमारी तो मुहब्बतों की भी कोई कद्र नहीं होती,
लोग रकीबों की नफरतें भी संभाल के रख लेते हैं..(वीरेंद्र)/1-233

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-232-"आज मुझे याद आ गया

आज मुझे याद आ गया बेवफा कोई,
आँखों में वही प्यार फिर छलका गया कोई. ..(वीरेंद्र)/1-232

राचन: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-024-"अरसे बाद मेरी कलम से

अरसे बाद मेरी कलम से जो ये ग़ज़ल निकल आई है,
ज़रूर उस बेवफा को आज, मेरी कुछ तो याद आई है...(वीरेंद्र)/1-024

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-560-"अंधेरों से निकलना जिनकी


अंधेरों से निकलना जिनकी किस्मत में ना हो,

उन्हें अंधेरों में खुश रहने के सिवा चारा क्या है..(वीरेंद्र)/1-560

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

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1-027-"मत सुना उन्हें दर्द भरी

मत सुना उन्हें दर्द भरी शायरी "वीरेंद्र",
पत्थरों का शायरी से क्या लेना देना...(वीरेंद्र)/1-027

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-426-"अब रूठना बंद भी करो तुम

अब रूठना बंद भी करो तुम,
ज़िन्दगी बहुत है हमसे रूठने के लिए...(वीरेंद्र)/1-426

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-441-"तन्हाई भी मुझसे नाराज़ है

तन्हाई भी मुझसे नाराज़ है आज,
मैंने तोडा है उसे, तेरा तसव्वुर करके,..(वीरेंद्र)/1-441

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-350-"तुम ना आना मेरी कब्र पर

तुम ना आना मेरी कब्र पर पशेमा होकर,
मै गिले शिकवे अपने साथ दफन कर लूँगा..(वीरेंद्र)/1-350

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

3-70-"ज़मीर-ओ-जज़्बात से जुदाई

ज़मीर-ओ-जज्बात से जुदाई मै सह नहीं सकता,

क्या करूँ, उन दोनों के बगैर मै रह नहीं सकता,

मै अब वो दरिया बन चुका हूँ, ऐ मेरे हमसफ़र,

तेरी शह के बगैर रवानी में, मै बह नहीं सकता.

न जाने किस बेरहम ने छीन लिया उन्हें मुझसे,                                                               

दिल की तकलीफ किसी से मै कह नहीं सकता,..(वीरेंद्र)/3-70



रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-009-"चंद रोज़ और रूठे रहो

चंद रोज़ और रूठे रहो तुम हमसे,
चंद ग़ज़लें ज़हन में और उभर आने दो...(वीरेंद्र)/1-009

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-425-"खुद को छुपा लिया मेरी

खुद को छुपा लिया मेरी नज़रों से तुमने,
मेरी नज़रों की ख़ुशी भला क्यों छीनते हो..(वीरेंद्र)/1-425

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-424-"उसे क्या अंदाजा, मेरी जद्दो-

उसे क्या अंदाजा मेरी जद्दोजहद का, उसे पाने के लिए,
दरिया से सहरा बन गया मै, कतरा कतरा खाली होकर...(वीरेंद्र)/1-424

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-559-"बड़े दिल वाले हैं हमारे

बड़े दिल वाले हैं हमारे फिक्रमंद ये ज़माने के लोग,
खुद देखें, न देखें पर हमें आइना दिखा देते हैं लोग...(वीरेंद्र)/1-559

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-273-"मुझे दो ज्ञान, जीवन सुखी

मुझे दो ज्ञान,
जीवन सुखी बनाने का,
फूल चढाने तुम्हारे मंदिर जाऊं,
अथवा दान-पुन्य सेवा करूँ भगवान्..(वीरेंद्र)/2-273

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-231-"दूर जाकर भी देख लिया

दूर जाकर भी देख लिया, पाईं ना कोई तब्दीलियाँ,
गलत सुना था, दूरियां भी बढ़ा देती हैं नजदीकियां...(वीरेंद्र)/1-231

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-349-"मुंह उठा कर चले आते हैं

मुंह उठा कर चले आते हैं दर्द, कहाँ कहाँ से,
जाने क्यों इन्हें कोई दूसरा दिल नहीं मिलता...(वीरेंद्र)/1-349

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-080-"जब जब भीतर झाँकने लगीं

जब जब भीतर झाँकने लगीं कुछ खुशियाँ,
आँधियों ने बंद कर डालीं सब खिड़कियाँ,
तुम आये थे मेरे उजड़े चमन को महकाने,
पर तुम्ही पर छा गईं मौसम की तल्खियां..(वीरेंद्र)/0-080

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-241-"अपनी नर्म जुल्फों को तुम

अपनी नर्म जुल्फों को तुम लहराने दो,
गालों को अपने, इन्हें तुम सहलाने दो,
रुख हवाओं का मेरी तरफ है, जानेमन,
मेरे दिल का चमन भी इन्हें महकाने दो. ...(वीरेंद्र)/0-241

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-082-"दुश्वारियों से रूबरू हूँ,

दुश्वारियों से रूबरू हूँ, तूफानों से घिरा हूँ,
उम्मीद नहीं कोई, मंजिल के मिलने की,
करूँ तो क्या करूँ मै, दरिया बन गया हूँ,
और आदत बन चुकी मुझे, बस बहने की...(वीरेंद्र)/0-082

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-251-"मै विशाल सागर,प्यार और

मै सागर विशाल, प्यार और मुहब्बत का,
मेरे भावुक ह्रदय में, भरी अपार कोमलता,
मेरी चंद बूँदें घटने से, घट नहीं जाता मै,
यदि संवर सके बिखरा अस्तित्व किसी का...(वीरेंद्र)/2-251

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-081-"तू ना करे महसूस मेरी

तू ना करे महसूस कभी मेरी कमी, तो ना कर,

मगर मुझे तेरी कमी हर वक्त खलती रहती है,

साथ गुज़ारा वक्त, तू ना करे याद तो ना कर,

मगर, मुझे तो हर लम्हे-घडी की याद रहती है....(वीरेंद्र)/0-081


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Friday, 20 December 2013

1-239-"वजूद मिटा कर, घुटने

वजूद मिटा कर, घुटने क्यों टेक देते हैं वो लोग,
खुदको जिन्हें आज़ाद तबियत कहते देखते हैं लोग...(वीरेंद्र)/1-239

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-238-"दिल को आइना बना लेने

दिल को आइना बना लेने से क्या हासिल,
जब चेहरा बदल जाये, तस्वीर हो जाय धुंधली...(वीरेंद्र)/1-238

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-040-"हर शय फिर से हसीं होगी

हर शय फिर से हसींन होगी , जब होंगे हम फिर से अजनबी,
गिले,शिकवे,जुदाई सब ही से आज़ाद होगी फिर से ज़िन्दगी. ..(वीरेंद्र)/1-040

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-039-"उनसे हकीकत में मिलकर भी

उनसे हकीकत में मिलकर भी हमें कुछ न मिला,
काश कोई हमें फिर से ख्वाबों में अजनबी बना दे ..(वीरेंद्र)/1-039

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी") 

1-432-"तेरी आँखों की सिफत को

तेरी आँखों की सिफत को क्या कहें,
क़त्ल भी करती हैं और मुहब्बत भी...(वीरेंद्र)/1-432

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-272-" मै जब होता हूँ

मै जब होता हूँ परेशान,

कर लेता हूँ यह ध्यान,

मुझसे ज्यादा दुखी हैं,

लाखों करोड़ों इन्सान..(वीरेंद्र)/2-272 


रचना:  वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-271-"'अजनबी' जब लगने लगे

'अजनबी' जब लगने लगे अपना सा,
अपरिचित हो जाए चिरपरिचित सा,
अन्जाना हो जाए जाना पहचाना सा,
यहीं से प्रारम्भ  एक प्रेम-फ़साना सा..(वीरेंद्र)/2-271

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-245-"तन्हाई को मधुर क्षण तुम

तन्हाई को मधुर क्षण तुम कहते हो,
अपने ही साए के संग तुम रहते हो,
ख़ामोशी का दामन तुम छोड़ते नहीं,
हाथों में  हाथ भी तुम मेरा रखते हो. ..(वीरेंद्र)/2-245

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-393-"ये दिल है इकलखुरा

ये दिल है इकलखुरा, मुझसे अलग चलता है,
उसी एक बेवफा के पीछे पीछे बस चलता है,
मेरी चाहत मेरे अरमान की परवाह नहीं इसे,
कमबख्त, उसी को पाने के लिए मचलता है..(वीरेंद्र)/0-393

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-241-" खिले होठों के बीच

खिले होठों के बीच कभी होते मोती हैं छिपे,
बंद होठों में कभी मंद-मंद मुस्कान है दिखे,
क्यों तुम इतना डरते हो सर्दी के मौसम से,
तुम खुद ऊष्मा,ऊर्जा, तुम्हे ठंड क्यूं है लगे..(वीरेंद्र)/2-241

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-240-"गुलाब की दो पंखुड़ियों में

गुलाब की दो पंखुड़ियों में मोती छुपाए बैठे हैं,
झील सी आँखों पर, तीर कमान लगाये बैठे हैं,
जाने क्यों देर कर रहें हैं, हम पर वार करने में,
हम तो कभी से उनके निशाने पर आए बैठे हैं,. ..(वीरेंद्र)/0-240

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-339-"बहुत बोलने लगा था दिल

बहुत बोलने लगा था दिल, मैंने बेजुबान कर दिया,
बेलगाम हो गया था यह, मैंने बा-लगाम कर दिया,
कर न सकेगा बेकार गिले-शिकवे अब ये किसी से,
क़त्ल करके इसकी आरजुएं, बे-अरमान कर दिया...(वीरेंद्र)/0-339

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-392-तेरे आतिशी बदन की अगर

तेरे आतिशी बदन की अगर पकड़ मिल जाये,
इस बढती सर्दी की सारी अकड़ निकल जाये,
बेजान पत्थर से भी निकल पड़ती हैं चिंगारी,
उसको अगर दूसरे पत्थर की रगड़ मिल जाये....(वीरेंद्र)/0-392

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Wednesday, 6 November 2013

0-425-"आंसू समझने की भूल

आंसू समझने की भूल न करो, जो आँखों से निकल रहें हैं,
ये बरसों पुराने गम हैं, जो अब जाकर बाहर निकल रहें हैं.
और कब तक सम्भालूँ मै इनको अपनी बेगुनाह आँखों में,
जिन्होंने दिए थे, वो भी अब मेरी जिंदगी से निकल रहें हैं. ..(वीरेंद्र)/0-425


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Tuesday, 5 November 2013

1-413-"आजाओ मेरी अँधेरी ज़िन्दगी

आजाओ मेरी अँधेरी ज़िन्दगी में तुम रौशनी की तराह,
अमावस में मानो छा जाए उजियारा, चांदनी की तराह...(वीरेंद्र)/1-413

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-412-" कबसे लगाए बैठा

कब से लगाये बैठा था उम्मीद आसमान में उजियारे की,
तुमने खोलके भीगी जुल्फें, उमीदों पे मेरी पानी फेर दिया...(वीरेंद्र)/1-412

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-411-"उसकी जुल्फों को हवाओं ने

उसकी जुल्फों को हवाओं ने ऐसा बिखेर दिया,

हसरत-ऐ-दीदार पर मेरी, पानी सा फेर दिया...(वीरेंद्र)/1-411


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-270-"तुम्हारे नेह का याचक

तुम्हारे नेह का याचक मै,
अंतहीन इच्छाओं का नहीं,
सौगात यदि मिले मुझे तो,
बस प्रेम की मिले अन्य नहीं,.(वीरेंद्र)/2-270

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-936-"तुम जब भी आना इंसान बनके

तुम जब भी आना इंसान बनके आना ज़िन्दगी में,
फ़रिश्ता बनके अबतक जो आये, रिश्ता न जोड़ पाए  ...(वीरेंद्र)/१-९३६

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Monday, 4 November 2013

0-351-"अपनी रौशनी से मैंने

अपनी रौशनी से मैंने दूर किये अँधेरे तुम्हारे, खुद को जला कर,

सहर होने पर तुमने फ़ेंक दिया मुझे, बुझा हुआ दीया बता कर,

सहर देगी साथ तुम्हारा चंद घंटों को, आएगी मेरी याद फिरसे,

उठा लेना मुझे, रौशनी दे दूंगा तुम्हे, फिरसे खुद को जला कर..(वीरेंद्र)



रचना: वीरेंद्र सिन्हा ('अजनबी')/0-351

0-391-"उसके साथ लड़ाई मुझे

उसके साथ लड़ाई मुझे बहुत भाती है,
मेरी व् उसकी भड़ांस निकल जाती है,
जितनी भी ज्यादा वो लडती है मुझसे,
उतनी ही अधिक पहलू में आ जाती है. ...(वीरेंद्र)/0-391

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-937-"तूने मुझसे प्यार किया, जबतक

तूने मुझसे प्यार किया, जब तक तुझे ज़रुरत थी,
राहों में मेरा साथ दिया, जब तक तुझे फुरसत थी,
मुझे अब नहीं ज़रुरत, न रही फुर्सते-इश्क तुझसे,
अब वो दौर ही ख़त्म जब मुझे तुझसे मुहब्बत थी...(वीरेंद्र)/१-९३७

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")
 

2-240-"आपकी कलम से जो झाड़ते

आपकी कलम से जो झड़ते हैं शब्दों के मोती,
वो सारे के सारे यह कागज़ ही समेट लेता है,
हमतो बस रह जाते हैं वंचित इन मोतियों से,
प्रथम प्रसाद रचना का, कागज़ ही लेलेता है. ..(वीरेंद्र)/2-240

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-338-"मेरे मन तुझपे अन्याय

मेरे मन तुझ पे अन्याय कर रहा हूँ मै,
हरेक घडी तुझे कमज़ोर कर रहा हूँ मै,
तेरे बहते आंसुओं को नज़रंदाज़ करके,
बेवफाओं से ही वफादारी कर रहा हूँ मै...(वीरेंद्र)/0-338

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-102-"किसी को ऊंचाइयों पर चढाओ

किसी को ऊंचाईयों पर चढाओ उतना,
कि, वक्ते-ज़रुरत वो नीचे भी देख सके,
झूंटी तारीफ ना करो किसी की इतनी, 
कि आइना में खुदको न कभी देख सके ..(वीरेंद्र)/0-102

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-141-" दिल नहीं पिंघलते, माँ बनने

दिल नहीं पिंघलते,मोम बनने की बात वो क्यों करते हैं,
भरी है आग खुद ही में, बुझाने की बात वो क्यों करते हैं,
कुछ दूर हम कदम हो ना सके जो, ज़िन्दगी की राहों में, 
बारबार साँसों से साँसें मिलाने की बात वो क्यों करते हैं...(वीरेंद्र)/0-141

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-931-"कितने नादां हम इंसान होते



रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-269-"पर्वत पर पहुंचे,

पर्वत पर पहुंचे,
पवन पुत्र श्री हनुमान,
पर बूटी पहचान न पाए,
उठा लाये पूरी की पूरी चट्टान..(वीरेंद्र)/2-269

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-023-"चोट देने वाले भी अब तो

चोट देने वाले भी अब तो शायरी करने लगे हैं, "वीरेंद्र"
हमने तो सुना था चोट खाने वाले ही शायरी किया करते हैं...(वीरेंद्र)/1-023

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-422-"कैसा दर्द, कौनसा दर्द,

कैसा दर्द, कौन सा दर्द, लोग भी क्या मज़ाक करते हैं,
अजीब लगता है जब संगदिल भी दर्द की बात करते हैं..(वीरेंद्र)/1-422

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-087-"खुमार उतर गया जैसे नशा

खुमार उतर गया, जैसे नशा उतर गया कोई,
पिलाने का वादा करके जब मुकर गया कोई...(वीरेंद्र)/1-087

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-410-"धरती प्यासी रह लेगी

धरती प्यासी रह लेगी, बादलों का घमंड तोड़ने को,
बादल भी अपनी सी पर आ जाए तो सोचो क्या होगा. ..(वीरेंद्र)/1-410

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-443-"ठंड और कोहरे का कुफ्र

ठंड और कोहरे का कुफ्र जब हो जाय,
मुंह से निकले भाप कुल्फी जम जाय,
उंगलियाँ अकड़ें और हड्डी कड़कड़ाऐ,
कुल्हड़ में अमृत लगे गर्मा-गर्म चाय..(वीरेंद्र)/0-443

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-409-" कंजूसी न कर, आँखों से

कंजूसी न कर, आँखों से पिलाने में साकी,
कहीं तेरे मैखाना में हम बगावत न कर बैठे ..(वीरेंद्र)/1-409

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-408-"चिराग बनके रौशनी सा अंधेरों

चिराग बनके रौशनी सा अंधेरों पे बिखरा हुआ हूँ,
जल तो रहा हूँ, मगर आँधियों से भी डरा हुआ हूँ....(वीरेंद्र)/1-408

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-421-" साँसों को साँसों से लबों को

साँसों को साँसों से, लबों को लबों से मिल जाना था,
और क्या आएगा तूफ़ान, आ लिया जितना आना था. ..(वीरेंद्र)/1-421

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-420-"कमबख्त दिल भी मेरा कितना

कमबख्त दिल भी मेरा किस कदर अजीब है,
टुकड़े कर डाला जिसने इसे, उसी के करीब है...(वीरेंद्र)/1-420

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-247-"तुम्हे निहार कर झंकृत

तुम्हे निहार कर झंकृत मेरे मन के तार हो जाते हैं,
उठने लगती हैं तरंगे जैसे सपने साकार हो जाते हैं..(वीरेंद्र)/2-247

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-419-"पत्थर से, मै मोम बन तो जाऊं

पत्थर से मै मोम बन तो जाऊं, मगर
डर है, ता-उम्र वो मुझे जलाती ही न रहे..(वीरेंद्र)/1-419

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-414-"मत तलाशों मुहब्बतें, नफरतों से

मत तलाशो मुहब्बतें, नफरतों से भरी दुनिया में,
के मयखाने में शराब मिलती है आबे-हयात नहीं...(वीरेंद्र)/1-414

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-351-"वो दर्द का परिंदा है

वो दर्द का परिंदा है दर्द का मारा है मेरी तराह,
हमदर्द समझके आ जाता है उड़कर मेरे पास..(वीरेंद्र) /1-351

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-230-"तुम्हारे बगैर ये ज़िन्दगी

तुम्हारे बगैर यह ज़िन्दगी बस सरक रही है,
बुझने से पहले चिराग की लौ  भड़क रही है. ..(वीरेंद्र)/1-230

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-418-"वो मुहब्बत ही क्या जिसका

वो मुहब्बत ही क्या जिसका हम इज़हार न कर सकें,
वो दोस्ती ही क्या जिसमे किसी का ऐतबार न कर सकें..(वीरेंद्र)/1-418

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-417-"अच्छा है जो दूर-दूर

अच्छा है जो दूर-दूर तुम हमसे अब रहने लगे,
ये दूरियां बढ़ा देंगी इमकान तेरे-मेरे पास आने के,.(वीरेंद्र)/1-417

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-267-"याद आये, वो दिन आज


याद आये,
वो दिन आज,
कितने दिनों के बाद,
फिर से प्रेम-प्रसंग संवाद......(वीरेंद्र)/2-267

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-140-"रिश्ते हो गए हैं बहुत ही

रिश्ते हो गए हैं अबतो बड़े सस्ते,
वक्त ही कहाँ है,निभाने के वास्ते,
दुनियां में हैं बहुत से काम ज़रूरी,
वक्त कहाँ फालतू बातों के वास्ते...(वीरेंद्र)/0-140

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-300-"न तो कोई चाँद, न कोई सूरत

न तो कोई चाँद, न कोई सूरत, तुम्हारे मुकाबिल है,
मगर वफ़ा प्यार तुम्हारा, किसी और का हासिल है,
इस दिल में रहे तुम, और रहोगे आखरी सांस तक,
करूंगा प्यार इकतरफा ही,मेरा दिल इसी काबिल है..(वीरेंद्र)/0-300

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Sunday, 20 October 2013

0-239-"लो हम तो अब चुप होकर

लो हम तो अब चुप होकर बैठ गए,
अधूरी बुझी प्यास ले कर बैठ गए,
तुमने तो कहा था लौटकर आओगे,
तुम आये, पर मुंह सुजाकर बैठ गए. ...(वीरेंद्र)/0-239

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-238-"दिल में कब से दबा रखा है

दिल में कब से दबा रखा है प्यार का ज्वार,
डरता हूँ खुदसे, कुछ नहीं कर पाता इज़हार,
आकर तुम मेरा इम्तिहाँ लेके चले जाते हो,
तुमने भी मुझसे कभी हाल न पूछा एकबार. ..(वीरेंद्र)/0-238

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-337-"रात मैंने अपने दिल को

रात अपने दिल को थप्पड़ मारके सुलाया,
जाने क्यों, 'उसे' ही याद करता है अब भी,
बारबार जिसने की इतनी बेवफाई मुझ से,
उसी बेवफा की वकालत करता है अब भी. ...(वीरेंद्र)/0-337

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-174-"महफ़िल में आज मेरी आँख

महफ़िल में आज मेरी आँख से आंसू निकल आये,
जब मुझे छोड़ कर , उसको सबके शेर पसंद आये,
मेरी ग़मगीन ग़ज़ल का न हुआ उसपे ख़ास असर,
रकीब के दर्दे-बयाँ पे मगर उसने खूब आंसू बहाए. ..(वीरेंद्र)/0-174

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")


0-139-"उनको इंसान कहलाने का

उनको इंसान कहलाने का हक़ नहीं है,
दिलों में जिनके कोई मुहब्बत नहीं है,
बे-शऊर रूखी सी हैं जिंदगियां उनकी,
जो नहीं किसीके जिनका कोई नहीं है. ..(वीरेंद्र)/0-139

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-243-"मै भी अब पत्थर हो जाना

मै भी अब पत्थर हो जाना चाहता हूँ,
वो अकेला ही भला क्यों पत्थर बना रहे..(वीरेंद्र)/1-243

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-268-"परस्पर सामंजस्य क्यों

परस्पर सामंजस्य क्यों नहीं है,
वही तो है प्रेमाधार,
मानता तू है,
मै भी. . . . . . . .(वीरेंद्र)/2-268

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-416-"अच्छा किया तूने इस दिल

अच्छा किया तूने मेरे दिल की जुबां पर ताला जड़ दिया,
मै भी परेशां था इसकी आदत से तेरे नाम की रट लगाने की...(वीरेंद्र)/1-416

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-022-"जबसे लिखी हमने ग़ज़ल

जबसे लिखी हमने ग़ज़ल उनकी तारीफ में,
निगाहों में उनकी हम, सच्चे शायर हो गए...(वीरेंद्र)/1-022

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-423-"इससे पहले कि लोग मुझे

इससे पहले कि लोग मुझे जलाएं जोर शोर से,
क्यों न मै अपने अन्दर का रावण दहन कर दूं...(वीरेंद्र)/1-423

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-266-"खुश हैं बहुत बादल और

खुश हैं बहुत बादल और आसमान,
तिमिर दूर कर रहा, उनका ये चाँद,
क्या मै भी रखूँ आस, उजालों की ?
क्या लौट कर आएगा मेरा भी चाँद?...(वीरेंद्र)/2-266

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-021-"लिखे जो शेर और ग़ज़ल

लिखे जो शेर और ग़ज़ल मैंने बस उसके लिए,
दुनिया ने तो पढ़े बार बार, बस उसी ने ना पढ़े. .(वीरेंद्र)/1-021

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-234-"तेरे दिए ज़ख्मों ने मेरा

तेरे दिए ज़ख्मों ने मेरा बड़ा साथ दिया,
ता-उम्र मेरे साथ रहे, तन्हा होने न दिया..(वीरेंद्र)/1-234

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-214-"दिल को मेरे समझा उसने

दिल को मेरे समझा उसने कागज़ का टुकड़ा,
लिखा,काटा,मिटाया,तोड़ मरोड़कर फ़ेंक दिया..(वीरेंद्र)/1-214

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-415-"मेरे दिल में उठे तूफ़ान

मेरे दिल में उठे तूफ़ान को हल्के में ले लिया उसने,
जबसे सुनी गलत पेशनगोई तूफ़ान की,-महकमे से..(वीरेंद्र)/1-415

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Wednesday, 9 October 2013

1-348-"मेरे शेरों की दास्ताने-गम

मेरे शेरों की दास्ताने-गम पर, वाह-वाह वो करता गया,
ज़ालिम ने ये भी न सोचा, कुछ हकीकत भी है मेरे शेरों में...(वीरेंद्र)/1-348

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Sunday, 6 October 2013

0-320-"दोस्ती निभाने का मतलब

दोस्ती निभाने का मतलब ये नहीं,
कोई हम पर यूं ही फनाह हो जाय,
तोड़ डालने का भी मतलब ये नहीं,
उसकी सूरत से भी बेज़ार हो जाय...(वीरेंद्र)/0-320

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-101-"जिंदगियों में एक तूफ़ान सा

जिंदगियों में एक तूफ़ान सा आता है,
झोंके में अपनापन काफूर हो जाता है,
वफादारियां भी यहाँ बदलती रहती हैं,
यहाँ  एक जाता है, तो दूसरा आता है. ..(वीरेंद्र)/0-101 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-407-"अकेले तुझसे ही भला

अकेले तुझसे ही भला मै क्यों शिकायत करूँ,
तू पहला शख्स तो नहीं जो मुझसे बेवफा हुआ है..(वीरेंद्र)/1-407

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-265-"विदा होने की तू बात

विदा होने की तू बात मत कर, भले ही छुप जा यहीं कहीं,
चाँद भी तो रौशनी देके छुप जाता है, होता विदा कभी नही..(वीरेंद्र)/2-265

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Friday, 4 October 2013

0-299-"मै ज़माने से लड़ता रहा

मै ज़माने से लड़ता रहा, और लड़ता रहूँगा,
वफ़ा करूंगा, वफ़ा का तलबगार ना रहूँगा,
तेरी यादों से ही रखूंगा रौशन मै ज़िन्दगी,
भूल भी जाओगे तो प्यार एकतरफा करूंगा. ..(वीरेंद्र)/0-299

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-237-"रूठी है दुनियां मुझसे

रूठी है दुनिया मुझसे, कभी तू भी रूठ जा,
कभी तो मुझे लेने दे तुझे मनाने का मज़ा,
आज बड़ा दिल कर रहाहै, नखरे उठाने का,
ढूंढ कोई अच्छा बहाना, बस आज रूठ जा. ..(वीरेंद्र)/0-237

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-406-"दिल में उतरके देखा उसके

दिल में उतरके देखा उसके तो ग़मों का ढेर मिला,
वो कहता था दर्द उसके पास से कभी गुज़रा भी नहीं..(वीरेंद्र)/1-406

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-264-"सोच रहेगी वही जब तक


सोच रहेगी वही, जब तक न होगा ह्रदय में परिवर्तन,

शब्द रहेंगे प्रभावहीन, यदि भावों का न होगा मिश्रण...(वीरेंद्र)/2-264

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-404-"खुशफहमी ही पाले रहते

खुशफहमी ही पाले रहते तो अच्छा था,
हमें भी क्या सूझी, उन्हें आजमाने की. ..(वीरेंद्र)/1-404

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-229-"आजिज़ आ गए थे

आजिज़ आ गए थे इश्क का बोझ उठाते-उठाते,
मशकूर हैं हम आपके जो इश्क से नफरत करा दी..(वीरेंद्र)/1-229

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-228-"तुम्हारे पास आकर ज़माने

तुम्हारे पास आकर, ज़माने से हम दूर हो गए,
अब किसके पास जाएँ, जब सभी से दूर हो गए ..(वीरेंद्र)/1-228

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-263-"जन-समूह को यदि


जन-समूह को यदि स्नेह-पूर्वक न मिलेगा सुरक्षा का अधिकार,

उसे लड़ना ही होगा भले स्वीकार करना पड़े सरकारी अत्याचार..(वीरेंद्र)/2-263

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-198-"कटने को तो कट जायगी

कटने को तो कट जायगी ये ज़िन्दगी,
ये तन्हाई तो नहीं, जो कट ही न सके. ..(वीरेंद्र)/1-198

 रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Wednesday, 2 October 2013

Monday, 30 September 2013

1-225-"मिलते नहीं हैं दिल बड़ी बड़ी

मिलते नहीं हैं दिल, बड़ी बड़ी कोशिशात से,
टूट मगर जाया करते हैं छोटी छोटी बात से...(वीरेंद्र)/1-225

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-40-"तुम्हारे सपनो में मै

तुम्हारे सपनों में मै आती हूँ,
मालूम नहीं तुम कैसे सोते हो,
कितनी बार तुम्हे जगाती हूँ,
पर तुम घोड़े बेच के सोते हो,
बार बार तुम्हे मै पुकारती हूँ,
पर तुम तो आँखें मूंदे रहते हो,
जब भी सपनों में मै आती हूँ,
तुम सदैव मूक बने रहते हो. ..(वीरेंद्र)/2-40


रचना: वीरेंद्र सींह ("अजनबी") 

1-403-"बहुत दिन हो गए

बहुत दिन हो गए वो मुझसे एक बार  भी रूठा नहीं है,
कहीं ऐसा तो नहीं, अब वो मुझसे मुहब्बत करता नहीं है...(वीरेंद्र)/1-403

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-227-"चंद लम्हे तेरे साथ गुजरें

चंद लम्हे तेरे साथ गुजरें, फिर चाहे न ज़िन्दगी रहे बाकी,
जाम तेरी आँखों से पियूं, फिर चाहे मेरी तिश्नगी रहे बाकी...(वीरेंद्र)/1-227

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-390-"'प्यार' और 'प्याज़' दोनों ने हमें

'प्यार' और 'प्याज' दोनों ने, हमें खूब रुलाया है,
हम भूले अपनी हैसियत, दोनों ने 'भाव' खाया है,
प्यार को 'मेरी सरकार' ने पनपने न दिया, और
'मुल्क की सरकार' ने प्याज का दाम चढ़ाया है....(वीरेंद्र)/0-390

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-236-"चंद लम्हे तेरे साथ गुजरें

चंद लम्हे तेरे साथ गुजरें, फिर चाहे न ज़िन्दगी रहे बाकी,
जाम इन आँखों से पियूं, फिर चाहे यह तिश्नगी रहे बाकी,
नशीली आँखों की नीली गहराइयों में डूब जाऊं इस तराह,
नसीब मेरा रौशन हो जाय, फिर चाहे यह तीरगी रहे बाकी. ...(वीरेंद्र)/0-236

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रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Friday, 27 September 2013

0-422-"दर्द अपने दिल के हम बयाँ

दर्द अपने दिल के, हम बयाँ कर नहीं सकते,
सीने में भी ज्यादा उन्हें जमा कर नहीं सकते,
जाने क्यों तुमने हम पर लगा रखी है पाबन्दी,
दिल हो परेशां तोभी याद तुम्हे कर नहीं सकते...(वीरेंद्र)/0-422


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-350-"आतिशे-इश्क कसूरवार नहीं

आतिशे-इश्क कसूरवार नहीं तुझे जलाने की,
जलाती है ये तुझे अगर, तो बुझाती भी तो है,
गर्मिए-इश्क से मत घबराया कर, तू इतना,
आंच देती है ये गर,तो ठंड पहुंचाती भी तो है...(वीरेंद्र)/0-350

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")


0-421-"तन्हाई में दीखता नहीं

तन्हाई में दीखता नहीं जब कोई दूसरा चेहरा,
आईने में खुद का ही चेहरा मै देख लेता हूँ,
सुनाई नहीं देती जब किसी के आने की आहट,
दरवाज़े खिड़कियाँ यूंही खोल कर देख लेता हूँ....(वीरेंद्र)/0-421

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-192-"ये इश्क का रोग बहुत हसीन

ये इश्क का रोग बहुत हसीन है, 
दूसरे मर्ज़ तो हमें लग जाते हैं,
पर इसको हम खुद ही लगाते हैं,
इसकी न दवा है, न वैक्सीन है.

टी.बी., केंसर का टेस्ट हो जाता है
शूगर और हार्ट चेक हो जाता है,
पर इस रोग का कोई चेकअप नहीं,
ये बड़ा कमीना है, बड़ा कमीन है,

हरेक मर्ज़ की एक मुद्दत होती है
कोई न कोई दवा भी होती है,पर
इश्क का रोगी खूब जानता है,
बचेगा नहीं वो, मर्ज़ बड़ा संगीन है.

इसका होता है नहीं कोई डाक्टर,
नही कोई क्लिनिक न कोई सेंटर,
लव-गुरु भी बेकार साबित हुए हैं,
कहते हैं डरो मत रोग ये रंगीन है.

इसका रोगी दुनिया से कट जाता है,
कलेजा उसका पूरा फट जाता है,
बस एक ही शख्स याद रहता है उसे,
वही उसका आकाश वही ज़मीन है.

पर इश्क का रोग बहुत हसीन है........(वीरेंद्र)/2-192

----वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")----


Tuesday, 24 September 2013

1-405-"कोई उनकी साफगोई

कोई उनकी साफगोई तो देखे ज़रा
तोड़ भी देते हैं दिल, और मान भी लेते हैं...(वीरेंद्र)/1-405

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-556-"पाबंदियां न कर सकीं उसे



पाबंदियां न कर सकीं उसे जुदा मुझ से,
चुप रहके भी बात वो करता रहा मुझ से..(वीरेंद्र)/1-556



रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-558-"खुशनसीब हैं जिनके दिल

खुशनसीब हैं जिनके दिल पत्थर के होते हैं,
न एहसासात रखते हैं, न जज़्बाती वे होते हैं..(वीरेंद्र)/1-558

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-419-"हम इन्तजारे-शाम भला

हम इन्तजारे-शाम भला कैसे करें, 
शाम में अभी कई सदियाँ बाकी हैं,
दर्द और हरारत देख कर लगता है, 
जैसे हमारी चंद ही घड़ियाँ बाकी हैं...(वीरेंद्र)/0-419

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-226-"अपने दिल के मकाँ में

अपने दिल के मकान में मुझे वो रखता भी तो कहाँ रखता,
निकलवा दिए उसने सभी कोने, नए मकाँ की तामीर के वक्त...(वीरेंद्र)/1-226

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-138-"मैंने माना ना था, पर


मैंने माना ना था, पर वादा तेरा टूट चुका है,
यादें भी बिखर गईं, सपना मेरा टूट चुका है,
पिरो कर रक्खा था, जिसमे हमने यादों को,
वह धागा भी, इस दिल के साथ टूट चुका है ..(वीरेंद्र)/0-138

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-319-"मै प्यासा हूँ, सावन मुझ से

मै प्यासा हूँ,  सावन मुझ से रूठ गया है,
मै तन्हा हूँ, दोस्त का दामन छूट गया है,
कितनी उम्मीद से मैंने पुकारा था उसको,
अब तो प्यार से, मेरा भरोसा टूट गया है...(वीरेंद्र)/0-319

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-173-"मै कभी ज़माने के बिगड़े

मै कभी ज़माने के बिगड़े हालात पर लिखता हूँ,
अक्सर  इंसानियत के सवालात पर लिखता हूँ  
मै गाफिल नहीं अपने दिल की कैफियत से भी,
टूटता है ये तो इसकी तकलीफात पर लिखता हूँ..(वीरेंद्र)/0-173

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-370-"खुशियों को घर में समेट कर

खुशियों को घर में समेटकर, दरवाज़ा कर लिया था बंद,
मै खुश था, मेरी खुशियों को परिंदा भी ना मारेगा पंख,
सोचा बाहर न जा सकेंगी खुशियाँ भीतर न आयेंगे गम,
पता न था घर में भी घुट सकता है मेरी खुशियों का दम...(वीरेंद्र)/0-370

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी") 

Wednesday, 18 September 2013

2-190A-"वो ऊर्जा भी अब समाप्त

वो ऊर्जा भी अब समाप्त हो गई,
पुनर्जीवित जिसने कर दिया था,
वो आशा भी अब परास्त हो गई,
प्रोत्साहित जिसने कर दिया था....(वीरेंद्र)/१-१९०A

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-298-"मैंने चाहा था जी भर के

मैंने चाहा था, जी भर कर प्यार दूंगा उसे,
लेके गम उसके, खुशियों के हार दूंगा उसे,
पर भूल ही गया, मै हारता आया हूँ सदा,
ये क्यूँ न सोचा, कभी भी मै हार दूंगा उसे...(वीरेंद्र)/0-298

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-369-"मालिक ने भाग्य में पत्थर

मालिक ने भाग्य में पत्थर होना ही लिखा था,
मै ठहरा पत्थर,मान लिया जो होना लिखा था,
मूर्तिकार ने तराश के बदल दिया मेरा मुकद्दर,
तकदीर में मेरी, भगवान् होना भी लिखा था ....(वीरेंद्र)/0-369

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-297-"ऐ हमसफ़र ले चल तू

ऐ हमसफ़र, ले चल तू मुझे उस जहाँ में,
जिसके आगे दूसरा कोई और जहाँ न हो,
खो जाएं हमदोनों एकदूजे के आगोश में,
बस मै और तू हों, कोई तीसरा वहां न हो...(वीरेंद्र)/0-297



रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-402-"ढूंढता फिर रहा हूँ मै खुद

ढूंढता फिर रहा हूँ मै खुद को कई दिन से,
ज़रा देखो तो, कहीं मै तुम्हारे वजूद में तो नहीं.?..(वीरेंद्र)/1-402

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-554-"अच्छा किया तो मुझसे

अच्छा किया जो मुझसे अलग हो गए,
तुम भी भला क्यों चलते ज़माने से अलग..(वीरेंद्र)/1-554


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-224-"लाख कोशिशें कीं, मगर मै

लाख कोशिशें कीं, मगर मै न अब तक तुम्हे भुला पाया,
मुझे भी तो बताओ, तुमने इतनी जल्दी मुझे कैसे भुलाया...(वीरेंद्र)/1-224

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-077-"नादान है वो, मेरे प्यार

नादान है वो, मेरे प्यार की संजीदगी को नहीं समझे,
मैंने किया प्यार उन्हें, पर वो हुस्न की खुशामद समझे. .(वीरेंद्र)/1-077

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Thursday, 12 September 2013

1-278-"अपने टूटे दिल की बेचैनी

अपने टूटे दिल की बेचैनी की दवा जो मै लेने गया,
चारागर ने फिर वही मुट्ठी-भर वक्त मुझे थमा दिया..(वीरेंद्र)/1-278

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-151-"मेरी नाचीज़ शायरी को नए

मेरी नाचीज़ शायरी को नए आयाम देकर,
आपने खुद क्यों मुझसे किनारा कर लिया,
मेरी गजलों को हसींन मौजू देकर, आपने,
बज़्म में नहीं आना क्यों गवारा कर लिया..(वीरेंद्र)/0-151

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-099-"मज़हब की दीवार मै तोड़

मज़हब की दीवार मै तोड़ तो दूं,
सबसे इंसानी रिश्ता जोड़ तो लूं,
वो देखो आगये मज़हबी ठेकेदार,
पहले मै अपनी कब्र खोद तो लूं..(वीरेंद्र)/0-99

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-555-"आइना समझ कर मेरा

आइना समझ कर मेरा दिल तोड़ डाला आपने,
टुकड़े जोड़के भी अब इसमें खुदको देख न पाओगे..(वीरेंद्र)/1-555

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-436-यह कैसा रिश्ता है मेरा

यह कैसा रिश्ता है मेरा तेरा,
जिसमे न तू मेरी न मै तेरा,
वो कौनसी है डोर हमारे बीच,
जिसने बांधा है मन मेरा तेरा...(वीरेंद्र)/0-436

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Wednesday, 11 September 2013

3-60-"रूखे-रौशन से तेरे महरूम

रूखे-रौशन से तेरे महरूम कहीं हम हो न जाएं,
जुल्फों को संभाल, रुख पे कहीं गिर वो न जाएं,

यूंतो इन काली बदलियों से भी मुहब्बत है हमें,
शर्त मगर ये, दीदारे-चाँद के रास्ते में वो न जाएं,

काजल को बसा लिया तूने इन शोख निगाहों में,
छिनवा दिया बसेरा मेरा, दरबदर हम हो न जाएं,

सुराहीदार गर्दन है और आँखों से छलकते जाम,
डरते हैं, कहीं इनसे पीने के आदी हम हो न जाएं,

खुमारे-शादाब में मत खो जा इतना ऐ नाजनीन,
रूखसार को देखके, मदहोश कहीं हम हो न जाएं,

मत बिखेर हुस्न की खुशबू इतनी दरियादिली से,
बादे-नसीम का रुख इधर है कहीं हम सो न जाएँ,

छिपना न कहीं बद्र की मानिंद तू ऐ माहेज़बीन,
हकीकतें हैं जो आज, वो कहीं ख्वाब हो न जाएं. ...(वीरेंद्र)/3-60
 
(रूखे-रौशन=मुखमंडल; खुमारे-शादाब=यौवन का खुमार;
बादे-नसीम=ठंडी बयार; बद्र=पूरा चाँद;) 
रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-553-"हमने तो बदला है अपना


हमने तो बदला है अपना नजरिया ही,
लोग तो सर से पाँव तक बदल गए हैं..(वीरेंद्र)/1-553

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-552-"कौन न मर जाए गुफ्तगू

कौन न मर जाए गुफ्तगू की इस अदा पर उनकी,
होटों को आराम और आँखों को ज़हमत वो देते हैं..(वीरेंद्र)/1-552

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-401-"हमने ता-उम्र खोया ही खोया

हमने ता-उम्र खोया ही खोया जिन्हें पाने के लिए,
वो हैं कि, उन्होंने हमें पाया भी तो बस खोने के लिए....(वीरेंद्र)/1-401

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-347-"मेरे दर्द भरे शेरों को

मेरे दर्द भरे शेर लोग इसलिए पसंद करते हैं,
क्योंकि वो उनकी दिलबस्तगी का सामाँ होते हैं...(वीरेंद्र )/1-347

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-551-"शिकायत नहीं, ज़माने वाले

शिकायत नहीं, ज़माने वाले क्यों बदल गए,
गिला तो इतना है भला तुम क्यों बदले गए ..(वीरेंद्र)/1-551

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-223-"निकल गया वो शख्स

निकल गया वो शख्स मेरी ज़िन्दगी में चहलकदमी करके,
न जाने किसने कौन सा इंतकाम मुझसे लेने भेजा था उसे....(वीरेंद्र)/1-223

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-400-"सवाल वो करे जिनको हो

सवाल वो करें जिनको हो जवाब की उम्मीद बाकी,
वो क्या करें सवाल जिनकी किस्मत ने जवाब दे दिया हो..(वीरेंद्र)/1-400

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-395-"तौबा ये कैसा उल्टा ज़ुल्म

तौबा, ये कैसा उल्टा ज़ुल्म मुझ पर वो ढा रहे हैं,
छीन ली नींद उन्होंने मेरी, और खुद सोने जा रहे हैं...(वीरेंद्र)/1-395

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-388-"मै जानता हूँ कि मै इकतरफा

मै जानता हूँ कि मै इकतरफा प्यार कर रहा हूँ,
मालूम है मै अपने ग़मों का सामान  कर रहा हूँ,
रकीबों के जैसी किस्मत पाई नहीं मैंने इसलिए,
अरमानों का अपने, काम मै तमाम कर रहा हूँ...(वीरेंद्र)/0-388

रचना: वीरेंद्र सिन्हा  ("अजनबी")

0-367-"जोश-ओ-खरोश से चिल्ला रहे

जोश-ओ-खरोश से चिल्ला रहे थे भूखे और नंगे इंसान,
हाथों में लेकर एक सियासी पार्टी का झंडा और निशान,
तभी आई सत्ता-पार्टी की गाडी, लेकर कुछ रोटी कपडे,
बदले सुर उनके, चिल्लाने लगे, हो रहा भारत निर्माण. ...(वीरेंद्र)/0-367

रचना: वीरेंद्र सिन्हा  ("अजनबी")

0-420-"अँधेरे कमरे में झिर्रियों से

अँधेरे कमरे में झिर्रियों से जैसे आजाती है हलकी रौशनी,
तुम आगईं, मेरी अँधेरी जिंदगी में, उस रौशनी की तराह,
जाते हुए भी, न जाने का एहसास देती है जो हलकी धूप,
तुमभी निकल गईं जिंदगी से शाम की उस धूप की तराह...(वीरेंद्र)/0-420

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-389-"ना तो मै मिस कर रहा

ना तो, मै मिस कर रहा हूँ आपको,
और ना ही आप मुझको कर रहे हैं.
काट क्यूं नहीं देते रिश्तों की रस्सी,
पकडके जिसे हम यूंही घिसट रहे हैं..(वीरेंद्र)/0-389

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Sunday, 8 September 2013

1-550-"अच्छा हुआ तूने ही मुंह


अच्छा हुआ तूने ही मुंह फेर लिया,
तुझे भुलाना आसान तो हुआ मेरे लिए .(वीरेंद्र)/1-550

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-296-"यूं तो मेरी ज़िन्दगी उदास

यूं तो मेरी ज़िन्दगी उदास हो गई,
फिरभी ये शाम कुछ ख़ास हो गई,
जाने कैसे आज पुकार लिया उसने,
दूर बैठी थी जाने क्यों पास हो गई. ...(वीरेंद्र)/0-296

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-368-"अपनी ऊंचाइयों गहराइयों पे

अपनी ऊंचाइयों गहराइयों पर गरूर करते हैं लोग,
खुदको मसरूफ, हमें बड़ा फ़ालतू समझते हैं लोग,
खुद को तो ज़रा सब्र नहीं है,  हमारे बिना रहने का,
पर हमें ज़रूर प्यासा तड़पने को छोड़ देते हैं लोग. ...(वीरेंद्र)/0-368

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")


0-137-"हमने यह माना हालात

हमने यह माना हालात बदल जाते हैं,
यह भी सच है जज़्बात बदल जाते हैं,
वाजिब हो जितना, उतना ठीक है पर,
लोग सर से पाँव तक क्यूँ बदल जाते हैं..(वीरेंद्र)/0-137

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Saturday, 7 September 2013

0-136-"दूर हो जाते हैं अजनबी,

दूर हो जाते हैं अजनबी, अरसा गुज़र जाने के बाद,
आँखें पथरा जाती हैं इंतज़ार लंबा हो जाने के बाद,
कहते हैं, दरो-दीवार से रूबरू होना चाहिए बारबार,
वरना वो भी नहीं पहचानते, मुद्दत हो जाने के बाद..(वीरेंद्र)/0-136

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Tuesday, 27 August 2013

2-274-"मेरी आशाएं किंचित

मेरी आशाएं किंचित सूक्ष्म थीं,
तुम्हारी आँखों से, ओझल थीं,
तुम्हारा दोष नहीं इसमें कुछ,
उन्हें टूटना था, वो कोमल थीं...(वीरेंद्र)/2-274

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-172-"जब तुम ही नहीं आये

जब तुम ही नहीं आए मेरे जीवन में,
रिक्त रहा तुम्हारा स्थान अंतर्मन में,
हज़ार मै दीपक जलाऊँ सब व्यर्थ है,

जिन राहों पर मुझे अब चलना नहीं,
जिस आँगन में तुम्हारी पदचाप नहीं,
उनमे उजाले का भी रहा नहीं अर्थ है,

ह्रदय-तरंगों को तुम तक पहुँचाने में,
ह्रदय-भाव अपने तुमको समझाने में,
ये ह्रदय मेरा अंततः रहा असमर्थ है. ...(वीरेंद्र)/२-५६

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Thursday, 22 August 2013

0-235-"तेरी आँखों की गहराई में

तेरी आँखों की गहराई में, डूबना चाहता हूँ,
सुना है सारा प्यार तूने उनमे छुपा रखा है,
डूबकर इनमे मौत भी आगई तो गम नहीं,
तेरी आँखों के सिवा दुनिया में क्या रखा है...(वीरेंद्र)/0-235

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

3-58-"मेरी कलम से झड़ते हैं

मेरी कलम से झड़ते हैं लफ़्ज़ों के मोती ,
कोई रंगीन कागज़ उनको समेट लेता है,

कागज़-कलम के संगम का एक शरार,
पूरे आलम को आगोश में लपेट लेता है,

कोई डूब जाता है जज़्बात के समंदर में,
कोई दोज़ख में भी जन्नत देख लेता है,

लेपता है कोई लफ़्ज़ों का मर्रहम ज़ख्मों पे,
तो उनसे कोई दिल की चोट सेक लेता है.

तासीरे-अलफ़ाज़ से कोई पिंघल जाता है,
मुनकिर भी चौखट पे मत्था टेक लेता है....(वीरेंद्र)/३-५८

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-548-"मैंने खोया था तुम्हे,


मैंने खोया था तुम्हे, अब तुमने भी मुझे खो दिया,
अच्छा हुआ हमने एकदूजे बिन जीना सीख लिया...(वीरेंद्र)/1-548

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

3-55-"चढ़ रहा था ऊंचाइयों पर

चढ़ रहा था ऊंचाइयों पर,
गहराइयों में मै आ गिरा,
ज़माने को सहन न हुआ,
तन्हाइयों से मै आ घिरा,
हकीकतें ख्वाबीदा होगईं,
रुसवाइयों से मै जा घिरा....(वीरेंद्र)/३-५५

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी"). 

0-295"मेरे बुझे बुझे से अरमानों

मेरे बुझे बुझे से अरमानों को,
अपने प्यार की गर्मजोशी देदे,
दोनों जहाँ की ख़ुशी पा जाऊं,
मेरे दिलबर ऐसी मदहोशी देदे...(वीरेंद्र)/0-295

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-549-"तुमसे गिला,तुमसे शिकवा

तुमसे गिला, तुमसे शिकवा, तुमसे तकरार,
फिरभी तुम्ही से प्यार, तुम बिन जीना दुश्वार..(वीरेंद्र)/1-549

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-191-"बहुत ही सुकून देती हैं टपकती

बहुत ही सकून देतीं हैं टपकती बूँदें, बारिश की,
मै तो खो जाता हूँ प्रकृति की मनोरम छटा में,
बंद कर के अपनी आँखें गहराई में खो जाता हूँ,
नदी की बहती धारा अनायास ही जगा देती है,
हरियाली से ढके पहाड़, कल-कल करते ये झरने,
मदहोश करती चहचाहट की भिन्नभिन्न आवाजें,
स्वागत करती जैसे धरती-आकाश के संगम का.
परन्तु फिर लगता है, यह सब क्षण भर का है,
फिर नदी सूख जायगी, पहाड़ आकर्षण खो देंगे,
हरियाली न होगी, मेघ न ...बरसेंगे, हम तरसेंगे,
कोलाहल न होगा, धरती-आकाश संगम न होगा,
बारिश न होगी, बूँदें न होंगी, ये सकून न होगा.
अभी नहीं पर अग्रिम-कल्पना से मै डर जाता हूँ,
और कितना प्रकृति-असंतुलन नहीं जान पाता हूँ. ....(वीरेंद्र)/२-१९१

 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")