Thursday, 29 November 2012

0-207-"चेहरे पे आज, कैसी परेशानी

चेहरे पे आज, कैसी परेशानी सी छाई है
कहाँ खोए हो भला, क्यों उदासी छाई है,
ग़मगीन बहुत ही लग रहे हो आज तुम,
उभर कर क्या कोई चोट पुरानी आई है..(वीरेंद्र)/0-207


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Friday, 23 November 2012

2-136-"कैसा विचित्र है जग में

कैसा विचित्र है,
जग में ये चलन,
जीते जी होता है,
महान का दमन,
पर मरणोपरांत,
उसे करते नमन,
जीवित को मान न दें,
पर मृत्यु पर श्रद्धा-सुमन.
निधन पर अश्रु बहाए,
जीवन में करें चरित्र-हनन,
महापुरुषों को मान मिला, पर
कष्ट मिला जीवन-पर्यंत.............(वीरेंद्र)2-136


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Thursday, 15 November 2012

2-135-"साफ़ कर लिया मन-आँगन.

साफ़ कर लिया मन-आँगन झाड़ू से सकेर दीं भावनाएँ,
सजा ली काया, उतरन की मानिंद फ़ेंक दीं संवेदनाएं,

परिवर्तनशीलता के युग में परिवर्तन था अत्यंत ज़रूरी,
भाव और स्वाभाव ही क्या, बदल दीं समस्त परिभाषाएँ,

व्यवहारिकता की आड़ में, व्यापारिकता का हुआ स्वागत,
आत्मीयता हुई व्यर्थ का चोंचला, आ गईं नई मान्यताएं,

टूटते हैं तो टूटें, बिखरते हैं तो बिखरें, संबंधों में रहा क्या,
टूटना-बिखरना, यह तो अब हो गईं सामान्य सी समस्याएं..(वीरेंद्र)

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")/ 2-135

Wednesday, 14 November 2012

2-134-"बालक भोर में निकला

बाल-दिवस १४ नवंबर की प्रातः एक बालक घर से निकलता है:-
 
बालक भोर में निकला 'काम' पर,  .. .('पढाई पर नहीं)
लेकर बड़ा सा थैला नन्हें कंधों पर.. . .(बस्ता नहीं)
खड़ा था कचरा-गाडी की प्रतीक्षा में.....(स्कूल-बस नहीं)
लपका साथियों  संग 'कूड़ा-ढेर पर......(छात्रों संग नहीं)
ढूँढता रहा ढूँढता ही रहा कुछकुछ. .  ...(अध्याय नहीं)
खास न मिला उदास था 'दिन' पर,
गहरे ढेर में मिलीं उसे दो मैली थैली,
'भावनाएँ','संवेदनाएं ' लिखा उनपर,
नादान ने खोला उन्हें कौतूहलवश,
पर कुछ नहीं पाया 'बाल-दिवस' पर. ...(वीरेंद्र)/2-134
 
रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी") 

Tuesday, 13 November 2012

2-133-"फ़िज़ूल रिवायतों से तंग

फ़िज़ूल रवायतों से तंग आ गए,
रस्मे-वफ़ादारी को तोड़ देंगे हम,
बहुत जी लिए हम उनके लिए,
खुद के लिए भी अब जियेंगे हम,
रकीब का नसीब देखा कमाल का,
दोस्त नहीं, रकीब ही अब बनेंगे हम,
कोसता है ज़माना हमें तो कोसले,
बहुत सुना,एक न अब सुनेंगे हम ,

दोस्त होकर भी अजनबी बन गए,
'अजनबी' ही अब बने रहेंगे हम......(वीरेंद्र)/3-133

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Friday, 9 November 2012

3-44-"अपनी नाकाम जिंदगी के लिए.

अपनी  नाकाम जिंदगी के लिए,
मै ज़माने को इलज़ाम नहीं देता, 
कोसता मै नसीब को नहीं,
और ना ही खुदा को दोष देता,

खुद ही हूँ कसूरवार मै,
नाकामियों के लिए, क्योंकि
ज़माने के साथ मै नहीं चलता,
कुछ चलने की कोशिश की भी,
तो वक्त के साथ नहीं बदलता,

थोडा बदला भी पर, ये ज़मीर,
छोड़ देता है देना साथ मेरा.
इब्तदा हुई थी जहाँ से वहीँ ,
लाकर मुझे है पटक देता,
मै खुदा, नसीब, ज़माने को
सच में, कोई इलज़ाम नहीं देता........(वीरेंद्र)/3-44

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Wednesday, 7 November 2012

0-329-"देखा देखी मै भी निकला बेचने.

देखा देखी मै भी निकला बेचने अपना दिल, मगर
मेरा दिल था बड़ा, उसका ज्यादा भाव नहीं आया,
एक जगह मुझे मिला भी कुछ अच्छा भाव मगर,
जिसका था मुझे इंतज़ार वैसा खरीदार नहीं आया ..(वीरेंद्र)/0-329

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-328-"बिक रहे थे चारों तरफ दिल.

बिक रहे थे चारों तरफ अफरा-तफरी में दिल ही दिल,
मैंने भी सीने पर पत्थर रखके बेच दिया मासूम दिल,
पैसे गिन रहाथा मै जोर से रोया मेरा बिका हुआ दिल,
मै भी रोया, पैसे वापस करके उठा लिया अपना दिल...(वीरेंद्र)/0-328

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")/ 1-223

0-333-"मै देखने गया दिलों की 'सेल'

मै देखने गया दिलों की 'सेल',
ढूँढा मेरे यार का जैसा दिल,
झटसे पूछी कीमत मैंने, पर,
दुकानदार बोला 'नोट फॉर सेल'...(वीरेंद्र)/0-333

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-111-"तूफ़ान तो जिंदगी के हो

तूफ़ान तो ज़िन्दगी के हो गए रफा-दफा सभी,
तुम भी तो हो जाओ मुहब्बत में संजीदा कभी...(वीरेंद्र)/1-111

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-268-"उनसे वादा कर लिया

उनसे वादा कर लिया, कभी गम-ज़दा न होंगे हम,
अब यह आलम है, गम छुपाके हँसते जा रहे हैं हम ..(वीरेंद्र)/1-268

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-269-"अब मालूम चला वो शख्स

अब मालूम चला वो शख्स कितना अहम् था,
उसके बिना जी सकता हूँ मै, ये मेरा वहम था...(वीरेंद्र)/1-269

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-272-"खुद ही सर पे लेलेते थे

खुद ही मांगके सर पर ले लेते थे ज़माने भर के गम,
अब ज़माने को आदत सी हो गई है हमें गम देने की...(वीरेंद्र)/1-272

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-104-"बिक रही है तो बिक जाने दे.

बिक रही है तो बिक जाने दे अपनी मुहब्बत को ऐ बेवफा,
कल मिले न मिले अच्छी कीमत, भरोसा क्या बाज़ार का...(वीरेंद्र)/1-104

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-195-" जुदा होने से पहले

जुदा होने से पहले, जो लिखे थे शेर मैंने, 
ये तो बता दे कि अब मै उनका क्या करूँ....(वीरेंद्र)/1-195

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-265-"क्या हुआ जू तमाम

क्या हुआ जो तमाम रात सो न सके, वो खफा होकर,
हमने भी तो कितनी ही रातें गुजारीं थी, यूं रो-रो कर ..(वीरेंद्र)/1-265

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-267-"कुछ खुशबुएँ बस बहती

कुछ खुशबुएँ बस, बहती हवाओं में रहा करती हैं,
मगर कुछ ऐसी भी हैं,  जो रूह में बसा करती हैं....(वीरेंद्र)/1-267

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-273-"जिंदगी कहाँ ले जायगी.

जिंदगी कहाँ ले जायगी, हमें मालूम नहीं,
अँधेरे छटेंगे कि बढ़ेंगे, ये भी मालूम नहीं,
हम तो चल पड़ें हैं ज़िन्दगी के पीछे-पीछे,
या तो कहीं सुबह हो जायगी या शाम कहीं...(वीरेंद्र)/0-273

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-301-"बहुत मुतमईन हूँ,

बहुत मुतमईन हूँ देख कर मै तेरा इन्साफ ऐ खुदा,
जिसने मांगी मौत, तूने उसे कर दी मुहब्बत अता,..(वीरेंद्र)/1-301

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-112-"ला इलाज दर्द-ऐ-गम

ला इलाज दर्द-ऐ-गम की शिफा तलाशते उम्र हो गई,
नासूर बनते चले गए ज़ख्म, जब इंतहा-ऐ-सब्र हो गई .(वीरेंद्र)/1-112


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-044-"अक्सर एहसान महज़

अक्सर एहसान महज़ एहसान होते हैं,
पर कुछ-कुछ, एहसान-ओ-क़र्ज़ होते हैं,
पलते है वो ता-उम्र दिल-ओ-दिमाग में,
क्योंकि वो तो ला-ईलाज मर्ज़ होते हैं...(वीरेंद्र)/0-044

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-276-"क्या करूं इन खुशियों का

क्या करूं इन खुशियों का, ऐ खुदा, समझ में आता नहीं,
रख ले वापस इन्हें, दर्द अपनों का मुझसे सहा जाता नहीं...(वीरेंद्र)/1-276

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-113-"हम अपना हर गम उनसे

हम अपना हर गम उनसे छुपा लेते हैं, के हमें पता है,
उनको आदत है, बस खुशियों को ही गले लगाने की..(वीरेंद्र)/1-113

रचना : वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-056-"हमने सीखा था प्यार निभाना

हमने सीखा था प्यार निभाना अपनी जान देकर,
तूने खो दिया हमें दोस्त, हमारा इम्तिहान लेकर..(वीरेंद्र)/1-056

रचना : वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-148-"कभी न निकला धुंआ

कभी न निकला धुंआ, जब भी अपनों ने दिल जलाया है,
हर मर्तबा निकली है दुआ उनके लिए जलते हुए दिल से...(वीरेंद्र)/1-148

रचना : वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-310-"दिल केदर्द का खुद ही

दिल के दर्द का खुद ही सामाँ करता चला गया,
पत्थर को एहसासो-जज्बात सौंपता चला गया..(वीरेंद्र)/1-310

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-309-" मुहब्बत पाना नसीब वालों

मुहब्बत पाना नसीब वालों का काम है, मगर 
तेरी नफरत भी तो मुहब्बत का दूसरा नाम है..(वीरेंद्र)/1-309

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-006-"जान फूँक डाली अपनी,

जान फूँक डाली अपनी, शेरों में इस गरीब ने,
पर उन्हें पसंद आये शेर, जो लिक्खे रकीब ने..(वीरेंद्र)/1-006

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-063-"मेरा नसीब तू है मेरे

मेरा नसीब तू ही है मेरे दोस्त,
दुआ करता हूँ मेरा नसीब न बदले...(वीरेंद्र)/1-063

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-121-"अबतक संभाले बैठा था


अबतक संभाले बैठा था मै जज्बा-ऐ-मुहब्बत दिल में कहीं,
छीन ले खुदा अब इसे मुझसे, रही मुझे इसकी ज़रूरत नहीं..(वीरेंद्र)/1-121


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-173-"गम तो है बहुत मुझे

गम तो बहुत है मुझे, वो मुझसे जुदा हो गया ,
पर है तसल्ली भी, मै रहा इंसान वो खुदा हो गया..(वीरेंद्र)/1-173

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-060-"कौन कहता है तुझे दोस्ती

कौन कहता है तुझे दोस्ती करना नहीं आता,
तमाम दुश्मनों से मेरे, दोस्ती कर रखी है तूने...(वीरेंद्र)/1-060

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-326-"अब ऐसे मुकाम पर जिंदगी

अब ऐसे मुकाम पर जिंदगी चली आई,
कैसी शाम कैसा गम कैसी अब तनहाई...(वीरेंद्र)/1-326

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-315-"घूँट निराशा का पीकर रह

घूँट निराशा का पीकर रह गया समुंदर,
प्यास लगी तो दूर दूर तक पानी न था...(वीरेंद्र)/1-315

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-180-"तुमने मेरी शिकायत को तो

तुमने मेरी शिकायत को तो देखा, 
पर उसमे मेरा अपनापन न देखा..(वीरेंद्र)/1-180

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-026-"मुझसे कुछ लिखा नहीं जा

मुझसे कुछ लिखा नहीं जा रहा, गुजिश्ता कई दिनों से,
शायद कोई नयी चोट दिल ने खाई नहीं बहुत दिनों से..(वीरेंद्र)/1-026

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी ")

1-032-"कभी अपनों के न मिलने से

कभी अपनों के न मिलने से मायूसी होती है, तो कभी 
किसी 'अजनबी' के लिए भी दिल में उदासी होती है..(वीरेंद्र)/1-032

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-033-"बहुत उदास हो जाते हैं

बहुत उदास हो जाते हैं वो किसी अजनबी के लिए,
काश हम भी एक शाम अजनबी हो जाते उनके लिए ..(वीरेंद्र)/1-033

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("आजनबी ")

1-178-"तूने मुझको भुला दिया

तूने मुझको भुला दिया, इसका मुझे गिला नहीं,
गम ये है मुझे ठुकराके भी कुछ तुझे मिला नहीं ..(वीरेंद्र)/1-178

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("आजनबी ")

1-020-"मैंने सुनाई थी अपने

मैंने सुनाई थी अपने ज़ख्मों की दास्ताँ शेरों में,
वाह-वाह की आवाजों ने दर्द मेरे और बढ़ा दिए..(वीरेंद्र)/1-020

रचनाकार: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-312-"किस्मत में जो लिखा है

किस्मत में जो लिखा है वो तो मिल ही जायगा,
खुदा से तुझे मांग लूं, तू मेरी तकदीर में नहीं शायद..(वीरेंद्र)/1-312

रचनाकार: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-314-"फ़िज़ूल ही लगाई उम्मीद

फ़िज़ूल ही लगाईं उम्मीद वक्त से, वस्ले-यार की,
वक्त गुज़र गया यूँही, वो बड़ा गया-गुज़रा निकला...(वीरेंद्र)/1-314

रचनाकार: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-035-"मै "अजनबी" हूँ बेगाना

मै "अजनबी" हूँ बेगाना हूँ तो सिर्फ तेरे लिए,
यह भी दुनियाँ में एक बड़ा अजूबा है मेरे लिए...(वीरेंद्र)/1-035

रचनाकार: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-204-"तुझे न लेने देंगे हम इस

तुझे न लेने देंगे हम, इस दिल को तोड डालने का मज़ा,
ले आज हमने खुद ही अपने पैरों तले इसको रौंद डाला,..(वीरेंद्र)/1-204

रचना : वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-660-मुस्कुराहटों को रखा हुआ

मुस्कुराहटों को रक्खा हुआ है गिरवी किसी के पास,
मै जुटा नहीं पाया आज तक कीमत उन्हें छुड़ाने की..(वीरेंद्र)/1-660

रचना : वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-283-"तेरी कब्र से लिपट कर

तेरी कब्र से लिपट कर, कितना तुझे सताएं हम,
क्यों न अब दफ्न होकर तेरे हमसफ़र हम हो जाएँ..(वीरेंद्र)/1-283

रचना : वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-158-"आज एक ही निकला था

आज एक ही निकला था जनाज़ा, तेरे शहर में,
पर दो हुए दफ्न, एक मै, एक मेरी नाकाम मुहब्बत....(वीरेंद्र)/1-158

रचना : वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Tuesday, 6 November 2012

1-105-"कब से भटक रहे थे हम

कब से भटक रहे थे हम अपनी जगह तलाशते हुए,
शुक्रगुजार हैं हम तेरे, तूने हमारी जगह तो बता दी...(वीरेंद्र)/1-105

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-153-"जज्बाती इंसान से अच्छे

जज्बाती इंसान से अच्छे पत्थर होते हैं,
ना आहत होते हैं और ना कभी यूं रोते हैं. ..(वीरेंद्र)/1-153

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-053-"हमारी दोस्ती की खोखली

हमारी दोस्ती की खोखली दीवार आखिर कबतक बचती,
मुद्दतों तक जिसकी दरारें, हम ग़म पी पी कर भरते गए..(वीरेंद्र)1-053


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-119-"मामूली सा चिराग हूँ.

मामूली सा चिराग हूँ, भरोसा नहीं कबतक मै जलूँगा,
कुछ देर ही सही, पर कुछ रौशनी तो तुम्हे दे सकूंगा ...(वीरेंद्र)/1-119

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-118-"लब जिन पर रहता था

लब जिन पर रहता था सिर्फ नाम हमारा,
उन पर  रखें बैठे हैं वो जलता हुआ अंगारा....(वीरेंद्र)/118

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-029-"काश मालूम होता तेरे दिल

काश मालूम होता, तेरे दिल में नहीं थी मेरी कोई जगाह,
जाने क्यों तुझसे अबतक मिलता रहा अजनबी की तराह....(वीरेंद्र)/1-029
रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-114-"नहीं ढूंढ पाया मै खुद

नहीं ढूंढ पाया मै खुद को कहीं भी,
यहाँ वहां लेकर फिरता रहा तेरा पता...(वीरेंद्र)/1-114
रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-028-"अपने शहर में तुझे ढूंढते

अपने शहर में तुझे ढूंढते अजनबी से भटक रहे हैं हम,
भूल ही गए, तेरे शहर से तो कब के लौट आये हैं हम..(वीरेंद्र)/1-028
रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-201-"ज़िन्दगी में जब जब खुशियों

ज़िन्दगी में जब-जब खुशियों के सिलसिले आए हैं,
पीछे-पीछे जाने कहाँ से, ज़लज़ले भी चले आए हैं....(वीरेंद्र)/1-201

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-175-"मै तो 'उस' को ही .

मै तो 'उस' को ही समझता रहा बड़ा बेवफा,
देखा जो औरों को, वो कुछ भी नहीं लगा बेवफा...(वीरेंद्र)/1-175

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-126-"वक्त करवट लेता है.

वक्त करवट लेता है, तो रिश्ते हिल जाते हैं,
सच्चाई कही नहीं जाती, होंठ सिल जाते हैं,
एहसासो-जज़्बात भरे इंसान नहीं मिलते,
मौकापरस्त मगर चारों तरफ मिल जाते हैं ....(वीरेंद्र)/0-126

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-153-"मुझे क्यों न हो अज़ीज़ वो गज़ल

मुझे क्यों न हो अज़ीज़ वो गज़ल,
जो मैंने अपने जज़्बात पे लिखी थी,
मेरे एहसासात का आइना थी वो,
जो मैंने बड़े हसीं हालात में लिखी थी...(वीरेंद्र)/0-153

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")



1-095-"अब कहाँ रह गई ज़रुरत

अब कहाँ रह गई ज़रूरत ज़बान की भी,
तोड़ने वाले  निगाहें फेरके भी दिल तोड़ देते हैं...(वीरेंद्र)/1-095



रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")






0-067-"सर्द शहर में तेरे .

सर्द शहर में तेरे अचानक खिल गई धूप,
सूर्यदेव जैसे जाग गए किसी मदहोशी से.
बर्फीली हवाओं का कुफ़्र, कोहरे की धुंध,
सब ही काफूर हो गए तेरी गर्मजोशी से..(वीरेंद्र)/0-067

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Monday, 5 November 2012

0-258-"मै उलझे से सवालों का

मै उलझे से सवालों का जवाब नहीं दूंगा,
दिल पे खाई चोटों का हिसाब नहीं दूंगा,
कई बार टूट चूका है यह दिल अभी तक,

इस मासूम को अब और टूटने नहीं दूंगा. ...(वीरेंद्र)/0-258

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")
 

0-348-"महफिले मुशायरा बदस्तूर

महफिले मुशायरा बदस्तूर जमती रही,
परवाने जलते रहे, शमा भी जलती रही,
दोनों की मौत का ये मंज़र देख कर भी ,
कह-कहे और शायरी यूं ही चलती  रही...(वीरेंद्र)/0-348

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-202-"अपनी मुहब्बत का पैगाम


अपनी मुहब्बत का पैगाम लेकर,
दिल में बस एक तेरा नाम लेकर,
काँटों के ऊपर हम गुज़र जायेंगे,
लबों पर तेरा नाम सरेआम लेकर...(वीरेंद्र)/0-202

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-272-"खुद से ही बगावत किये

खुद से ही बगावत किये जा रहा हूँ मै,
हर एक चोट उनकी सहे जा रहा हूँ मै,
कभी होगी तसल्ली उन्हें चोट देते-देते,
इसी उम्मीद पे बस जिए जा रहा हूँ मै...(वीरेंद्र)/-272

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-201-"मै तेरा हूँ इस बात में तेरा.

मै तेरा हूँ, इस बात से तुझे इकरार कहाँ है,
तू मेरी नहीं इससे मुझे भी इन्कार कहाँ है,
ऐरा-गैरा मेरे सामने तेरा हाथ थाम चलदे,
तू ही सोच, इतनी भी भला तू गैर कहाँ है....(वीरेंद्र)/0-201

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-311-"सूखे ज़र्द हैं मेरे शजर के

सूखे ज़र्द हैं मेरे शजर के पत्ते, मगर हरे लगते हैं,
हरे हैं ज़ख्म, फिर भी किसी उम्मीद पे लटके हैं..(वीरेंद्र)/1-311

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-174-"जो कहते थे 'हमनफस'

जो कहते थे 'हम-नफस' हमें, वो कहाँ हैं,
काश! देख लेते वो हमारी जाती हुई साँसें..(वीरेंद्र)/1-174

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-331-"ज़माने का क्या कसूर.

ज़माने का क्या कसूर जो हमें समझता है खुश,
हमें ही बुरी आदत है ग़मों में भी मुस्कुराने की...(वीरेंद्र)/1-331

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-100-" करता हूँ ज्यादती.तुझसे

करता हूँ ज्यादती तुझसे इतनी उमीदे-वफ़ा करके,
तेरी मजबूरियां भी तो कुछ होंगी मुहब्बत से बढ़के...(वीरेंद्र)/1-100

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-334-"आहट भी नहीं होती और

आहट भी नहीं होती, और चोट हम खा लेते हैं,
जिंदगी गुज़रती भी नहीं फिरभी गुज़ार लेते हैं...(वीरेंद्र)/1-334

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-299-"हम टूटने लगे तेरे.

हम टूटने लगे तेरे वादों की आज़माइश करते करते,
ना जाने क्यों ,तुम नहीं थके, झूंटे वादे करते-करते...(वीरेंद्र)/1-299

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")


1-068-"तुझे तो भुला चुका हूँ

तुझे तो भुला चूका हूँ मै कभी का, ऐ बेवफा,
कैसे भुलाऊँ वो घडी जब दोस्त तुझे बनाया था...(वीरेंद्र)/1-068


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")


1-304-"ये चाँद ये सितारे और

ये चाँद ये सितारे, और ये सब नज़ारे,
सारे लगते हैं स्याह मुझे बिन तुम्हारे...(वीरेंद्र)/1-304

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-328-"इतना जो तुम आज महक

इतना जो आज तुम महकती आ रही हो,
क्या मेरे ख़्वाबों से मिल कर आ रही हो..(वीरेंद्र)/1-328

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-330-"आज अच्छा सा बहाना

आज अच्छा सा बहाना ढूंढ लो रूठ जाने का,
बहुत दिनों बाद फिर मन है तुम्हे मनाने का...(वीरेंद्र)/1-330

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-127-"कभी दिया एहसासे- जवानी.

कभी दिया एहसासे-जवानी, कभी सामाने-शर्मिंदगी,
कमबख्त कभी बेखुद है तो कभी बेसुध मेरी जिंदगी...(वीरेंद्र)1-127

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-097-"अच्छा ही किया जो हमने

अच्छा ही किया जो हमने भुला दी उनकी बेवफाई,
वरना यादों की भीड़ हो जाती, कट न पाती तन्हाई...(वीरेंद्र)1-097

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-124-"लोग सोचते हैं यादें होती..

लोग सोचते हैं, यादें होती हैं तन्हाई में सहारा,
मै कहता हूँ यादें ही करती हैं इंसान को तनहा...(वीरेंद्र)1-124

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-320-"शायरी के काम में हाथ

शेरो-शायरी में हाथ आजमाने से डरता था मै,
देखा बेनकाब उन्हें, तो काम ये आसान लगा मुझे ..(वीरेंद्र)/1-320

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-106-"वो आये मेरी कब्र पर और.

वो आये मेरी कब्र पर और बोले पशेमा होकर,
हम बहुत पछता रहें हैं तुम्हारा इम्तिहान लेकर..(वीरेंद्र)/1-106

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-150-"हम जितनी कोशिश करते

हम जितनी कोशिश करते हैं गम छुपाने की,
उतनी ही आदत है उन्हें दुखती रग दबाने की..(वीरेंद्र)/1-150

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-287-"दिल लगा सकते हैं बस.

दिल लगा सकते हैं बस दिलदार ही, इस ज़माने में,
वो क्या लगाएंगे जिनके कुछभी नहीं दिल के खाने में...(वीरेंद्र)1-287

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Sunday, 4 November 2012

1-285-"गैरों से तो छिपा लिया इन.

गैरों से तो छिपा लिया इन सुर्ख आँखों का सबब,
कैसे छुपाओगे उनसे जो बसते हैं उन्ही आँखों में...(वीरेंद्र)1-285

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-260-" हमने क्या कह दिया

हमने क्या कह दिया आप गुस्से में अच्छे लगते हैं,
हंसी गायब है चेहरे से उनके, गुस्से में ही वो रहते हैं..(वीरेंद्र)/1-260

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-259-"ये दौलते-हुस्न तुम्हारे लिए.

ये दौलते-हुस्न तुम्हारे लिए न सही मेरे लिए बेशकीमती है,
अपने दिल की तराह इसे भी मेरे दिल में महफूज़ कर दीजिए..(वीरेंद्र)1-259

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-327-"मंजिल की जानिब रख दो

मंजिल की जानिब रख दो पहला कदम,
दूसरे कदम में पास आ जायगी मंजिल..(वीरेंद्र)/1-327

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-066-"दोस्त आते हैं और जाते हैं.

दोस्त आते हैं, और जाते हैं, रुखसती ज़माने का दस्तूर है,
तू मेरी जिंदगी से चलता बना, मैंने कब कहा तेरा कसूर है...(वीरेंद्र)1-066

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-282-"दिल चुपचाप नहीं धड़कता.

1-016-"मेरी शायरी कुछ भी नहीं

1-003-"जज़्बात तेरे दिल के बेशकीमती.

1-281-"चाँद सितारों, हम भी तुम्हारी .

1-117-"तमाम उम्र हम उनसे बा-वफ़ा .

तमाम उम्र हम उनसे बा-वफ़ा रहे,
मौत ने आखिर बे-वफ़ा बना दिया..(वीरेंद्र)/1-117


रचना: वीरेंद्र सिन्हा("अजनबी")
 




1-109-"नोंचकर मेरे पाक रिश्ते

नोंचकर मेरे पाक रिश्ते, गैरों के सरपे सजा दिए,
जा, बद-दुवा है मेरी, ता-उम्र तू रिश्तों को तरसे ...(वीरेंद्र)/1-109

रचना: वीरेंद्र सिन्हा("अजनबी")
 


1-157-"नहीं किया मेरा दर्द बयाँ

नहीं किया मेरा दर्द बयान उसने अपनी गज़ल में,
जाने क्यों ,पत्थर दिल भी शायरी किया करते हैं...(वीरेंद्र)/1-157

रचना: वीरेंद्र सिन्हा("अजनबी")
 



1-277-" निकाल ही फेंका हमने

निकाल ही फेंका हमने इस एहसान फरामोश दिल को,
रहता तो हमारे पास था और बाते किया करता था उनसे'..(वीरेंद्र)/1-277

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-004-"शायरी में हाथ आजमाने से

शायरी में हाथ आजमाने से बहुत डरा करते थे हम,
जबसे बेनकाब दीदार हुए उनके, काम ये बड़ा आसान लगा...(वीरेंद्र)/1-004

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-292-"हर कागज़ में तसव्वुर करता.

हर कागज में तसव्वुर करता हूँ तेरे खत होने का,
जाने कब लग जाती हैं आँख कागजों को टटोलते..(वीरेंद्र)/1-292

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-108-खुद ही करके चले

खुद ही करके चले जाते हैं तनहा हमें,,
आकर पूछते हैं, इतना सन्नाटा क्यूँ है..(वीरेंद्र)/1-108


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")





1-125-"शजर-ऐ-जिंदगी सूख कर.

शजर-ऐ-जिंदगी सूख कर कंकाल होता गया,
एक-एक पत्ता हर रोज शाख से कम होता गया....(वीरेंद्र)1-125

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-126-"सुन तो रखा था "आग का

सुन तो रखा था "आग का दरिया" हमने,
इश्क किया तो पार करना भी जाना हमने.....(वीरेंद-1-126


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")



1-284-"खुदा ने नहीं एक संगतराश

खुदा ने नहीं, एक संगतराश ने बदल दी मेरी तकदीर,
अब राहों का पत्थर न रहा मै ,जब से तराशा गया हूँ ...(वीरेंद्र)/1-284

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-280-"वक्त तू निकला जाय है...

वक्त तू निकला जाय है ,तीर-ऐ-तरकश की तराह,
आ तुझे वापस खींच लूं, एक लंबे कश् की तराह.....(वीरेंद्र)1-280


1-290-"मै अपनों के हज्जूम में एक

मै 'अपनों' के हज्जूम में एक अपने के लिए तडपता रहा,
ज्यों प्यास बुझाने को समुंदर,पानी के लिए तरसता रहा..(वीरेंद्र)/1-290

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-286-"हमने ना देखा था उन्हें, ना

हमने ना देखा था उन्हें, ना देखी थी क़यामत,
मुबारक दिन ईद का, आज दोनों को देख लिया..(वीरेंद्र)/1-286

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-297-"इंसान पत्थरों से ठोकर

इंसान पत्थरों से ठोकर खाता है,पहाड़ों से नहीं,
वो दिल से हार जाता है, अपने होंसलों से नहीं..(वीरेंद्र)/1-297

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-288-"हम सिर्फ दफ्न हुए थे

हमें सिर्फ दफ़न हुए थे, हुए जुदा नहीं,
मौत हमें आई थी, हमारे इश्क को नहीं..(वीरेंद्र)/1-288

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-096-"कारवां बेवफा का निगाहों

कारवाँ बेवफा का निगाहों के सामने से ऐसा गुज़र गया,
नामों-निशाँ न छोड़ा, गुबार भी अपने साथ लेकर गया...(वीरेंद्र)/1-096


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-054-"दोस्ती में विश्वास है कांच

दोस्ती में विश्वास है कांच का गिलास,
ऊंचाई से गिरा और हो गया खल्लास,..(वीरेंद्र)/1-054

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-141-"सुना है लगी है सेल दिलों की.

सुना है लगी है 'सेल' दिलों की तेरे शहर में,
'वफ़ा' के पैकिंग में बेवफा दिल मिल रहे हैं...(वीरेंद्र)/1-141

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-139-"कभी तो मुझे भी लेने दे

कभी तो मुझे भी लेने दे, तुझे मनाने का मज़ा,
दुनियां रूठी है मुझसे, कभी तू भी तो रूठ जा...(वीरेंद्र)/1-139



रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-138-"मै अपनी चीज़ें संभाल


मै अपनी चीज़ें संभाल नहीं पाता, बड़ी बुरी आदत है मेरी,
मेरी जिंदगी भी तू संभाल ले, अब ये भी अमानत है तेरी..(वीरेंद्र)/1-138




रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-306-"भूले भटके जब कभी आ

भूले भटके जब कभी आ जाती है खुशी कोई,
समझ लेता हूँ मै, आने वाला है तूफ़ान कोई...(वीरेंद्र)/1-306

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-205-"तेरी आँखें हो रहीं हैं.

तेरी आँखें हो रहीं हैं मेरी मदहोशी का वाईस,
यकीन नहीं आता तो नकाब गिराकर देख ले.....(वीरेंद्र)/1-205

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-540-"हम तो छोड़ भी दें

हम तो छोड़ भी दें ये दुनियां किसी के लिए,

पर यहाँ कौन है जो छोड़ेगा दुनियां हमारे लिए..(वीरेंद्र)/1-540




रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-522-"तूफानों से क्यों डरें .

तूफानों से क्यों डरें, ज़िन्दगी जब तेरे हाथ में हैं,
क़यामत हो जाय, अब तेरा हाथ मेरे हाथ में है..(वीरेंद्र)1-522

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")



1-206-"बेशुमार चोटें खाई हैं


बेशुमार चोटें खाई हैं इस दिल पर, कभी गिनी नहीं,
फुरसत् कभी मिलेगी तब गिन लेंगे निशां ज़ख्मों के...(वीरेंद्र)/1-206


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

3-43-"शहर में उसके आज छाई.

शहर में उसके आज छाई एक मुर्दमी सी है,
नामौजूदगी से उसकी, बड़ी एक कमी सी है,


 उसके पसंदीदा दिलकश नज़ारे,रास्ते हवाएं,
सब बेचैन बेनूर हैं, उनमें हरकत थमी सी है.

 वर्के-गुलाब झड गए,परिंदे तश्नगाँ से बैठे हैं,
गर्मजोशी है गायब, चौतरफा बर्फ जमी सी है,

 दिलासा दिया खुदको इंतज़ार खत्म होने का,
दिल तो मान गया, आँख में मगर नमी सी है.

जश्ने-बहाराँ सभी, चल रहे हैं बदस्तूर यूं तो,
फिर भी शहर में, फैली क्यों एक गमीं सी है.....(वीरेंद्र)3-43

 
रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")
 
 
 
 

Friday, 2 November 2012

2-123-"मेरे लिए हो प्रिय तुम काव्य.

मेरे लिए हो प्रिय तुम काव्य की भव्य सौगात,
भावों का हो तुम सागर, शब्दों की हो बरसात........(वीरेंद्र)/2-123

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")


2-122-"पवन पैगाम पहुंचाए प्यारे.

पवन पैगाम पहुंचाए प्यारे प्रीतम तक,
मै मन्त्र-मुग्ध मुस्काऊँ उत्तर आने तक....(वीरेंद्र)/2-122
रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-119-"हे प्रभु परिवर्तित होकर मै..

हे प्रभु, परिवर्तित होकर मै जाता हूँ आदर्श की ओर प्रतिदिन,
आशीर्वाद दे, हर्षित हो जाऊं, दर्पण में देख अपना प्रतिबिम्ब...(वीरेंद्र)/2-119

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")



2-117-"विरह बिन मिलन ऐसा,

विरह बिन मिलन ऐसा,
पतझर बिन बसंत जैसा.....(वीरेंद्र)/2-117

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")



2-100-"काश मेरा और तुम्हारा भी

काश मेरा और तुम्हारा भी होता एक इतना ही स्थायी क्षितिज,
अनंत काल तक धरती-आकाश की मानिंद हमारा मिलन होता...(वीरेंद्र)/2-100

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")


2-262-"परस्पर विश्वास और .

परस्पर विश्वास और पारदर्शिता का व्यवहार,
जीवन पर्यंत मधुर आपसी संबंधों का आधार,..(वीरेंद्र)/2-262

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")


2-62-"उप्लाब्धियों से तो.

उपलब्धियों से तो हम सीखते हैं,
पर गल्तियों से बहुत कुछ सीखते हैं....(वीरेंद्र)/2-62

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")



0-306-"चंद शीरीं अल्फाज़े-हमदर्दी.

चंद शीरीं अल्फाज़े-हमदर्दी काफी हैं आगाज़े-दोस्ती के लिए,
उम्र लग जाती है मगर, उनको अंजाम तक पहुँचाने के लिए,
दोस्ती है किसी भी इश्क से ज्यादा पाक,साफ़, और मखसूस,
कि ये महज़ कशिश नहीं एक इंसानी जज्बा है किसी के लिए....(वीरेंद्र)/0-306

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-308-"खाओ इतना जो तुम पचा..

खाओ इतना, जो तुम पचा सको,
दोस्त बनाओ इतने जो निभा सको,

सौ दोस्त से भला है एक ही दोस्त,
दिल की बात जिसे तुम बता सको...(वीरेंद्र)/0-308

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-121-"आईने रहते हैं वही, बस चेहरे.


आईने रहते हैं वही, बस चेहरे ही बदल जाते हैं,



चश्मे बदल लो अगर तो नज़ारे बदल जाते हैं,


दुनियां की फितरत ठहरी बदलने की, मगर 


कुछ लोग जाने क्यों बेसबब ही बदल जाते हैं....(वीरेंद्र)/0-121


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-089-"जब तक इंसान का दिल

जब तक इंसान का दिल बड़ा रहेगा,
मेहरबान उस पर हमेशा खुदा रहेगा, 
जहाँ पर भी होती है खुदा की इबादत,
उस घर में वो सभी बरकतें देता रहेगा..(वीरेंद्र)/0-089

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Thursday, 1 November 2012

0-310-"अब जब मै और तुम

अब जब मै और तुम रहे दोस्त नहीं,
शिकायत मुझे तुमसे रही कोई नहीं,
मेरी गम-ज़दा शायरी पर मत जाना,
ये औरों के लिए है तुम्हारे लिए नहीं..(वीरेंद्र)/0-310

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-123-"जिंदगी तू मुझे कहाँ से कहाँ

जिंदगी तू मुझे कहाँ से कहाँ लेके गई,
मै डूबता गया, तू इम्तिहान लेके गई,
तूने दिया था मुझे बहुत, कहाँ इंकार है,
पर एक हाथ से दिया दूसरे से लेके गई..(वीरेंद्र)/0-123


रचना : वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-324-"नश्तर मेरे ज़ख्मों पे लगा


नश्तर मेरे ज़ख्मों पे लगा दे तू इस तराह,
कतराए-खून बहे, तुझे मंजिल का पता दे...(वीरेंद्र)/1-324

रचना : वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-209-"उनका और मौसम का

उनका और मौसम का मिजाज़ है एकसा,
अपना वक्त आने पर, दोनों बदल जाते हैं,
कोई भूल न जाए उनकी आदत इसलिए,
कभी-कभी दोनों, बेवक्त भी बदल जाते हैं...(वीरेंद्र)/0-209

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-281-"बोलो तुम थक क्यों गए


बोलो तुम थक क्यों गए, थामे थामे हाथ,
अभी तो बड़ी दूर जाना था हमें साथ-साथ,
थोडा साहस, थोड़ी ऊर्जा, थोडा सा धीरज 
रखते हम तो, दूर नहीं था सुखों का प्रभात....(वीरेंद्र)/0-281

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-078-"तुम हो अजनबी पर



तुम हो अजनबी पर मुझे क्यों तुम्हारा इंतज़ार है,
मै जान गयी हूँ शायद यह प्यार का कोई बुखार है...(वीरेंद्र)/1-078

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-125-"ज़ेबा नहीं देते दोस्ती और

जेबा नहीं देते दोस्ती और वफ़ा के लफ्ज़ उनकी ज़ुबान पर,
दिल जिनके खुदगर्जी से भरे और जज्बात से खाली होतें हैं,
अपनाइयत और ऐतमाद क्या होते हैं, वो जानते ही नहीं,
बेवफा हो कर भी सर ऊपर रखते हैं, शर्म से न पानी होते हैं ...(वीरेंद्र)/0-125

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0384-"मुझको फक्र है उस पर कि..

मुझको फक्र है उस पर कि वो निभाता तो है,
दुश्मनी हुई तो क्या, वो भी एक रिश्ता तो है,
बेवफा,खुदगर्ज़ और झूठा हुआ तो क्या हुआ,
मुद्दतों मूर्ख बनाने का हुनर, उसे आता तो है..(वीरेंद्र)/0-384

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-187-"मैंने जो लगा दिया लाल

मैंने जो लगा दिया लाल गुलाल उनके,
तैश से औरभी होगए लाल गाल उनके,
बोले ठहरो देखो आज न छोडूंगी तुम्हे,
मैंने पेश कर दिया खुदको सामने उनके..(वीरेंद्र)0-187

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-057-"दोस्ताना तो निभा नहीं

दोस्ताना तो निभा नहीं सके ज़रा भी, जब दोस्त थे,
दुश्मनी निभाने की इन्तेहा कर दी, दुश्मन बने जबसे..(वीरेंद्र)/1-057

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-319"उसे खो दिया कहीं मैंने.

उसे कहीं खो दिया मैंने, कुछ नहीं बचा मेरे पास,
आ जाओ ज़माने वालों, बेशक अब लूट लो मुझे..(वीरेंद्र)/1-319

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-284-"चैन से वो रहने नहीं.

चैन से वो रहने नहीं देते,
गुस्सा मुझे होने नहीं देते,
रूठों को मनाऊँ भी तो कैसे,
प्यार भी तो वो करने नहीं देते ..वीरेंद्र)/0-284

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"