Wednesday, 31 October 2012

0-214-"वादे से मुकरना था तो..

वादे से मुकरना था तो मुकर जाते, बहाने की क्या ज़रूरत थी,
आपका इलज़ाम तो हमें पता था, बताने की क्या ज़रूरत थी,
वो एहसास, जज्बात और संजीदा रिश्ते, आपने जो बनाए थे,
उन्हें अपने दिलसे निकाल देते, दफनाने की क्या ज़रूरत थी..(वीरेंद्र)/0-214


रचना : वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-316-"मैंने तो बैठाया तुम्हे .

मैंने बैठाया तुम्हे दिल में, फिर क्यों बिगड़ गए,

ऊंची जगह लगी नीची तो सर पर तुम चढ़ गए...(वीरेंद्र)/1-316


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-048-"मै ही खतावार हूँ तेरे नीचे

मै ही खतावार हूँ तेरे नीचे गिर जाने का, दोस्त
मैंने ही क्यों बैठाया था तुझको इतनी ऊंचाई पर...(वीरेंद्र)/1-048
रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-127-रिश्ते अब तो पल में


रिश्ते अब तो पल में उलट-पुलट जाते हैं,

कल तक थे दोस्त वो दुश्मन बन जाते हैं,

मतलब निकलता है गर कोई किसीसे तो,

जो दुश्मन थे,  वो दोस्त भी  बन जाते हैं...(वीरेंद्र)/0-127

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")



 


0-048-"दोस्ती में नफ़ा-नुक्सान.

दोस्ती में नफ़ा नुक्सान अपना देखते हैं लोग,
फिर बेवफाई का अच्छा बहाना ढूंढते हैं लोग,
देते हैं दुहाई इन्साफ-पसंदगी की बहुत मगर,
सच तो यही है कि, बड़े संग-दिल होते हैं लोग...(वीरेंद्र)/0-048


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Monday, 29 October 2012

0-189-"इश्क मेंजान दे देते


इश्क में जान दे देते तो अच्छा ही होता,
ना देकर जान, हम तो बस पछता रहे हैं,
न ये जाँ रहती, न ज़ख्मे-बेवफाई रहता,
पालके ज़ख्म को, नासूर बनाते जा रहे हैं....(वीरेंद्र)/0-189

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-033-"आशियाँ उजड़के एक


आशियाना उजड़के एक वक्त बीत गया,
सदमे से घिरे हुए बैठे हैं हम आज भी,
खौफ बैठा हुआ है ऐसा तेज हवाओं का,
बुझ कर भी डरे हुए हैं, जैसे चिराग भी...(वीरेंद्र)/0-033

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-315-"खुशियाँ छीन कर ले गया

खुशियाँ छीन कर ले गया, जो गम बांटने आया था,
दगाबाज़ बनके चल दिया, हमराज़ बनके आया था,
बड़ी याद आती है उसकी, और याद आती है वो घड़ी,
जिंदगी में मेरी, जब वो मेरा दोस्त बन के आया था. .(वीरेंद्र)/0-315


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-526-"अब नहीं है तो न सही

अब नहीं है तो न सही, मुहब्बत मुझ से 
पर पूछूंगा फिर कुछ वक्त गुज़र जाने के बाद..(वीरेंद्र)/1-526

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-334-"देखकर तुमको उछल जाता.

देखकर तुमको उछल जाता है मासूम ये दिल,
अक्सर खा जाता है चोट उछल-कूद में ये दिल,
बड़ी मुश्किल से लगाम लगा पाया हूँ मै इसपे,
ज्यादा न खेलो इससे, मुंह लग जाताहै ये दिल...(वीरेंद्र)/0-334

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-192-"तुम्हारी जुल्फों में अगर ये.

तुम्हारी जुल्फों में अगर ये छल्ले न होते,
मेरे दिल में मुहब्बत के ये हल्ले न होते,
हम भी कहीं किसी काम में मसरूफ होते,
शेरो-शायरी में मुब्तला यूं निठल्ले न होते....(वीरेंद्र)/0-192

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-266-"चका चौंध रौशनी आँखों

चकाचौंध रौशनी आँखों को अँधा कर देती है, 
अँधेरे कैसे भी हों आँखों को तकलीफ तो नहीं देते .(वीरेंद्र)/1-266

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")


0-118-"डरता रहा मै खूंखार

डरता रहा मै खूंखार इंसानों से,बेगानों से,
हमेशा बचता रहा मझधार के तूफानों से,
मौत को जेब में डाल निकला हूँ जबसे मै,
मुझसे सब खौफ खाने लगे हैं टकराने से..(वीरेंद्र)/0-118

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")


0-335-"मांग लेता हूँ खुद ही

,
मांग लेता हूँ खुद ही बढ़के सबके गम,
देखा नहीं जाता मुझसे कोई गम-ज़दा,
जिसके पास जितने जैसे गम हैं, दे दो,
मैंने दिल को बना लिया है गम-कदा...(वीरेंद्र)/0-335

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-260-"मुद्दत से दोस्त रहा हूँ

मुद्दत से दोस्त रहा हूँ अंधेरों का मै,
आमद से सहर की सहम जाता हूँ मै,
अबतो घबराता है ये दिल उजालों से,
सुबह से मुन्त्ज़िरे-शाम हो जाताहूँ मै.(वीरेंद्र)/0-260

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-282-"रौशन है शम्मा अपनी अपनी


रौशन है शम्मा अपनी- अपनी,
हमारी दोस्ती की मिसाल नहीं,
एक थे, एक रहेंगे, हम हमेशा,
जुदा हो जाएँ, कोई सवाल नहीं...(वीरेंद्र)/0-282


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-324-"साकी मुझे शराब मत..

साकी मुझे शराब मत परोस आज यहाँ,
यकीं कर, पीने नहीं आया हूँ आज यहाँ,
मै तो बस पीते हुओं को देखने आया हूँ,
के कैसा परेशां लगता था मै बैठे हुए यहाँ...(वीरेंद्र)/0-324

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")


0-323"हमें नहीं हैं उजाले माफिक.

हमें नहीं हैं उजाले माफिक इसलिए मयखाने चले जाते हैं,
तकदीर से टकरा नहीं सकते, इसलिए जाम टकरा लेते हैं,
बेरुखी देखने से पहले किसी की, खुद के होश उड़ा लेते हैं,
हमसफ़र न बना कोई, खुद सँभलते और लड़खड़ा लेते हैं...(वीरेंद्र)/0323


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-071-"खुदगर्ज़ हवाएं, नफरतों का

खुदगर्ज़ हवाएं, नफरतों के तूफ़ान, बेवफाई की आंधी,
पत्थरों की बाढ़, बेरुखी का ज़लज़ला,खून जमाती बर्फ,
आफतों के बादल, ग़मों की धूप, अश्कों की चांदनी,
झेल नहीं सकता, अब और मै, तेरे शहर का ये मौसम....(वीरेंद्र)/0-071 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")


1-579-रखते हो जब मुझसे रिश्ता



रखते हो जब मुझसे रिश्ता ख्वाबों ख्यालों में, 
फिर क्यों मुझे अजनबी करार दिया था तुमने..(वीरेंद्र)/1-579

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")




Sunday, 28 October 2012

0-311-"बात-बात में आंसू बहाना.

बात बात में आंसू बहाना तुम नहीं,
रात को जाग के बैठ जाना तुम नहीं,
हल्की फुल्की दोस्ती करना बेहतर है,
तोड़ भी दे कोई तो, कोई होता गम नहीं...(वीरेंद्र)/0-311

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")





1-208-"इंसानियत ज़रा भी नहीं

इंसानियत ज़रा भी नहीं रही आज इंसान के अंदर,
खुद है मेहमान चार दिन का लेके घूमता है खंजर...(वीरेंद्र)/1-208

रचना:वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-013-"देते नहीं दाद कभी

देते नहीं दाद कभी वो कलाम पे मेरे,
जुड़ न जाए कहीं नाम उनका नाम से मेरे....(वीरेंद्र)/1-013

रचना:वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-279-"चाह कर भी जाने क्यों

चाह कर भी जाने क्यों उसे मै भूल सका नहीं,
कोई बात ज़रूर है उसमे जो मुझे भी पता नहीं..(वीरेंद्र)/1-279

रचना:वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-090-"मुझे पीते हुए मत टोको


मुझे पीते हुए मत टोको मयखाने वालों,
मेरा साकी जानता है मेरी ज़रूरियात को...(वीरेंद्र)1-090

रचना:वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-336-"अपनों की चोट सही


अपनों की चोट सही नहीं जाती, गैरों की तो सह लेता हूँ,

समझ कर हर बार आखिरी, हर चोट को मै सह लेता हूँ...(वीरेंद्र)/1-336



रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")



0-418-"तेरी बेवफाई का बोझ

तेरी बेवफाई का बोझ, सर पे लेकर यूँ,
दुनियां से रुखसत तो ना हुए होते हम,

मेरी वफ़ाओं का, इतना सिला तो देते,
कुछ और देर करते बेवफा होने में तुम...(वीरेंद्र)0-418

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-070-"जब मै निकल पड़ता हूँ.

जब मै निकल पड़ता हूँ तेरे घर की तरफ,
हसीन सफर कितनी जल्दी कट जाता है,
यूँ तो हवाएं हैं वही, और रास्ते भी हैं वही,
पर लगता वक्त कम, फासला घट जाता है..(वीरेंद्र)/0-070

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-194-"अपनी आँखों को तुम इतना

अपनी आँखों को तुम इतना थकाए बैठे हो,
इतने सारे ख्वाब तुम इनमे सजाये बैठे हो,
अब काजल ने भी ले ली इन आँखों में जगह,
क्या मुझे निकालने का इरादा बनाये बैठे हो...(वीरेंद्र)/0-194

0-063-"आस लगाए मै कबसे मै.


आस लगाए मै कबसे इंतज़ार करता रहा,
उसकी याद में यूंही मै बेकार तडपता रहा,
वो आएगी मेरी शरीक-ऐ-जिंदगी बन कर,
मै ये सोच कर जिंदगी बारबार जीता रहा...(वीरेंद्र)/0-063

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-277-"माँगा जो वादा-ऐ-वफ़ा

माँगा जो वादा-ऐ-वफ़ा उनसे इश्क में हमने,
बोले, वफ़ा अब मिलती है सिर्फ किताबों में,
मिला नहीं नामोनिशाँ वफ़ा का वहां भी हमें,
किताबें बे-हिसाब उलट पुलट डाली हैं हमने...(वीरेंद्र)/0-277

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-271-"अब जा कर आया है.

अब जा कर आया है जिंदगी जीने का सलीका मुझे,
काश, मेरा रब दे दे एक और मौका-ऐ-जिंदगी मुझे,
बना दूंगा दिल को पत्थर,कर लूँगा तौबा जज़्बात से,
पहचानूंगा मै भी इंसान को उसकी दौलत,औकात से...(वीरेंद्र)/0-271

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-270-"देख कर बेरुखी उनकी..

देख कर बेरुखी उनकी, इस कदर आज,
ना जाने क्यों आँखें हमारी नम हो गई,
दरवाज़े तो पहले ही बंद होगए थे उनके,
मगर अब तो खिड़कियाँ भी बंद हो गईं...(वीरेंद्र)/0-270

0-043-"पूछने मुश्किल थे जो.

पूछने मुश्किल थे उनसे जो सवाल कभी,
मुझे मिलने लगे हैं उनके जवाब, अभी,
मगर अब भी बाकी है एक अहम् सवाल,
जाने और कितनी मुलाकातें लगेंगी अभी...(वीरेंद्र)0-043

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-358-"दो जून की रोटी की


दो जून रोटी की खातिर, ढोकर पत्थर सर पर,

वृद्धा खुद है बेघर, मगर बना रही दूसरे का घर,
कैसी दुर्गति तेरी, हे पूज्या, हे ममता की मूरत,
मुंह पर तेरे झुर्रियाँ, धनुषाकार बनी तेरी कमर,..(वीरेंद्र)0-358

0-120-"जिंदगी भर चुकाए हमने.

जिंदगी भर चुकाए हैं हमने कर्जे कैसे-कैसे,
गैरों के चुक गए, अपनों के हैं अभी बाकी,

पुराने गहरे ज़ख्म अगर भर भी जाएं तो, 
मुस्तकिल निशाँ रह जाते हैं तब भी बाकी...(वीरेंद्र)0-120

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-199-"तुझसे ज्यादा हम.तेरी

तुझसे ज्यादा हम तेरी परछाईं से प्यार करते हैं,
वह गुस्सा नहीं करती, हम भी खामोश रहते हैं,

बहुत अजब गजब है हमारे प्यार का अंदाज़ भी,
तेरी ही शिकायतें तेरी परछाईं से किया करते हैं...(वीरेंद्र)/0-199

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")


0-405-"मुहब्बत ने दे दिए आंसू.


मुहब्बत ने दिए आंसू,
ख्वाबों ने देदी मायूसी,
वापस लेले तू इसे खुदा,
क्यों देदी जिंदगी ऐसी.....(वीरेंद्र)/0-405

1-527-"कैसे लोग इस


कैसे लोग इस ज़िन्दगी में आ जाते हैं,
दिल में रहता है प्यार पर मुकर जाते हैं...(वीरेंद्र )/1-527

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-154-"चंद दिन की मुहब्बत


चंद दिन की मोहब्बत में वो जिंदगी का गुलज़ार हो गए,
इश्क में सूख कर हम खार हुए, और वो आबशार हो गए,
हमारे नाचीज़ अशार पर देते नहीं वो कुछ खास तवज्जो,
लेते नहीं सलाम हमारा, दाद देने में किफायतशार हो गए...(वीरेंद्र)0-154


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-190-"मुहब्बत की कश्ती दौड़..

मुहब्बत की कश्ती खुद ब् खुद दौड़ रही है तेरी तरफ,
कि, साहिल से इसे तेरी जुल्फों के इशारे मिल रहे हैं,

नहीं है अब ज़रूरत इसे किसी दीगर रौशनी की भी,
तुझमे रौशन शम्मा से मंजिल के नज़ारे मिल रहे हैं....(वीरेंद्र)/0-190


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-16-"ये बात मेरी समझ..


ये बात मेरी समझ में नहीं आती है,
कोई महिला गर मुझसे दोस्ती करे,
तो, वो बेचारी 'वो' कैसे हो जाती है,
वह एक व्यक्ति भी है एक मित्र भी,
तो मित्र ही क्यों नहीं कहलाती है........(वीरेंद्र)/2-16

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Saturday, 27 October 2012

2-47-"तुम्हे पाला तुम्हारे साथ.

तुम्हे पाला, तुम्हारे साथ कुछ ख्वाबों को पाला,
बूढ़े माता-पिता के ये ख्वाब मत बिखरने देना,
उनसे तुम्हे कुछ मिले न मिले, आह मत लेना...................(वीरेंद्र)/2-47


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-69-"बूढ़े हो जाते हैं माँ-बाप.


बूढ़े हो जाते हैं माँ-बाप उम्र से, भावना से नहीं,
पाला था तुम्हे उन्होंने प्यार से, फ़र्ज़ से नहीं,
ना करो अनदेखी उनकी, और न भूलो ये कभी,
फल फूल पाओगे उनकी दुआ से, आह से नहीं......(वीरेंद्र)/2-69

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-27-"मै खिंचा जा रहा था.



मै खिंचा जा रहा था भावनाओं के गहरे समंदर की ओर,
आभार मानूं तुम्हारा, तुमने मुझे किनारे पर ही रोक दिया

लहरें फिर भी आया रहीं हैं बार बार मुझे खींच लेजाने को,
अच्छा है मगर हर बार तुमने ह्रदय को मेरे झकझोर दिया ....(वीरेंद्र)/2-27


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-63-"हे प्रभु परिवर्तित होके.


हे प्रभू परिवर्तित होके मै जाता हूँ आदर्श की ओर प्रतिदिन,
आशीर्वाद दे, हर्षित हो जाऊं दर्पण में देख अपना प्रतिबिम्ब..(वीरेंद्र)/2-63


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-64-"कर्म ही जीवन है,..



कर्म ही जीवन है, नहीं है मध्य में कोई लकीर,
जीवन होगा सफल कर्म से ही, रखो तुम धीर........(वीरेंद्र)/2-64


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-66-"सौंदर्य के अवगुंठन...


सौंदर्य के अवगुंठन से आकुल होता उसका मन,
प्रेयसी से बारम्बार करता उन्मीलन का निवेदन .......(वीरेंद्र)/2-66
***

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-74-"क्यों आये तुम मेरे दिल...



क्यों आये तुम मेरे दिल का चैन चुराने,
प्रेम की बातें करते हो, ढूँढके नए बहाने,
सपनों की बातें छोड़के दुनियादार बनो,
कबतक बने रहोगे तुम यूँ पागल दीवाने.......वीरेंद्र)/2-74


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-75-"मंजिल है वो ज़बरदस्त.



मंजिल है वो ज़बरदस्त जिसे पाना हो दुष्कर,
पाने को उसे दुःख झेलने पड़ते हैं होंसले रखकर..........(वीरेंद्र)/2-75
***

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-19- "हम बिजली पानी बचाते.

हम बिजली पानी प्रकृति बचाते हैं,
गैस, डीज़ल, और पेट्रोल बचाते हैं,

टाइगर जैसे जीवों को भी बचाते हैं,
बताओ मुझे. बेटी क्यों न बचाते हैं. ...(वीरेंद्र)/२-१९

रचना: वीरेंद्र
सिन्हा ("अजनबी")

2-67- "प्रभात में देखूं प्रसून


प्रभात में देखूं, प्रसून प्रकीर्ण मनोहर लहलहाते,
रात्री को जुगनू जैसे दीप दिखें घर टिम टिमाते,
हर्षित मन कहता उड़कर शिखर पे जाऊं क्षण में,
जब जब दूर से निहारूं पर्वत आकाश से टकराते..(वीरेंद्र)/2-67

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-84- "कुंठित दुर्भावना की..

कुंठित दुर्भावना की विजय से, क्षणिक खुशी मिल जाती है,
तदनंतर हुई आत्म-ग्लानि से किन्तु कीमत चुकाई जाती है,
अंतरात्मा ही है जो रोक लेती है अनिष्ट करने से किसी का,
पर जो नहीं सुनते उसकी उन्हें ये कचोट कचोट कर खाती है...(वीरेंद्र)

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-121- "पल में पहुंचे पर्वत.

पल में पहुंचे पर्वत पर,
पवन पुत्र श्री हनुमान,
पहचान नहीं पाए बूटी,
उठा लाए संपूर्ण चट्टान.....(वीरेन्द्र)

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")


Friday, 26 October 2012

3-42-"दूर जाकर तुमने सुकूँ.

दूर जाकर तुमने सुकून तो बहुत महसूस किया होगा,
हम तो गैर ठहरे, पर तुमने दोस्तों को तो याद किया होगा,

हमने माना कि आसमां में परवाज़ करते हो अब तुम,
पर कभी ज़मीं पर तुमने नीचे भी तो देखा किया होगा.

यूं तो शायर पड़े हैं बड़े बड़े, तुम्हारी पसंदीदा फेहरिस्त में,
पर तन्हाई में, तुमने कोई शेर मेरा भी तो पढ़ा किया होगा.

मैने तो छोड़ दी है शायरी 'उसी दिन' से, सभी जानते हैं,
शायद कहीं से ये हादसा अब तुमने भी तो सुन लिया होगा.

लिखा था जो मैंने, उसका मुस्तहैके-तौकीर मै नहीं, आप हैं,
कहते हैं लोग, भले लिखा मैंने पर मौजू तुम्हीं से तो लिया होगा..........(वीरेंद्र)/3-42

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")


 

Thursday, 25 October 2012

0-128-"अजब पासा दुनिया.

अजब पासा दुनियां में लोगों को यूं पलटते देखा,
दुश्मनों को दोस्त, दोस्तों को दुश्मन बनते देखा,

मगर, मत हो मेरे दिल तू इतना उदास अभी से,
फिरसे पलट जाय पासा कौन जाने किसने देखा..(वीरेंद्र)/0-128

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Tuesday, 23 October 2012

0-042- खौफ खाते हैं अब....

खौफ खाते हैं अब हम उनके मनाने से,
भाग जाते हैं हम, तौबा ऐसे मनाने से,
बाहों में जकड के दम ही घोंट देते हैं वो,
बाज़ आये अब हम ऐसे रूठने मनाने से...(वीरेंद्र)/0-042

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-193- हमारा नसीब भी कितना ..


हमारा नसीब भी कितना गया गुज़रा है,
अक्सर ही सीने में एक दर्द सा उभरा है, 
बसा रखा है जिसे तूने अपनी आँखों में,
हमसे बड़ा खुशनसीब वो तेरा कजरा है...(वीरेंद्र)/0-193



रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-011- दर्द-ऐ-दिल जो मैंने

दर्द-ऐ-दिल जो मैंने अपने शेर में बयाँ कर दिए,
'वाह-वाह करके वो बोले, शेर कुछ सुना सुना सा है..(वीरेंद्र)1-011

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-055- मुझसे खफा होने की इन्तहा..

मुझसे खफा होने की इन्तेहा तो देखे कोई उनकी,
ख्वाब में ना मना लूं उन्हें, इसलिए सोते भी नहीं,
मुझे एक ही सहारा था सपनों में उनसे मिलने का,
डरता हूँ, मुझे वो कर न दें महरूम, उससे भी कहीं....(वीरेंद्र)/0-055

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-313- चुपके से कैसे मेरे दिल...

चुपके से कैसे मेरे दिल में आकर बैठे हैं 'वो',
मुझसे न मिलने की कसम खाए बैठे थे जो..(वीरेंद्र)/1-313

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-257- होंठ गुलाब, आँखें झील....

होंठ गुलाब, आँखें झील, गर्दन सुराही, सभी हुस्न की मुकम्मल तामीर,
शायर को भला, और क्या चाहिए, लिखने को एक खूबसूरत सी तहरीर..(वीरेंद्र)/1-257

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-055- दुश्मनों ये न समझो..

दुश्मनों यह न समझो मुझे बस दोस्ती ही आती है,
दुश्मनी भी कर लेता हूँ मै, दोस्तों को बचाने के लिए...(वीरेंद्र)/1-055

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-012- इज्ज़त जो बढ़ा दी उन्होंने

इज्ज़त जो बढ़ा दी उन्होंने मेरे शेर पर दाद देके,
हम भी समझने लगे, हम अच्छे शायर हो गए...(वीरेंद्र)/1-012.

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-169-"ख्वाबों की ताबीर लिखूं,

ख्वाबों की ताबीर लिखूं, या फिर सावन की घटा लिखूं.
तेरा चेहरा ही बदलता रहता है,  उस पर  मै क्या लिखूं,

करता हूँ दुआ खुदा से मै, तेरा चेहरा अब और ना बदले,
जब तलक मै तुझ पर, एक हसीन गज़ल पूरी ना लिखूं...(वीरेंद्र)/0-169
रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")




Monday, 22 October 2012

1-149-"तुम्हारी आँखों में बसकर


तुम्हारी आँखों में बसकर इतराता क्यों है ये काजल,
हम भी तो तुम्हारे ही दिल में अपना मुकाम रखते हैं...(वीरेंद्र)/1-149

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")





0-186- आँखें तुम्हारी

आँखें तुम्हारी करते थीं वैसे ही घायल,
क्यों लगा लिया तुमने, उनमे काजल,
नैन तुम्हारे लगते थे नीला आसमान, 
घिर आएं इनमे अब काले काले बादल...(वीरेंद्र)/0-186

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-115-" मै भी खुशियों के गीत


मै भी खुशियों के गीत गाता औरों की तरह,
काश, मेरी जिंदगी में इतने "काश" न होते,
वो भी गुनगुनाते मेरे गीतों को चुपके चुपके,
काश मेरे गीत इतने दर्द भरे निराश न होते ...(वीरेंद्र)/0-115

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-53- नागफनी के कांटे.....

नागफनी के कांटे इनके सुरक्षा-कवच हैं,
फूलों को इनके,  मसलने वाले भी पड़े हैं,
दूर से निहारो इन्हें तो कोमल बहुत हैं,
कुचलना चाहो तो,  ये ज़हरीले भी बड़े हैं.....(वीरेंद्र)

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-196-"मासूम दिल तू इतना

मासूम दिल तू इतना आदी ना बन उसका
क्या पता वक्त के साथ वो भी बदल जाय,
रोते-रोते ना कहीं ढूंढे रास्ता खुद्कुशी का,
ज़िन्दगी तन्हाई में ना कहीं निकल जाय..(वीरेंद्र)/0-196

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-26-"तुमसे तुम्हारी तस्वीर...

तुमसे तो तुम्हारी तस्वीर अच्छी है,
तुम तो नाराज़ हो जाती हो मगर,
यह बेचारी बहुत ही शांत  रहती है,
तुम पहलू से झट खिसक लेती हो,
ये फिर भी सीने से चिपकी रहती है,
तुम कभी खुश तो कभी नाराज़ रहो,
परन्तु यह तो बस हँसती रहती है,
प्रेम-वशीभूत मै चुम्बन भी करलूं,
तब  भी बेज़ुबान नहीं भडकती है,
तुमसे तो तुम्हारी तस्वीर अच्छी है......(वीरेंद्र)

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-124-"कंगन चूड़ी तो ठीक है...

कंगन चूड़ी तो ठीक हैं, क्यों मै पहनूं नौलखा हार,
मेरा असली श्रृंगार तो है साजन,और उसका प्यार...(वीरेंद्र)/2-124

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-39-"बस दिल मिलें, कुंडली मिले...

बस दिल मिलें, कुण्डलियाँ मिलें न मिलें,
तुम्हारा प्यार मिले, सामीप्य मिले न मिले,
भावनाएं मिलें, स्पर्श मिले या न मिले,
बस तुम मिलो मुझे, दुनियां मिले न मिले....(वीरेंद्र)/2-39

रचना:वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-125-" बूंदा-बांदी में यह ....


बूंदा-बाँदी में यह ठंडी शाम,
ये रंगीन व दिलकश शाम,
तेरी छतरी के नीचे तेरा साथ,
थामे अपने हाथ में तेरा हाथ,
क्या ये दृश्य जीवन में उतार दूं,
लिए तेरा हाथ, मै उम्र गुज़ार दूं......(वीरेंद्र)/2-125

Sunday, 21 October 2012

1542- मिलकर तुम तीनों ने....

मिलकर तुम तीनों ने सबको दी है, सौगात अनमोल,
आसाँ कर दीं राहें तुमने कंकड, पत्थर और तारकोल,
खुद सहते रहते हो लोगों के प्रहार तुम अपने सर पर,
बढ़ाते हो लोगों में तुम भाई-चारा, प्रेम और मेलजोल.....(वीरेंद्र)

रचना :वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-270-"तुम मिले मुझे तो...

तुम मिले मुझे तो मुहब्बत करनी आ गई,
झक मारते थे हम, शायरी करनी आ गई...(वीरेंद्र)/1-270

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-325- खुदा ने अगर गम दिए....

खुदा ने अगर गम दिए तो मुझे कोई गिला नहीं,
खुशियों का मज़ा ही क्या, अगर गम मिला नहीं..(वीरेंद्र)/1-325

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1618- तस्वीर ही क्या असल चेहरा....

तस्वीर ही क्या, असल चेहरा भी दिल का आइना नहीं होता,
कुछ दिल होते हैं गम-कदा, मगर चेहरा गम-ज़दा नहीं होता.....(वीरन्द्र)

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

 

Saturday, 20 October 2012

0-263-"दर्द तो है पुराना ही....

Friday, 19 October 2012

2-144-तेरा अस्तित्व अभी नहीं देखा..

तेरा अस्तित्व अभी नहीं देखा,
बस इंतज़ार कर रहें हैं,
तू कर रहा प्रतीक्षा नयी दुनियां की,
हम तेरी कर रहें हैं,
सजाकर हम तेरे खिलोने,
अपने खिलोने की राह देख रहे हैं,
कैसा नियम प्रकृति का,
बिन देखे सूरत, हम तुझे प्यार कर रहे हैं.....(वीरेंद्र)

रचना : वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-83-"दिन हो तो सूरज देखूं..

दिन हो तो सूरज देखूं,
रात हो जाय तो चाँद देखूं,
नींद आ जाय तो तेरे ख्वाब देखूं,
किसी भी सूरत में बस तुझे ही देखूं....(वीरेंद्र)/2-83


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी").

 








 

2-261-"कविता कभी कभी लिखी नहीं.

कविता कभी-कभी लिखी नहीं, बन जाती है,
सदा बनती भी नहीं, उत्पन्न भी हो जाती है...(वीरेंद्र)/2-261

रचना:  वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-438-जज़्बात जब दब जाते

 जज़्बात जब दब जाते हैं बिचारे,

न रहते हैं हमारे और ना तुम्हारे,

बेजान हो जाते हैं खामोशियों में, 

अल्फाज़ भी किस्मत के हैं मारे,...(वीरेंद्र)/0-४३८


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Thursday, 18 October 2012

1-069- मै जो तुझे नहीं भूल पाया..

मै जो तुझे नहीं भूल पाया हूँ मेरे दोस्त अभी,


कोई तो कमी रह गई है तेरी नफरतों में अभी./(वीरेंद्र)



(वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")/1-069

0-349- इन पहाड़ों पे.टिमटिमाती

इन पहाड़ों पे टिमटिमाती रौशनियों में,

कौन सी है तेरी रौशनी मै पहचानती हूँ,

जलाके मैंने भी रख दिया अपना दिल,

तू पहचानेगा नहीं इसे मै ये जानती हूँ...(वीरेंद्र)/0-349


रचना: (वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी")

2-31- तुम मत आना इस बारिश...

तुम मत आना इस बारिश में भीगते हुए,
मै ही आती हूँ तुम्हे छतरी में लेने के लिए,
मामूली अँधेरी हवाएं क्या बिगाडेंगी मेरा,
जब मै लड़ सकती हूँ ज़माने से तुम्हारे लिए......(वीरेंद्र)

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-30- जितनी ठोकरें मारूं,....

जितनी ठोकरें मारूं मै, उतना ही पूजा जाऊं मै,
जितना करूं तिरस्कार उतना ही सत्कार पाऊँ मै,
क्या कभी संभव है कि ऐसा अवतार बन जाऊं मै,
नहीं ना? तो क्यों न शैतान से इंसान बन जाऊं मै......(वीरेंद्र)

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-24-यह कितना सुखद होता अगर

यह कितना सुखद होता, अगर मै बालक होता,
मंहगाई से अछूता और चिंताओं से मुक्त होता,
समस्याएँ कोई न होती बस सोचता मस्ती की,
चेहरा होता लालगुलाबी,यूँ न छितापिटा होता,
कन्याएँ मुझे पास बुलातीं, दूर ना भगातीं ऐसे,
मै लगता राजकुमार सा, ऐसे फटेहाल न होता,
आज़ाद पंछी बन दूर आकाश में विचरता रहता,
जीवन की कडवी हकीकतों से यूं रूबरू न होता....(वीरेंद्र)/२-२४

रचना:वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-82- अब तुम चले जाओगे...

अब तुम पल भर में चले जाओगे,
मेरे लिए बस उदासी छोड़ जाओगे,
मेरी यह  मुस्कान साथ ले जाओ,
अपनी निशानी मुझे कोई दे जाओ,
न जाने अबके गए तुम कब आओगे.....(वीरेंद्र)

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

 

2-129-"कोई हैजी रहा ज़िन्दगी .

कोई है जी रहा जिंदगी टुकड़ों में,

कोई है करता ख़ुदकुशी किस्तों में,

किसी का दिल हुआ  टुकड़े-टुकड़े,

वो गिन रहा लौट आये खत के टुकड़े,

गरीब मोहताज हुआ टुकड़े-टुकड़े को,

इंसन, समाज हो चुके  टुकड़े-टुकड़े,

भगवांन टुकड़ों की ये आंधी रोक दो,

एक बार ये सभी टुकड़े तुम जोड़ दो..........(वीरेंद्र)/२-१२९ 


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी") 

2-17- जब प्यार हुआ था तुमसे...

जब प्यार हुआ था मुझसे, तुमने कभी मुझे ये ना बोला था,
भेज भेजके पत्र तुम्हे हारा, पर तुमने एक भी ना खोला था,
ह्रदय-भाव थे अनेक, पर मैंने उन्हें सत्यता पर ना तोला था,
तुम कहो मात्र 'भावुकता', मैंने लिखा जो अंतर्मन बोला था...(वीरेंद्र)/२-१७

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-10- पिकनिक-समापन के दो स्वरुप....

१...

चार दिन की पिकनिक खत्म हुई आज,
आज घर वापस हमें लौटना है,
बाँधो सामान, छूटे ना कुछ भूल से,
चश्मा घडी मोबाईल सब लेलो ध्यान से,
बस होटल का बिल चुका देते हैं,
टिकिट रक्खे? किसके पास हैं?
साथ हैं सभी? कोई रहा तो नहीं?
यात्रा में गीत गाते उल्लाह्स में,
पहुँच गए घर, वाह क्या आराम मिला.

२.

चार दिन का जीवन-प्रवास खत्म हुआ,
आज वापस घर मुझे जाना है,
क्या चश्मा क्या घडी क्या मोबाईल,
सामान सब यहीं छोड जाना है,
जीवन के फ़र्ज़-क़र्ज़ सब चुका दिए,
सिंगल यात्रा है, तुम सबको रुकना है,
मत करो जन-क्रंदन मेरी यात्रा में,
चिर-शांति अब मै पहुँच गया अपने घर में.

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Wednesday, 17 October 2012

2-73- मृतप्राय है वो जो..

मृतप्राय है वो जो माता भक्त नहीं है,
माता के प्यार का सर्वोच्च स्थान है,
इसका निम्न्तल या मध्य्तल नहीं है,
उपेक्षा की जिसने उसका वजूद नहीं है.......(वीरेंद्र)/2-73


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

 

2-65-"अति हर्षित आज्ञापक.

अति हर्षित आज्ञापक मेरा मन,
कहे मुझे बारम्बार ओ आत्यांतिक,
जाने को लोक कल्याण के रण में,
कष्टों से आच्छादित मेघ हटाने.......(वीरेंद्र)2-65


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")
 

2-118- "आज वो लक्ष्मण नहीं..

आज वो लक्ष्मण नहीं हैं, और ना ही वो रेखाएँ,
सभी स्वतंत्र हैं, नहीं प्रतिबन्ध, नहीं हैं सीमाएं,
रावणों का ही राज है, कौन रोकेगा भला उनको,
ना भी लांघें रेखाएं, तो भी कहाँ सुरक्षित सीताएं....(वीरेंद्र)/2-118


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-116-"दो ऋतुओं का मधुर.

दो ऋतुओं का मधुर संगम,
मानो दो दिलों का आलिंगन,
नई कोपलें जैसे नई आशाएं,
बसंत ऋतु का अब है आगम......( वीरेंद्र)/2-116
***

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-120- देश की माटी....

देस में बैठे परदेस अच्छा लगता है,
परदेस जाकर मगर देस भला लगता है,
हवा पानी आकाश सभी हैं परदेस में, पर
देश की माटी में विचित्र सा चुम्बक रहता है.......(वीरेंद्र)

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

 

2-115-:- २६/११ का शहीद "ओम्बले"

नाभि पर लगी थी बन्दूक शहीद के,  घोडा था बस दब जाने को,
मौत सामने खड़ी थी उसके, वक्त नहीं था पलक झपकाने को,
वीर सिपाही "ओम्बले" झपट पड़ा फिरभी आतंकी कसाब पर,
शहीद होते-होते जकड लिया बाजुओं से उसे जिंदा पकडवाने को......(वीरेंद्र)/२-११५ 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-001-"शायरी किसी बहाने से..

शायरी किसी न किसी बहाने से की जाती है,
वरना कलम लेके बैठे रहो स्याही सूख जाती है.(वीरेंद्र)/1-001


रचना:वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Tuesday, 16 October 2012

0-025- जीने की अब और तमन्ना

जीने की अब और तमन्ना नहीं रही हमारी,
ज़ाया ना करो अपनी दुआ, देकर हमें नए साल की,
हमारी दुआ है,  हमें  ना लगे दुआ तुम्हारी,
अभी भी पड़ी है ज़ाया आपकी दुआ पिछले साल की.......(वीरेंद्र)/0-०२५ 


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-107- सत्ता-परिवर्तन....

जो थे ज़रूरी शायद वो गैर-ज़रूरी हो गए हैं,
जो चढ़े हुए थे हाथियों पे,वो चींटीं हो गए है,
जा कर खा रहे थे खाना, जो दलितों के घर,
वो अब अपने-अपने महलों में घुस गए हैं,
अभी तक आदमी को लूट रहीं थीं बहिनजी,
अब इस काम को एक भाई साहब आ गए हैं,
मानसिकता का कोई परिवर्तन नहीं हुआ है,
वही है गुंडा-राज अभी,बस गुंडे बदल गए हैं,
अब 'लोकतंत्र','लोकपाल',और 'लोकायुक्त',
ये लोकप्रिय शब्द अप्रासंगिक से हो गए हैं............(वीरेंद्र)

रचना:वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-34- बाल-मजदूर.

ये तो कल्पना में भी नहीं होता हमें मंज़ूर,
अबोध बालक कभी हो सकता है मजदूर,
व्यवस्था भला क्यों हो गई इतनी मजबूर,
इस कुरीति को न कर सकी अब तक दूर,
भारत देश हमारा है इतना महान,मशहूर,
नन्हों के प्रति फिर क्यों है इतना वो क्रूर,
क्यों सहन कर रहे हैं हम, 'बाल-मजदूर'.......(वीरेंद्र)

रचना: वीरेंद्र सिन्हा("अजनबी")

2-9- शहीद भगतसिंह, राजगुरु, सुखदेव.

हे भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव,
जिसके लिए तुमने प्राण दे दिए,
माता-पिता ने वीर सपूत खो दिए,
वो भारत मुझे अभी मिला नहीं,
तुम्हारे सामने मौत थी फिर भी,
शीश शत्रु के समक्ष झुका नहीं,
पर मै कैसे सिर उठाऊँ, मैंने तो,
तुम्हारा सपना अभी पूरा किया नहीं....(वीरेंद्र)

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")
 

2-127- फेसबुक नशा मुक्ति ...



इश्क का नशा देखा, और देखा मयखाने का भी, 
जान लेवा है कमबख्त यह नशा फेसबुक का भी.
उकता गया हूँ अब तो मै, फेसबुक की दुनियां से,
फेसबुक नशा-मुक्ति केन्द्र जाना होगा मुझे भी.

कोई बताये रचनाओं को मेरी, "दो कौड़ी" की,
कोई दे धमकी मुझे तुरंत  डिलीट कर देने की
कोई जबरन मुझे टैग कर जो चाहे वो पढ़वाए,
कोई रचना ही चुराकर ,अपनी वाल पे ले जाए.

लाईक न करूं तो बोले लाईक भी नहीं करता,
लाईक करूं तो कहे,  कमेन्ट क्यूँ नहीं करता,
कमेन्ट करूं तो एतराज़ के अच्छी नहीं करता,
कभी कहें कमेनट्स,,मै हूँ बिना पढ़े ही करता,

वाह, खूब लिखूं तो पूछें इसके आगे कुछ नहीं आता?
आगे यदि लिखूं तो कहें पोस्ट में पोस्ट मैं हूँ घुसाता,
वाद-विवाद में न शामिल होऊं तो अहंकारी कहलाता,
यदि तर्क-वितर्क करूं तो जिद्दी अड़ियल हूँ कहलाता,

बहस जब बढ़ जाती, ग्रुप छोड़ वो जाता या मै जाता,
भले ही बाद में, मै भी,  और वो भी वापस आ जाता,
कई बार "एड" हुआ हूँ कई बार "अन्फ्रेंड" याद नहीं,
ब्लोक और अनब्लोक  की गिनती नहीं मै रख पाता.

अब नहीं कोई रास्ता सिवा फेसबुक नशा छोड़ने के,
बता दो मुझे १-२ पते 'एफ.बी. नशामुक्ति केन्द्र' के......(वीरेंद्र)

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")
 

Saturday, 13 October 2012

1-036-"अजनबी होते हैं लोग..

अजनबी होते हैं लोग, दोस्ती करने से पहले,
पर ,हम बने हैं अजनबी, दोस्ती करने के बाद....(वीरेंद्र)/1-036

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-128- प्रियतम का आगमन.

इंतज़ार, इंतज़ार, और इंतज़ार,
खत्म हुआ ये ज़ालिम इंतज़ार,
आया प्यारा अक्टूबर आखिरकार,

आ चुका परदेसी का विमान,
अब होंगे पूरे मेरे अरमान,
बनाऊँगी अनगिनत पकवान,

सपना हरेक मेरा साकार होगा,
श्रृंगार होगा, बाहों का हार होगा,
और बस प्यार ही प्यार होगा,

फूल छत पर खिलखिला रहे हैं,
चिरैय्या के बच्चे गा रहे हैं,
शीतल पवन के झोंके आ रहे हैं,

मौन था आँगन, अब बोल उठा,
गुलाब मुर्झाया था, खिल उठा,
उदास था मेरा मन, डोल उठा.........(वीरेंद्र)

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")


 

Friday, 12 October 2012

0-096-"दुश्मन थे जो, दोस्त बन.

दुश्मन थे जो, दोस्त बन गए हैं,
दोस्त थे, वो दुश्मन बन गए हैं,
इंसानियत दफ्न हो चुकी है अब,
दोस्ती के मायने ही बदल गए हैं...(वीरेंद्र)/0-096

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-182-"खुशनसीब हो तुम, तोड़ सकते

खुशनसीब हो तुम, तोड़ सकते हो रिश्तों को बड़ी आसानी से,
उनका सोचो, रिश्तों को जिन्होंने अपनी रूह से लगा रखा है...(वीरेंद्र)1-182

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Thursday, 11 October 2012

2-225-"न तो चली आज पुरवाई

न तो चली आज पुरवाई है,

न तेरी खुशबू इधर आई है,

फिर ये रौशनी कैसी फैली,

क्यूं लौ दीये की उभर आई है ...(वीरेंद्र)/2-225

 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-259-"ना तो उजाला दोस्त है

ना तो उजाला दोस्त है सहर का,
ना पत्ता पनाहगार है शबनम का,
बस एक खुदा ही है जो रखता है,
कुछ देर को जोड़कर साथ उनका...(वीरेंद्र)/0-259

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी)




Wednesday, 10 October 2012

0-200-"जानना चाहो वो करते.

जानना चाहो, वो करते हैं कितना प्यार तुम्हे,
तो बस एक बार उनसे नाराज़ हो कर देख लो,
फिरभी न समझ में आये अगर तुम्हे तो ज़रा,
कुछ वक्त के वास्ते उनसे जुदा हो कर देख लो...(वीरेंद्र)/0-200

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी") 

Tuesday, 9 October 2012

2-48- "बिग बॉस"--.एक हास्य.

मन और सद्गुणों की सुंदरता, वाणी और प्रेम की मधुरता,
जीवन शैली की सरलता, संवेदना और भावना की कोमलता,
समाज और रिश्तों की सफलता, मनुष्यता, मानवता, आदि,

ये सब गुण मेरे बज़ुर्गों ने सिखा दिए थे मुझे बचपन में ही,
पर मै विचलित था कुछ दिन से,"मेरा दिल मांगे मोर" मुझसे,
वो चाहता कुछ और भी, इन 'घिसे-पिटे' गुणों से थोडा हटके.

मगर किससे सीखूं, कैसे  सीखूं ,किससे पूछूं, किसे गुरु बनाऊँ,
ये सवाल थे खड़े, पर 'जहाँ चाह वहां राह,' बस मिल गया गुरु.

अब मै गुरु से लड़ना झगडना और अच्छी-अच्छी गालियाँ सीख रहा हूँ,
अभद्रता की सीमायें खोज रहा हूँ,  अच्छे-अच्छे फिकरे सीख रहा हूँ,
अर्धनग्न और मदमस्त होकर,  निर्लज्जता के श्रेष्ठ गुण सीख रहा हूँ,

अश्लीलता में है मज़ा क्या, वह अब मुझे मालूम हुआ है,
तरक्की का कोई और अंदाज़ भी है, यह ज्ञान अब हुआ है,
धन-दौलत इतनी कि स्वप्न पूरित हों सभी इस तरक्की से,
प्रसिद्धि, मौज-मस्ती-मज़ा सभी तो हैं यहाँ और क्या चाहिए,
ये उपलब्धियां हैं प्राप्त सभी को, चाहे कोई हो चोर, अपराधी.

किसी उत्सुक ने पूछा, कौन है ये गुरु ज़रा हमें भी तो बताओ,
क्या है उसका पता, क्या है शुल्क उसका, ये भी तो बताओ,
मै बोला सब निशुल्क, घर बैठे प्रशिक्षण, टीवी  पे "बिग-बॉस "लगाओ.

रचना:  वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")
 

0-261-"शबनम में छुपा दूँगी.

शबनम में छुपा दूँगी खुद के आंसू,
मुझे सहर होने से पहले ही जाने दे,
उजाले न बन सकेंगे मेरे राजदार,
तू मुझे यूँ ज़माने से ना टकराने दे...(वीरेंद्र)/0-261


राचना: वीरेंद्र सिन्हा "(अजनबी")

Monday, 8 October 2012

0-130- अब कम नहीं होते दर्द......

अब कम नहीं होते दर्द, सुनने या सुनाने से,
हमने जानी है ये नयी बात, बेदर्द ज़माने से,
मतलबी हो गए हैं लोग, खो चुके हैं जज़्बात,
आंकते हैं कीमत इंसान की कौनसे पैमाने से..(वीरेंद्र)/0-130

 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-357-"शरीके-जिंदगी को महज़

शरीके-जिंदगी को महज़ जिस्म समझने वाले,
पाक-रिश्तों का खूं करके शरीके-जुर्म होने वाले,
अपनी सूरत, अपनी सीरत को तो पहचान ले,
न भूल शिकार भी होजाते हैं शिकार करने वाले....(वीरेंद्र)/0-357

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")
.

0-354-"शमा कहे मै जलती..

शमा कहे मै जलती हूँ अपनी जगाह,
परवाने खुद ही आते हैं जल जाने को,
तोहमतें वो लगाते हैं मुझपे बेवजाह,
मै तो जलती हूँ, रौशनी दिखाने को....(वीरेंद्र)/0-354


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Sunday, 7 October 2012

1-102-"उस मुहब्बत को क्या कीजे


उस मुहब्बत को क्या कीजे जिसके लिए ज़िन्दगी न रहे बाकी,
काँटों से क्यों सजाना ज़िन्दगी को, जो चाहतें भी न रहें बाकी...(वीरेंद्र)/1-102


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")


 

1-275-"अपनों के शहर में निकला हूँ.

अपनों के शहर में निकला हूँ मै खुदकशी करने बिना हथियार के,
कि भरोसा है अपनों पर, हो जायगा सर कलम बिना तलवार के..(वीरेंद्र)/1-275

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-293-"'मरीज़-ऐ-इश्क' को ना दवा

'मरीज़-ऐ-इश्क' को ना दवा दी, ना दुवा दी 'उन्होंने',
हमपर एक नज़र डालके कह दिया यही है दवा इसकी...(वीरेंद्र)1-293

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-095- वक्त जब हंसेगा..

वक्त जब हंसेगा मुझ पर, तो हंस ले,
आज हँसने का वक्त तो, बस मेरा है,
कोई समझे गलत मुझे तो समझ ले,
फैसला करने का हक तो, बस मेरा है..(वीरेंद्र)/0-095

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-136-"मेरा नसीब उठकर चला

मेरा नसीब उठकर चला गया मेरे करीब से,
पकड़ लेता मै उसे, गर उसका कोई दामन होता .(वीरेंद्र)/1-136

रचना: वीरेंद्र सिन्हा("अजनबी")

1-170- उसके दिल से पूछिए


उसके दिल से पूछिए जिसके नसीब में प्यार न हो,
वो क्या इन्तजारे-यार करे जिसके हिस्से में बहार न हो...(वीरेंद्र)/1-170

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

 


Saturday, 6 October 2012

1-131-"हंस-हंस के हारा है

1-086-लोग पूछते हैं क्यों आया


लोग पूछते हैं ,क्यों आया हूँ मै मरने मयखाने में,
उन्हें क्या मालूम, मरने के बाद ही आया हूँ मै यहाँ..(वीरेंद्र)/1-086

रचनाकार: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Friday, 5 October 2012

0-313- खिज़ाओं से मेरी दोस्ती

खिज़ाओं से मेरी दोस्ती, ज़रा लम्बी रही,
इसीलिए बहार मुझसे कभी खुश ना रही,
जब किस्मत में ही न हो साथ किसी का,
तो क्या फर्क,बहार भी वही खिज़ा भी वही..(वीरेंद्र)/0-313

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-116- अपने दर्द ज़माने से छुपाए

अपने दर्द ज़माने से छुपाये, मै घूमता रहा,
गम भुलाने को माकूल सी जगह ढूंढता रहा,
दीखती रही खुशी मेरे जिस चेहरे पर तुम्हे,
वो था मुखौटा, जिसे ओढ़के मै घूमता रहा...(वीरेंद्र)/0-116

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-183- ख्वाबों ख्यालों में बहुत...

ख़्वाबों ख्यालों में बहुत रह लिए हम,
आओ छोड़ दें तन्हाइयों को प्रिये हम,
यादों के घेरे से अब हम निकल आएं,
पहना दें एकदूजे को हार बाँहों के हम...(वीरेंद्र)/0-183

 रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Thursday, 4 October 2012

1-067-"नहीं रास आती मेरी दोस्ती....

नहीं रास आती तुझे मेरी दोस्ती, तो ले मै तुझे भूल गया,
तू है अपनी बात पर कायम, तो तू भी मुझे भूलकर दिखा...(वीरेंद्र)/1-067

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")


Monday, 1 October 2012

1-258-"आपको मालूम है सरे-आम.

आपको मालूम है सरे-आम घूम रहें हैं लुटेरे शहर में,
ये हुस्न की दौलत यूँ ना लेके खुले आम घूमा कीजे..(वीरेंद्र)/1-258

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-134-"कौन कहता है पत्थर बस.

कौन कहता है पत्थर बस पत्थर-दिल हुआ करते हैं,
रो रो कर निकलता है लावा, जब पत्थर पिंघलते हैं..(वीरेंद्र)/1-134

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-083-"तेरे इश्क के सिवा


तेरे इश्क के सिवा मेरा कभी न था किसी और नशे से वास्ता,

तेरी बेवफाई ने बेवफा, दिखा दिया मुझको मैखाने का रास्ता...(वीरेंद्र)/1-083


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")