Sunday, 30 September 2012

0-417-"खुद होकर बेवफा, मेरी

खुद होकर बेवफा, मेरी वफ़ा का इम्तिहान न ले,
मैंने नहीं किये हैं जो जुर्म, उनका इंतकाम न ले.
तेरी जफ़ाओं के राज़ मैंने ज़माने से छुपा रखें है,
मुंह से अपने, वफादारी का नाम सरे आम न ले...(वीरेंद्र)/0-417


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी") 


0-403 ढल ही जायेगी ये शाम....

ढल ही जायेगी ये शाम भी, ढलते-ढलते,
संभल जाऊँगा मै भी, सँभलते-सँभलते,
ज़ख्मे-जुदाई अभी ज़रा, ताज़ा-ताज़ा है,
यह भी भर जायेगा,वक्त के चलते-चलते..(वीरेंद्र)/0-403

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-019- मेरी शायरी छूट गई यूं


मेरी शायरी छूट गई यूँ तो अब तेरे दीदार के बिना,
पर सदाए-दिल से अब भी निकल जाता कोई शेर है..(वीरेंद्र)/1-019

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-381- वो रहते हैं मसरूफ....

वो रहते हैं मसरूफ कहीं अलहदा ही आज कल,
मरीज़े-इश्क को देखने सुबह और शाम आते हैं,
इलाज-मालजा करने वाले भी हैरान हैं देखकर,
मेरी साँसें और नब्ज़ भी दिन में दो बार आते हैं..(वीरेंद्र)/0-381

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Saturday, 29 September 2012

0166- वक्त न दे साथ तो....

वक्त न दे साथ, सारा जहाँ बेवफा हो जाता है,
यार हो खफा, तो कलम बेवफा बन जाता है,
शायरी होती नहीं, कुछ भी लिखा जाता नहीं,
हर शेर,गज़ल, हर कलाम अधूरा हो जाता है..(वीरेंद्र)/0-166

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-347- शम्मा नहीं जलती किसी को

शम्मा नहीं जलती किसी को जलाने के लिए,
वह तो रौशनी देती है किसी को आने के लिए,
परवाने पास आ कर भूल जाते हैं हदें अपनी,
खो देते हैं अपनी जान शम्मा को पाने के लिए..(वीरेंद्र)/0-347

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")    

0-346- परवाने का दर्दे- मौत

परवाने का दर्दे-मौत तो मुख़्तसर है ,
जल जाता है झटसे चंद ही लम्हों में,
पर शम्मा का दर्द कोई नहीं जानता,
तिलतिल करके मरती है कई घंटों में..(वीरेंद्र)/0-346

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")  

0-380- तमाम-उम्र ना देखा जिनकी

तमाम उम्र ना देखा जिनकी आँख में एक भी आंसू,
रो-रोकर कब्र पर मेरी वो दरियाए-अश्क बहा रहे हैं,
काश, हम ला सकते जिंदगी वापस और कह पाते,
क्यों हो परेशाँ,पोंछ लो आंसू,हम कहाँ मरे जा रहे हैं..(वीरेंद्र)/0-380

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-363- तंग कब्र में घुटन और

तंग कब्र में घुटन और अँधेरा हो रहा है
फिरभी, कोई उसमे सुकून से सो रहा है,
दुनियां है रौशन,हवा दार और कुशादा,
फिरभी इन्सान नींद को लेके रो रहा है..(वीरेंद्र)/0-363

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी)

0-065- जनूने-इश्क मुझ में बढ़ता

जुनून-ऐ-इश्क मुझ में ही बहुत बढ़ता गया,
ज़माने का क्या कसूर, मै तन्हा होता गया,
तन्हाई तो मेरी एकबार मुझे छोड़ भी देती,
पर फनाह होने का शौक हमें ही चढ़ता गया. ...(वीरेंद्र)/0-065


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Friday, 28 September 2012

0-257-"काँटों मुझको मुआफ करदो.

काँटों मुझको मुआफ कर दो,
दिल तुम्हारा मैंने दुखाया था,
छुड़ा लिया था दामन तुम से,
फूलों को गले मैंने लगाया था....(वीरेंद्र)/0-257

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-087- मै सवाल करता हूँ खुद...

मै सवाल करता हूँ खुद ही से,
क्यों जोड़ा तुझे, जज्बातों से,
दिल को क्यूँ ज़हमत दी मैंने,
जब काम चल जाता बातों से..(वीरेंद्र)/0-087

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-316-"सोच पर अपनी मै शर्मिंदा

सोच पर अपनी, मै शर्मिंदा होता रहा,

खुद को तेरा दोस्त  क्यूं समझता रहा,

क्यूं करता रहा बेपनाह मुहब्बत तुझसे,

जफा को भी तेरी, मै वफ़ा समझता रहा ..(वीरेंद्र)/0-316


(वीरेंद्र सिन्हा"अजनबी")

0-041 उसकी बेवफाई से भी गुरेज़ वव ,

बेवफाई से भी गुरेज़ नहीं मुझ को,
गर मुझसे बेवफाई मेरा दोस्त करे,
उसकी वफाएं भी हैं इतनी मुझ पर,
जफ़ाएं जितनी भी चाहे वो रोज़ करे...(वीरेंद्र)/0-41 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-355-"ना घटने का डर ना...

ना घटने का डर, ना लुटने का डर,
न ज़रूरत वारिस की न तालों की,
नींद आती है, सकून की हर रोज,
यही है दौलत बिन दौलत वालों की..(वीरेंद्र)/0-355

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")


Wednesday, 26 September 2012

0-091- मेरी शिकायत करनी है....

मेरी शिकायत करनी है तो 'वक्त 'से करो दोस्तों,
मै बेमुरव्वत नहीं, बस 'वक्त 'के साथ चल रहा हूँ,
वक्त ने छीन लीं मुहब्बतें,उन्सियतें,हम-मिजाजी,
आतिशे-बदलाव से आजिज मै राह बदल रहा हूँ..(वीरेंद्र)/0-091

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-072- तेरे शहर के मौसम में....

तेरे शहर के मौसम में, कहाँ है पहली सी कशिश,
अब क्यों नहीं दीखती गर्मजोशी, और वो तपिश,
ऐसा क्या हो गया, जो मौसम इतने बदल गए हैं,
बेपनाह है तन्हाई और हर तरफ फैली है गर्दिश. ..(वीरेंद्र)/0-072

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Tuesday, 25 September 2012

0-287- मेरे दिल रहे तुम किराये..

मेरे दिल में रहे तुम, किराये का मकाँ समझकर,
खाली करके चलते बने किसी का हाथ पकड़कर,
मुझे भी गरज नहीं, दुनिया में एक तुम ही नहीं.
भूल जाऊंगा तुम्हे बस एक किरायेदार समझकर..(वीरेंद्र)/0-287

 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Monday, 24 September 2012

0-416- जबसे थाम लिया हाथ

जबसे थाम लिया हाथ रकीब का,
चेहरा ही बेवफा का बदल गया,
मुहब्बत पर जो मै लिख रहा था,
अब मौजू ही तहरीर का बदल गया..(वीरेंद्र)/0-416

 रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-105- नहीं कोई मूल्य भावनाओं का..


2-79- "तुम मेरी मंजिल नहीं थे.."



तुम मेरी
मंजिल
नहीं थे
तुम्हारी
खुशियाँ
ही थीं
मेरी
मंजिल.
तुम
मुझे छोड़के
खुश हो
तो मुझे
मिल गई
मेरी
मंजिल.

(*वीरेंद्र*)


 


1-337-"खा लेते हमारी बस एक

खा लेते हमारी बस एक झूंटी कसम,
ज़रुरत क्या थी हमसे बेवफा होने की,..(वीरेंद्र)/1-337


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Sunday, 23 September 2012

0-191-"हमको जितनी है

हमको जितनी है बेतहाशा मुहब्बत तुमसे,
जुल्फों को तुम्हारी उतनी है अदावत हमसे,
रुख पर तुम्हारे मुसलसल पड़ी रहती हैं वो,
दीदार के लिए भी हटती नहीं तुम्हारे रुख से..(वीरेंद्र)0-191

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")  

0-332-"माना दिल है मेरा कटा फटा

माना दिल है मेरा ज़रा कट-फटा, टूटा-फूटा,
मोल भी इसका ज़रा कम है बाजारे-इश्क में,
तुम भी तो लिए फिरते हो हुस्न छिता-पिटा,
क्यूँ दूं दिल अपना तुम्हे औनी-पौनी कीमत में..(वीरेंद्र)0-332

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Saturday, 22 September 2012

1-133-"जज्बाती दिलों का काम.

जज्बाती दिलों का काम नहीं, पत्थरों के शहर में,
संगदिल ही बस तलाश सकतें हैं मुस्तकबिल यहाँ...(वीरेंद्र)/1-133

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")



1-059-"तुम आज नहीं हो मेरे

तुम आज नहीं हो मेरे दोस्त, मगर कल भी कहाँ थे,
मै जब समझता था तुम्हे दोस्त, तब भी तुम कहाँ थे..(वीरेंद्र)/1-059

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Friday, 21 September 2012

1-528- नहीं रोक सकता

नहीं रोक सकता जब चाँद-सूरज का निकलना,

तो मुझे क्या रोकेगा मुहब्बत करने से ये ज़माना..(वीरेंद्र)/1-528


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

 

 

 

0-307-"सच्ची दोस्ती होती है एक.

सच्ची दोस्ती होती है, एक बड़ी दौलत,
रखो इसे दिल की तिजोरी में सम्भालके,
हिफाज़त करो इसकी गलतफहमियों से,
खुदगर्जी उड़ा लेती है, इसे डाका डालके...(वीरेंद्र)/0-307

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-162- "मुझे प्यार था जिस शख्स

मुझे प्यार था जिससे , वक्त ने उसकी सीरत बदल दी,
दुनियां प्यारी थी, पर तन्हाईयों ने मेरी पसंद बदल दी,
दिल के दर्द भरे फसानों सुनाने के लिए अब बचे नहीं,
मैंने शेर गज़ल के अल्फाजों की अब नोय्यत बदल दी...(वीरेंद्र)/0-162

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-434- "उजाड हो गया अब चमन.

उजाड हो गया अब चमन, दूर तलक वीरानी छाई है,
सूनी हैं राहें, मंजिल ने ना मिलने की कसम खाई है,
खुद ही को भूल चुका हूँ मै, तुझको याद करते-करते,
छिन गई है मुझसे खुशी, जबभी भूले से कोई आई है...(वीरेंद्र)/0-434

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")/1-४७७ 

0-163- "बज़्म में बैठे रहते थे

बज़्म में बैठे रहते थे लोग, जिनके बहाने से,
महफिलें हो गईं बेनूर, उनके अब न आने से,
कोई तो मना लाए उन्हें, उजड़ी महफ़िल में,
देखी नहीं रौनक, यहाँ हमने, एक ज़माने से....(वीरेंद्र)/0-163

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-164- "बड़ी गमगीनी में गुज़रे..

बड़ी गमगीनी में गुज़रे  हैं गुजिश्ता कुछ दिन,
तेरी ही कमी खलती रही मुझे, रात और दिन,
ना तो कोई मौजू मिला, ना बनी कोई गज़ल,
वाजे हो गया, तेरे बगैर शायरी है नामुमकिन..(वीरेंद्र)/0-164

रचना: वीरेंद्र सिन्हा("अजनबी")

0-210- "तू सचमुच बहुत लाजवाब है..

तू सचमुच बहुत लाजवाब है,
खुद ही तू बस अपना जवाब है,
तेरी दोस्ती भी लाजवाब थी,
तेरी दुश्मनी भी लाजवाब है...(वीरेंद्र)/0-210

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-069-" बहुत दिनों बाद मौसम..

बहुत दिनों बाद आज मौसम खुला-खुला सा है,
सर्दी तो है मगर, वातावरण भला-भला सा है,
हवाएं भी हैं हल्की-हल्की ज़रूर, पर सुहानी सी,
बर्फ़बारी के बाद, वृक्षों का रूप धुला-धुला सा है..(वीरेंद्र)/0-069

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-253-"जल कर बुझ गए.

जल कर बुझ गए, उमीदों के चिराग,
आसमां से ज़मीं पर, आ गईं हसरतें,
तन्हाईयाँ भी लगने लगीहैं भीड़ अब,
मुहब्बतें भी अब हैं बन गई नफरतें ..(वीरेंद्र)/0-253

रचना: वीरेंद्र सिन्हा("अजनबी")

0-066-बिजली तो चमकी उसके

बिजली तो चमकी उसके शहर में, 
पर उसकी घड़घड़ाहट मेरे घर हुई,
अंगडाई तो उसने ली थी अपने घर 
कड़कड़ाहट मगर मुझमे इधर हुई.(वीरेंद्र)/0-066

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-252- "अंधेरों में भला ऐसा ..

,
अंधेरों में भला ऐसा क्या देखा था हमने,
क्यूँ की ज़िन्दगी अंधेरों के हवाले हमने, 
घिसटती जा  रही थी बेवजह ये जिंदगी,
अंधेरों को इसमें से निकाल फेंका हमने..(वीरेंद्र)/0-252

रचना: वीरेंद्र सिन्हा("अजनबी")

0-068-"कोहरा, और सर्द मौसम,

कोहरा, और सर्द मौसम, टिकता नहीं,
सुहाना बसंत आने से कभी रुकता नहीं,
दुखों के बादल बरस कर छंट जाते हैं,
सुखों का मौसम भी हमेशा रहता नहीं...(वीरेंद्र)/0-068

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-056- "कद्र नहीं होती इंसान की

कद्र नहीं होती इंसान की उसके जीते जी, अक्सर,
पुजती है तस्वीर उसकी, उसके मर जाने के बाद,
ता-उम्र कांटे ही कांटे मिले हों ज़माने से जिसको,
उस पर चढ़ते हैं फूल ही फूल, गुज़र जाने के बाद..(वीरेंद्र)/0-056

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Thursday, 20 September 2012

0-285-"कितने इम्तिहान ले लिए

कितने इम्तिहान ले लिए तूने मेरी वफ़ा के,
ये भी तो बता दे, कितने अभी और हैं बाकी,
मेरी मुहब्बतों को झूंट बता देने वाले, बता
मुझपर कितने इलज़ाम अभी और हैं बाकी...(वीरेंद्र)/0-285 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-404- "आज की शाम फिर..

आज की शाम फिर से उदास है,
जिद्दी दिल लगाके बैठा आस है,
सूनसान है ये घर, पर फिर भी,
उसका दिया ये दर्द मेरे पास है....(वीरेंद्र)/0-404

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-532- "अब नहीं रहा कोई अरमां .

अब न रहा कोई अरमां नआरजू दिल में,
पाल रक्खे थे जो मुगाल्ते वो दूर हो गए..(वीरेंद्र)/1-532

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-109 "जबसे तू नाराज़ हुई है..

जब से तू मुझसे नाराज़ हुई है,
मेरे शहर की अजीब दशा हुई है
तेरी गुडनाईट,गुडमोर्निंग बिना,
ना सुबह हुई है, ना शाम हुई है,
दिल को समझाते मै थक गया,
दरोदीवारों से कितना झूंट बोलूँ,
कि, तू ज़रा यहीं कहीं पे गई है,
जाने दे, अब माफ कर दे, मुझे,
फेसबुक अब छोड़ दूंगा तुरंत मै,
मेरी भी अक्ल ठिकाने आगई है,.....(वीरेंद्र)

रचना : वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-377-"दुनिया हो जाय नाराज़ .

दुनिया होजाए नाराज़ उनसे, उन्हें फर्क पड़ता नहीं,
हम होजांयें खफा उनसे, तो यह हक़ हमें होता नहीं,
हम तो मान जाते हैं फ़ौरन ही उनके ज़रा मनाने पे,
गर हम मनाएं तो, और बिगड़ने में वक्त लगता नहीं...(वीरेंद्र)/0-377

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-378- "फ़र्ज़ हमारा है रूठे को ..

फ़र्ज़ हमारा है, रूठे को मनाने का, उनका नहीं,
गल्ती जो भी करे कसूर हमारा है, उनका नहीं,
बड़े सयाने हैं वो, जानते हैं अंजाम लड़ाई का,
आखीर में होता नुक्सान हमारा है, उनका नहीं..(वीरेंद्र)/0-378

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")
 

2-237- "करोड़ों से अच्छी मिली.

करोड़ों से अच्छी मिली जिंदगी हमें,
हमने भी अच्छी ही तरह गुज़ार दी,
नैमत है बहुत उस खुदा की हम पर,
उसने दिए दो गम तो खुशियाँ चार दीं,
जीतीं हमने बेशुमार बाजियां जहां में,
गम नहीं, अगर हमने एक-दो हार दीं,
फ़र्ज़ पूरा समझेंगें हम इंसानियत का,
गर जिंदगी हमने किसी की संवार दी...(वीरेंद्र)/2-२३७ 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-238 - "मेंहदी रचे हाथों से जब

मेंहदी रचे हाथों से तुम जब,
डाल रहीं थीं मुख पे आँचल,
चूडियाँ ऊपर से नीचे खनकी,
और ढांप ली तुमने चितवन,
बिंदिया छिपी, छिप गए नैन,
होंठ चुप,पायल बोली छनछन....(वीरेंद्र)

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

3-54- "आती है अक्ल इंसान को,चोट

आती है अक्ल इंसान को, चोट खाने के बाद,
दुखती है चोट, कुछ वक्त गुज़र जाने के बाद,



लाख बयाँ करते फिरें तकलीफ हम अपनी,
दीखेगा दर्द ज़माने को, आंसू बह जाने के बाद,



जिंदगी से शिकवा करता फिरता है हर कोई,
पता चलती है उसकी कीमत, गुज़र जाने के बाद,


मुहब्ब्हत के नशे में लगती है दुनियां हसीन,
पर अक्सर रुलाती है ये, नशा उतर जाने के बाद,


रोते हैं सभी कुछ न कुछ खोकर यहाँ, मगर
फिर भी कोई रोता है यहाँ कुछ पा जाने के बाद,

अश्क बह जाते थे, ज़रा जुदा हो जाने से जिसके,

बदहवास हँसता है दिल, उसके बेवफा हो जाने के बाद......(वीरेंद्र)/३-५४ 


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")



Wednesday, 19 September 2012

2-41- मुझसे ज्यादा तो मेरा कंप्यूटर.....

मुझसे ज्यादा तो मेरे कंप्यूटर को,
हर वक्त उनका इंतज़ार रहता है,
खोलना चाहता हूँ ईमेल किसी का,
ये कमीना 'उनका' ही ओपन करता है,
इसकी मेमोरी कहने को तो कम है,
पर उनका सब डेटा ये याद रखता है,
यही हाल है कमीने की स्पीड का भी,
'शेरोशायरी' में रो रोके  स्लो चलता है,
पर उनकी आईडी लोग-इन करते ही,
पागलों जैसी स्पीड ये पकड़ लेता है,
बाकी के लिए बैटरी  एग्जास्ट बताये,
उनके लिए फुल्ली-चार्ज्ड बताता है,
कोई है क्या अच्छा सा मेकेनिक मित्रों,
जो ऐसे कमीने का इलाज जानता है..............(वीरेंद्र)

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-76- गुरु और गूगल दोउन..

गुरु और गूगल दोउन खड़े, काके लागूं मै पाय,
बलिहारी गूगल की जिसने सबकुछ दियो बताय,
ज्ञान प्राप्त करूं अगर गुरु से, तो छूवन लागें पाँव,
बलिहारी गूगल की, केवल थेंक्स से काम चल जाय,
गुरु कोरा ज्ञान दे और घडी-घडी परीक्षा लेता ही जाय,
बलिहारी गूगल की ज्ञान संग मनोरंजन भी दे करवाय,
गुरु करे प्रताड़ित जो कभी, हमसे गलती कोई हो जाय,
बलिहारी गूगलवा की त्रुटि पे 'एरर' बताके चुप हो जाय,
गुरु सिखावे अपनी मर्ज़ी से जो भी विषय खुदको है भाय,
बलिहारी गूगल की हमें वही सिखाय-दिखाय जो हमें भाय,

गुरु और गूगल दोउन खड़े, काके लागूं पाय,
मित्रों तनिक तुम भी सोचके दियो हमें बताय........(वीरेंद्र)

रचना: वीरेंद्र सिन्हा  ("अजनबी")

2-33- रूठे थे हम उनसे, अब..

रूठे थे हम उनसे, अब उल्टा वो रूठ गए हैं,
ने देते हैं, न लेते हैं खबर, बस चुप बैठे हैं,
संपर्क के सब साधन निरर्थक से हो गए हैं,
न जाने क्यों कहते हैं दुनिया है बहुत छोटी,
दूर दूर के लोग बहुत नज़दीक आ गए हैं,
हमें तो कुछ ऐसा दीखता नहीं, सच बताएं,
पास हो कर भी लोग बहुत दूर हो गए हैं,
संपर्क साधनों का इस्तेमाल कौन क्यूँ करे,
जब प्यार मुहब्बत के मायने बदल गए हैं,
विज्ञानी-तरक्की का क्या फायदा मिला हमें,
ले लो वापस, इससे तो हम तंग आ गए हैं..........(वीरेंद्र)

रचना:  वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-43- सपने अंततः सपने.

'सपने ' अंततः सपने ही थे,
बिखरना था उन्हें बिखर गए,
वो कहाँ सिर्फ मेरे अपने थे,
सपनों को क्यों सजाऊँ मै,
उनका स्वभाव तो है,
बस बिखर जाने का,
कभी पल में कभी देर से,
न होता यदि ऐसा तो,
कौन कहता उन्हें सपने,
उनकी कोई आकृति नहीं,
उनका कोई चेहरा नहीं,
यदि होता कहीं ऐसा तो,
हर सपना, हर सुबह,
बस बदला दिखाई देता..........(वीरेंद्र)

रचना : वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")
 

2-78- "तुम न स्वीकारो किन्तु,..

तुम न स्वीकारो किन्तु,
मेरा प्रेम बहुत ऊंचा है,
यह नहीं है आकर्षण,
और नहीं है कोई रिश्ता,
यह आदर्श व सच्चा है,
परन्तु व्यथाएँ है अनेक,
सुनाकर व्यथित न करूंगा,
अपेक्षाएं रखकर कभी मै,
स्वार्थी आकांक्षी न बनूँगा,
हे मेरे भाग्य-विधाता,
हे प्रभु, मेरे पालनहार,
बस दे दे आशीर्वाद मुझे,
तेरी ही पूजा अर्चना में,
दूं अपना जीवन मै गुज़ार। .....(वीरेंद्र)
 
रचना: वीरेंद्र सिन्हा  ("अजनबी")

Tuesday, 18 September 2012

0-286-"चाहा था तुम्हे, और कुछ


चाहा था तुम्हे, और कुछ ना चाहा था मैंने,

दिये जला दिए,  अँधेरा भगा दिया था मैंने,

बाँधकर भावनाओं का बाँध अपने बीच में,

न्योता कई बार तुम्हे भिजवा दिया था मैंने...(वीरेंद्र)/0-286


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-181- "आरजू है एक बार देखूं

आरज़ू है एक बार फिर से देखूं वही चेहरा,
के कैसा लगता था वो बेवफा होने से पहले..(वीरेंद्र)/1-181

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-335- "बेवफाई करनी थी हमसे तो.


हमने माना, आप मुतास्सिर हैं बहुत रकीबों के अंदाज़ से,

पर इतनी भी बेताबी क्या है उनसे जाकर मिल जाने की,..(वीरेंद्र)/1-335


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")


0-122-"मुहब्बतों का ना सहीं

मुहब्बतों का ना सही, नफरतों का ही सही,
कुछ तो तुमने वास्ता हमसे रक्खा ऐ दोस्त,
हम ना बदले थे कभी, ना ही बदलेंगे कभी,
तुम्हीं ने बदला है नजरिया अपना ऐ दोस्त....(वीरेंद्र)/0-122

रचना :  वीरेंद्र सिन्हा  ("अजनबी")

Monday, 17 September 2012

3-36- "भावनाएँ ही न हों जिस..

जी भरके तुम किसी को प्यार कर लोगे,

जिंदगी अपनी उसके नाम तुम कर दोगे

तोडके ले आओगे चाँद सितारे आसमा से,

खुशियाँ तमाम, उसके दामन में भर दोगे,

मगर भावनाएँ ही ना हों जिस संगदिल में,

ऐसे इंसान का,  भला तुम क्या कर लोगे......(वीरेंद्र)



रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")
 


Sunday, 16 September 2012

2-35- "हैराँ हूँ देखकर तेरा..

हैराँ हूँ देख कर तेरा इन्साफ ऐ खुदा,

खुश रहते हैं वही, जो दे देते हैं दगा,

मुहब्बत में हो जाते हैं कुछ तो फना,

सुकून में हैं वही जो होजाते हैं बेवफा,

ज़माना बदला है तेज़ी से इस कदर,

हो नहीं सकता कि, तुझे न हो पता,

मुझे तो गुमा होने लगा है यहाँ तक,

इंसानियत की रही न तुझे भी परवाह,

अब शायद, तू भी बदल गया है खुदा.........(वीरेंद्र)


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Saturday, 15 September 2012

2-106- "अपने प्रेम और भावों.

अपने प्रेम और भावों के दीपक की ज्योति से,


बुझ रहे चिरागों की लौ को मैंने सदा उभारा है,


 मात्र इस कारण, कोई विजयी हो सके मुझसे,


 मैंने हर बाज़ी को छोड़ा है, हर दांव बस हारा है,


 बनके रह गया याचक, बाँट-बाँट कर सभी मै,


 मुस्कुराहटें हो गईं बोझ, दर्द ही अब प्यारा है. .......(वीरेंद्र)



रचना:  वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")


Friday, 14 September 2012

2-5- एक लैटर-बाक्स की..



जड़ हूँ, एक निर्दिष्ट स्थान पे जड़ा हूँ,
धूप हो, पानी हो, पर मै वहीँ खड़ा हूँ.

आमोदारफ्त है बहुत इर्द गिर्द मेरे,
चहल-पहल, गहमा-गहमी है चोबारे में,
फिर भी इनके बीच मै निर्जीव पड़ा हूँ.


लोग रंजोगम,खुशियाँ,निमंत्रण सौंप जाते हैं मुझे,
अक्षम हूँ, सांत्वना बधाई दे नहीं पाता, क्योंकि,
मुंह पर मेरे भी एक ताला बड़ा सा जड़ा पड़ा है.

मेरा खुद का वजूद नहीं है कोई,
मै हूँ रहमोकरम पर औरों  के,
द्रष्टिहीन,मूक,बधिर बनके बस मै खड़ा हूँ.

मेरी हालत हो कुछ भी, मुझे तसल्ली है,
मानव-सेवा में मै फिर भी नतमस्तक खड़ा हूँ..... .... ...(वीरेंद्र)
 
रचना: वीरेंद्र सिन्हा  ("अजनबी")


2-44- मेरा हुक्का.....

हर वक्त का साथी है मेरा हुक्का,
मुझे सुकून और ताजगी देता है,
मेरी ठिठुरन को आंच देता हुक्का,
हर कश में मुझे आवाज़ देता है,
गुड़-गुड़ से संगीत निकाले हुक्का,
उम्र -दराजी में मुझे प्यार देता है,
मेरी तन्हाई दूर करता मेरा हुक्का,
अपने छोड़े, पर साथ देता है हुक्का.



रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी:)


3-69- "हमारे मिलने की जगह


हमारे मिलने की जगह को बेज़ार न हो जाने दे,


इस सुनहरी शाम को यूंही बेकार न हो जाने दे,

ये मंज़र ये खुशबुएँ ये नज़ारे, सब रहेंगे गवाह,

ख़ामोशी से इन्हें तू यूंही रुखसत न हो जाने दे,


कितने ही ख्वाब देखे पर हकीकत न बन पाए,

आज बस एक लम्हा ख्वाब का पूरा हो जाने दे,

आओ एक दूजे की बाहों में सिमट जाएँ, यहाँ,

दुनियां को खबर होती है, तो आज हो जाने दे.




रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")










रचना :वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

 

2-110-"बड़े अंतराल के बाद,

बड़े अंतराल के बाद आज एक सुन्दर सुबह देखी,
कोई बुरा सपना न देखा, बड़े चैन की नींद देखी,
प्यारी माँ की छवि देखी जैसे कह रही हो मुझसे,
बेटे छोड़ देना सबकुछ मगर मत छोड़ देना नेकी,
कहकर यह न जाने वो कहाँ अंतर्ध्यान हो गई,
मेरे अशांत अहंकारी मन को बहुत निर्मल कर गई,
मैंने अनुभव किया परिवर्तन आज मुझे वो दे गई,
मैंने ऐसी शांत मन-स्थिति अपनी कभी न देखी थी,
संकल्प ले लिया, भूल गया वैमनस्य, अहम् सभी,
आज की सुबह इतनी सुखद, नहीं सोचा था कभी,
वो माँ नहीं देवी होगी, मैंने माँ को देखा नहीं कभी......(वीरेंद्र)/2-110

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-60- "प्रकृति तूने ये भेदभाव क्यों किये

प्रकृति तू हमसे भला क्या चाहे,
क्या हम यूं ही दोषी बनके जिएं,
तूने क्यों रखे अंतर, इंसानों में,
नित होते हैं वाद व युद्ध उनमे,

दिल दिमाग की रचना रखी एक,
फिर भाव-स्वभाव भिन्न क्यों रखे,
नाक,कान,आँख एकसे बनाये सबके,
पर अलग ही चेहरे दिखाए सबके .

खून का रंग सबका लाल बनाया,
फिर चेहरे गोरे काले लाल पीले क्यूँ,
एक ही धरा पर उत्पन्न किया हमें,
तो कोई शांत, और कोई क्रोधी क्यूँ.

कोई बनाया मीठा तो कोई कड़वा क्यूँ,
किसी को कोमल,किसीको पाषाण क्यूँ,
क्या जाता तेरा, जो ये भेद न करती तू,
हम रहते प्रेम से, अशांत ना रहती तू.. . . . . . .(वीरेंद्र)

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")


 

0-274-"कैसा शिकवा-शिकायत मलाल

कैसा शिकवा-शिकायत मलाल, कैसा गम,
उसकी मर्ज़ी के आगे कुछ भी तो नहीं हम,
तकसीम करने वाला भी है जब वही खुदा,
तो क्या फर्क, मुहब्बत मिले ज्यादा या कम. ..(वीरेंद्र)/0-274

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-090-"देख कर अपनों को अब

देख कर अपनों को अब तो ये यकीन होता है,
प्यार-वफ़ा दिल का वहम एक हसींन होता है,
बदलती दुनियां में, अब बदल गए हैं मायने,
मुहब्बत में अब वफ़ा जुर्म एक संगीन होता है..(वीरेंद्र)/0-090

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Wednesday, 12 September 2012

1-576-मेरा हर शेर लफ्ज़-ब-लफ्ज़

मेरा हर शेर लफ्ज़-ब-लफ्ज़ उसने दिल से पढ़ा है,
क्या हुआ जो उसने एक लफ्ज़ न दाद में कहा है..(वीरेंद्र)/1-576


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")






0-085-"हसरत ही रह गई एकबार


हसरत ही रह गई एक बार वक्त बदले,
ज़िन्दगी थक गई पर हाल नहीं बदले,
वक्त तो फिरभी बदल रहा है नसीब से, 
मगर खुद नसीब आज तक नहीं बदले...(वीरेंद्र)/0-085

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-197-"भोले हो अपनी तस्वीर

भोले हो, अपनी तस्वीर सबको दिखा देते हो,
अंखियों में छुपे राज़, ज़माने को बता देते हो,
जिन आँखों से क़त्ल कर दिया आपने हमारा,
वह आला-ऐ-क़त्ल क्यों सबको दिखा देते हो...(वीरेंद्र)/0-197

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-356-"इश्क वाले भी कातिल




इश्क वाले भी कातिल हुआ करते हैं,
क़त्ल आँखों से वो भी किया करते हैं,
कर देते हैं मुहब्बत का खून भी खुद,
और इल्ज़ाम दुनिया को दिया करते हैं...(वीरेंद्र)/0-356

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Tuesday, 11 September 2012

2-54- प्यार नफरत में बदल..

प्यार नफरत में बदल सकता है,
नफरत बदल जाती है प्यार में,
असंभव कुछ भी नहीं,

दोस्त दुश्मन बन सकते हैं,
दुश्मन बन जाते हैं दोस्त,
असंभव कुछ भी नहीं,

मंजिल पाने को चलना पड़ता है,
पास भी आ जाती है मंजिल हमारे,
असंभव कुछ भी नहीं,

नसीब तो लिखता है खुदा मगर,
मेहनतकश भी इसे लिख लेते हैं,
असंभव कुछ भी नहीं,

रिश्ते खत्म हो भी सकते हैं यहाँ,
और फिर जुड भी जाते हैं, यहाँ,
असंभव कुछ भी नहीं,

वक्त के लिए ठहर सकते हैं हम,
वक्त हमारे लिए ठहर जाए,
ये  मगर संभव नहीं.............................(वीरेंद्र)

रचना:  वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

 

2-50- , ज़हर, और ज़हर....

पर्यावरण में ज़हर घुल गया ,
सब्जी फल में ज़हर घुस गया,
तंत्र-राजतंत्र में ज़हर भर गया,
ज़हर जात-पात का सर्वत्र फैल गया,

ज़हर भ्रष्टाचार का संक्रमित हो रहा है,
किसान आये दिन ज़हर पी रहा है,
अबला भी हर रोज ज़हर पी रही है,
नशाखोर भी अब ज़हर पी रहा है,

कुछ पी रहें हैं ज़हर खुशी से अपनी,
कुछ को तो मगर पीना पड़ रहा है,
कब खाली होंगी ये ज़हर की हांडियां,
कब रुकेगी देश में ज़हर की आंधियां.

चारों तरफ ज़हर,ज़हर, और ज़हर,
कब बंद होगा ज़हर का कहर.???.............(वीरेंद्र)

रचना: वीरेंद्र सिन्हा  ("अजनबी")


 

2-15- "जिसका बीत गया उसे..

जिसका बीत गया, उसे अपना बचपन याद आ रहा है,
जिसका नहीं बीता, उसका बचपन यूँहीं रीता जा रहा है,
बीते हुए को लोग धन-दौलत देकर भी वापस मांग रहें हैं,
आज का बचपन, बचपन नहीं लगता, बच्चे उसे ढूंढ रहे हैं,
बड़े होकर शायद वो न मांगेंगे अपना बचपन वापस कभी,
वो तो अभी भूख-प्यास, आसरा, जैसे प्रश्नों से जूझ रहें हैं.........(वीरेंद्र)

रचना: वीरेंद्र सिन्हा  ("अजनबी")

2-46- "तुम थक क्यों गए,....

तुम थक क्यों गए बोलो, थामे-थामे हाथ,
अभी तो बहुत दूर जाना था हमें साथ-साथ,
थोडा साहस, थोड़ी ऊर्जा और थोडा सा धैर्य,
रखते हम तो, अब दूर न था सुखों का प्रभात.......(वीरेंद्र)

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-36- "लगता है आकाश मुझको.

लगता है आकाश मुझको काला,ये नीला नहीं है,
ये वृक्ष लगते हैं झाड-झंकाड़, ये हरियाली नहीं है,
तालाब सूखा लगता है, ये मानसरोवर तो नहीं है,
आसमांन में जो लटका है टुकड़ा, वो चाँद नहीं है,
सूनी-सूनी इमारतें हैं, पर घर-आशियाना नहीं है,
जब तक तुम न आ जाओ यहाँ, ये स्वर्ग नहीं है,
दुनिया के लिए होगा स्वर्ग, मेरे लिए तो नहीं है.......(वीरेंद्र)

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-14- "कुछ आंसू खुशियाँ दे.

कुछ लोग बनके खुशियाँ, आँखों में आंसू भर जाते हैं,
कुछ आंसू राहत देते हैं,  तो कुछ आहत कर जाते हैं,
सबको सब नहीं मिलता, कुछ को कुछ नहीं मिलता,
किनारा मिलना तो दूर है, लोग किनारा कर जाते हैं......(वीरेंद्र)/२-१४

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Monday, 10 September 2012

2-104- "तुम दोस्त मेरे क्यों करूं.

तुम दोस्त मेरे क्यों करूं तुम्हारा मूल्यांकन,
क्यों देखूं मै नफ़ा नुक्सान दोस्ती में तुमसे,
तुम्हारी भावना तुम्हारा अपनापन मेरे लाभ,
तुम्हारा दर्द तुम्हारा बिछोह मेरी अपार हानि,
कोई क्षतिपूर्ति नहीं संभव तुम्हारी मेरे लिए,
तुम्हारी रिक्तता संभव नहीं कभी पूरी होनी.

रचना:  वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-640- "मैंने तो खोया ही था..

मैंने तो खोया ही था तुम्हे,
अब तुमने भी मुझे खो दिया,
दूर रहे क्यों तुम इतना मुझसे,
तुम बिन मैंने जीना सीख लिया.

रचना:  वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-68- "भावनाओं को अपनी व्यर्थ


भावनाओं को अपनी व्यर्थ करता चला गया,
क्यों न बदल सका मै अपने इस स्वभाव को,
आत्मघात से किसने कभी किसीको बचाया?
क्यों न रोका मैंने संवेदना के तेज़ बहाव को?..(वीरेंद्र)/२-६८


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")
 

2-59- "मै भी सोचता हूँ कुछ..

मै भी सोचता हूँ कुछ अच्छा लिखूं,
किसी के मर्म को नींद से जगा दूं,
पा लूं उसकी प्रशंसा का प्रसाद मै, 
पर ये संभव कहाँ ऐसा भाग्य कहाँ.

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-57- "मुझमे नहीं वो प्रतिभा.....

मुझमे नहीं वो प्रतिभा जिससे तुम्हारे ह्रदय में,
मै अपनी भावना और उपस्थिति दर्ज करा दूं ,
जब-जब दूं दस्तक मै, तुम्हारे ह्रदय-पटल पर,
पा जाऊं एक झकझोरता आश्चर्य, कैसे भुला दूं.

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-32-"और कब तक रहेंगे दूर.

और कब तक रहेंगे दूर दूर हम दोनों,
तुम आ जाओ यहाँ, या मुझे बुला लो,
यूं कटे जिंदगी का नशीला सफर अब,
मै तुम्हे सम्भालूँ और तुम मुझे संभालो.

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-13- "हमने चाहा हालात को..

हमने चाहा बहुत  हालात को बदलना,
मगर हालात ने हमें  ही बदल दिया,
आंसुओं को तो समझा बुझाके हमने रोक दिया,
मगर ना समझा सके, ज़रा भी अपने आप को,
प्यार में स्थिर रहे झील के पानी की तराह,
दरिया होते तो दूर निकल जाते तुम्हारी तराह.

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-8- "ये भी वो भी, सभी..

ये भी, वो भी
सभी आस पास,
किन्तु मै उदास,

कुछ तो है,
जो नहीं है,
मेरे पास,

सोचूँ बहुत,
पूछूं सबसे,
मिला न उत्तर,

किन्तु एक स्वर,
आया अंतर्मन से,
"तू ही नहीं था-
तेरे साथ". . . . . . .(वीरेंद्र)

रचना : वीरेंद्र सिन्हा  ("अजनबी")



 

Sunday, 9 September 2012

1-333- "दूसरों के जो काम आ

2-7- देखो मैंने अपनी प्रतिभा को..

सुमुखी तुम मौन रहीं सदैव ही, किंचित दूर-दूर ही,
गंभीर संकोची तुम्हारी मुद्रा,उड़ाती रही मेरी निद्रा,
सरल तुम्हारा श्रृंगार, मादकता बिखराता अपार,

लाज में सिमटा यौवन, सलज सिहरी चितवन,
मिलन को आतुर, प्रयत्न मेरे, सब रहे विफल,
आशा मिलन की रही, मात्र सम्भावना हर पल,

देखे तुम्हारे स्वप्न अनेक, मिलतीं तो पूछता प्रश्न  बस एक,
मै याचक प्रेम का तुम्हारे, पाऊंगा क्या मै प्रतिसाद ?
पर कैसे मिलता उत्तर, तुम्हारी भाषा तो मौन ही ठहरीं ?

तुम्हारे मौन की भाषा का अनुवाद किया मैंने,
मौन-संकेत थे कठिन कुछ,  इसके लिए मैंने-

मन के शब्द-कोष से थोडा काम लिया ,
अंतर्मन से पर्यायी पूछे, समानार्थी खोजे,

कुछ नयनों की, कुछ अधरों की समीकरण से,
कुछ मन की भाषा से, कुछ तन की भाषा से,

मैंने समझ ली सहज ही, तुम्हारे मौन की भाषा,
जिसमे वाक्य छोटा था, शब्द बड़ा था "समर्पण",

देखो आज मैंने अपनी प्रतिभा को पहचान लिया,
ह्रदय में छिपे तुम्हारे प्रेम-भाव को कैसे जान लिया...........(वीरेंद्र)

रचना: वीरेंद्र सिन्हा  ("अजनबी")  २२.११.२०११.

2-4- "खामोश पहाड़ी पर गिरती..

खामोश पहाड़ी पर गिरती बर्फ,
कोहरे का नज़ारा, ख़ामोशी का आलम,

वहां बस हम, तीसरा कोई नहीं,
पर दोनों खामोश क्यों है ?

क्या कोहरे से ढके पत्थर हैं,
नहीं, तो बोलते क्यों नहीं ?

कुछ भी नहीं कहने को ?
कुछ भी नहीं सुनने को ?

धड़कने हमारे दिल की एक,
मंजिलें भी हमारी हैं एक,

फिर प्रश्न व उत्तर कहाँ गए,
अब संवाद क्यों नहीं एक ?

शायद अहम् है जड़ में,
या खड़ा है कोई मतभेद ?

चलो पूछते हैं स्वयं से,
हाँ सही है, कारण यही है,

हम ग्रसित हैं अहम् से,
निकलना होगा बाहर इससे,

समझना होगा लक्ष्य को,
परस्पर विश्वास और हित को,

चलो तोड़ते हैं इस अहम् को,
तोड़ते हैं खामोश आलम को,

रुक जाते हैं, बैठके सुस्ताते हैं,
चाय पीके फिर  साथ चलते हैं...........(वीरेंद्र) २८.११.२०११

रचना:  वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

 

Saturday, 8 September 2012

3-10- "दीवार अपनी ऊंची कर..

दीवार अपनी ऊंची कर लेते हैं वही लोग,
जो दीवार गिराने की बात किया करते हैं,
मुहब्बत में अक्सर बेवफा हो जाते हैं वही,
जो बात-बात में अहदे-वफ़ा किया करते हैं.

भरोसा नहीं होता, भरोसा देने वालों का कभी-कभी,
भरोसा होता है उनका जो कहते नहीं किया करते हैं,
महज़ तल्ख़ लफ़्ज़ों पे जाना अपनों के मुनासिब नहीं,
नाराजगी रखने वाले भी अक्सर प्यार किया करते हैं.....(वीरेंद्र)

रचना: वीरेंद्र सिन्हा  ("अजनबी")

3-7- "कुछ अरसे से क्यूं बेनियाज़..

कुछ अरसे से क्यूं बेनियाज़ सी है जिंदगी,
तनहा-तनहा सी क्यूं हुए जा रही है जिंदगी,

मैंने तो हजारहा कोशिशें कीं इसे वापस लाने की,
पर ना जाने क्यों, बार-बार बेइख्तियार है जिंदगी,

तजवीज़ करदे कोई, दूसरे सूरते-हाल मेरे लिए,
इसकी एवज में देदे दूसरी अगर मिलती है जिंदगी,

मै नहीं हमख्याल इस दौरे-वहशत, अदावत का,
कसूर मेरा नहीं, बड़ी मुख्तलिफ मेरी रही है जिंदगी....(वीरेंद्र)

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")..(बेनियाज़=उपेक्षित; वहशत=पागलपन;मुख्तलिफ=भिन्न; -अदावत=दुश्मनी,बैर)

1-065-"मेरी दोस्ती भी कितनी


मेरी दोस्ती भी कितनी मामूली थी तेरे लिए,

तोड़ दी उस बात पर जो मामूली थी तेरे लिए...(वीरेंद्र)/1-065



रचना: वीरेंद्र सिन्हा   ("अजनबी")


 

Thursday, 6 September 2012

0-322-"नज़र भी लौट आती है


नज़र भी लौट आती है, हदे-निगाह तक जा कर,

खुद को आ जाती है सदा, दीवारों से टकरा कर,

मेरी मुहब्बतों को गर्द-ऐ-सफ़र तो हासिल हुआ,

गम नहीं मै यूँ हीं लौट आया मंजिल पे जा कर. ..(वीरेंद्र)/0-322



रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-144-"तुम्हे दर्द देने की


तुम्हे दर्द देने की सज़ा मुझे सहने दो,
अभी कुछ और खुदसे जुदा मुझे रहने दो...(वीरेंद्र)/1-144

रचना:- वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Wednesday, 5 September 2012

0-094- "मेरे उस्तादों ने मुझे बड़ी

मेरे उस्तादों ने मुझे बड़ी मुहब्बत से पढ़ाया, 
कभी नहीं की ज्यादती बड़े दिल से सिखाया, 
मगर बला के बेरहम हैं ये बेदर्द ज़माने वाले, 
जो भी सिखाया ठोकरें मार मार के सिखाया. .. (वीरेंद्र)/0-094

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-064- " हम दोस्ती को दफ्फातन

हम दोस्ती को, दफ्फातन यूँ दफ़न नहीं करते,
टूट भी जाए तो, तेरी तराह दुश्मनी पे नहीं उतरते...(वीरेंद्र)/1-064


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Tuesday, 4 September 2012

1-179-"मुझे नहीं गिला, जो.

मुझे नहीं गिला, जो तू मेरे दुश्मनों से जा मिला,

गम है बस इतना, उनसे भी तुझको कुछ न मिला.....(वीरेंद्र)/1-179


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-52- "सागर को है अभिमान..."

सागर को है अभिमान अपनी गहराई पर,
हे, प्रभु, मुझे प्रेम के भावों की गहराई दे,

पर्वत को है गौरव अपनी विशाल ऊंचाई पर,
हे प्रभु, मुझे आदर्श विचारों की ऊंचाई दे,

चट्टान को है गर्व तन की मजबूती का,
हे प्रभु, मुझे मेरे मन की मजबूती दे,

वर्षा, जल बरसा कर क्षुधा शांत करे सबकी,
हे प्रभु, मुझे पनघट बन जाने का वरदान दे,

वृक्ष दे फल, छाया और भी बहुत कुछ,
हे प्रभु, मै दूं मानव-सेवा ऐसा मार्ग दे,

नदियाँ लायें हरियाली धरा पर चहुँ ओर,
हे प्रभु मै बाँटूं खुशियाँ सर्वत्र, ऐसा काम दे,

प्रकृति को समझें जीवन, प्रभु सबको ऐसा ज्ञान दे........(वीरेंद्र)

रचनाकार: वीरेंद्र सिन्हा.

Monday, 3 September 2012

1-159-"ख्वाब मेरे बिखर गए.

ख्वाब मेरे बिखर गए सारे एक ही झटके में,
जैसे ढह जाए कोई मकाँ रेत में तामीर हुआ...(वीरेंद्र)1-159

रचना :  वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-168- "पत्थर-दिल हैं शायरी की .

पत्थर-दिल हैं शायरी की समझ उनमे है नहीं,

नाज़ुक एहसास भरे शेर, उन्हें सुनाता मै नहीं 

खुदगर्ज़, संगदिल दाद देंगे क्यों मेरे शेरों पर ,

जज्बा-ऐ-मुहब्बत कतई भी जब उनमे है नहीं...(वीरेंद्र)/0-168

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-108-"बिना सोचे समझे मै तुझे.

बिना सोचे समझे मै तुझे 'अपना' समझता गया,

बगैर ये जाने कि 'अपना' क्या होता है,

तूने भी कभी ना बताया, न चेताया मुझे,

मै समझता ही गया तुझे 'अपना' अब तलक,

बुनता ही गया बेकार के सपने फलक तक,

पर कुछ बात नहीं, कोई गम नहीं, शिकायत नहीं,

अब जता दिया, साफ़ कर दिया, कुछ शिकवा नहीं,

पर एक मलाल रहेगा अवश्य मुझे,

काश तूने ज़रा पहले बताया होता तो अच्छा होता,

मै भावनाओं में डूबता तो नहीं,

इतना आगे तक बढ़ता तो नहीं..................................(वीरेंद्र)

 
रचनाकार: वीरेंद्र सिन्हा.

Saturday, 1 September 2012

2-88- "व्यापारिकता के इस युग में.

व्यापारिकता के इस युग में, मानसिकता कैसी बिगड़ गई है,


पहले भावनाएं संवेदनाएं मर गईं, अब आत्मा भी मर गई है,

बढते जारहें है अपराध मानवता के विरुद्ध, कौन रोकेगा उन्हें,

अत्याचार भ्रष्टाचार में सभी लिप्त हैं, आपा-धापी मच गई है..(वीरेंद्र)

 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा('अजनबी')/२-८८ 


0-093-"क्यों सूने पड़े हैं चबूतरे.

क्यों सूने पड़े हैं चबूतरे और चौपालें यहाँ,

कहाँ सब के सब गायब ये होते जा रहें हैं,

क्यों पड़ी हैं बैठकें और महफिलें यूँ वीरां,

क्या लोग दरो-दीवार में सिमटते जारहे हैं....(वीरेंद्र)/0-093


रचनाकार: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")