Friday, 31 August 2012

0-215- "कई मुकाम जिंदगी.में आये

कई मुकाम जिंदगी में आये ऐसे, तेरा साथ न होना खलता था

समझा दिया इस दिल को, देखने को तुझे जब ये मचलता था,

मुहब्बत न सही, मुझसे कुछ कुर्बत तो बाकी रखते मेरे दोस्त,

ऐसी भी क्या अदावत, दुआ-सलाम का हक तो मेरा बनता था..(वीरेंद्र)/0-215

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

 


Thursday, 30 August 2012

0-212-"ख्वाबों पर नहीं रहा भरोसा.

ख्वाबों पर नहीं रहा भरोसा मुझे कभी,

तुमने मुझे इतने ख्वाब क्यों दिखा दिए,

मै तो नाऊमीदियों में भी बहुत खुश था,

तुमने उमीदों के चिराग क्यों जला दिए..(वीरेंद्र)/0-212

रचना:- वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Tuesday, 28 August 2012

1-329-"अच्छा हुआ जो तूने तोड़ के

अच्छा हुआ जो तूने तोड़कर फ़ेंक दिया इस दिल को,
कमीने को मुहब्बत भी बहुत हुई जा रही थी तुझ से..(वीरेंद्र)/1-329

रचनाकार: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी") 

Monday, 27 August 2012

0-054-कांटे ही रखते हैं महफूज़ .

कांटे ही रखते हैं महफूज़ गुलाब को,
हर फूल का नसीब ऐसा कहाँ होता है,
गुलाब को नहीं कदर निगेहबानी की,
उसे खूबसूरती पे नाज़ इतना होता है.

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी") 

0-364- गम नहीं इतना अगर

गम नहीं इतना, अगर कोई बेवफा हो जाए,

मजबूरियाँ हो सकती हैं, तुम्हे भूल वो जाए,

दुश्वारियां भी हो सकती हैं, किसे इनकार है, 

तकलीफदेह बड़ा है गर वो रकीब का हो जाए...(वीरेंद्र)/0-364

 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")


1-061-"किसी बुरी नज़र ने हमारी.

किसी बुरी नज़र ने, हमारी बरसों की दोस्ती छीन ली,
वो नहीं था कतई भी बेवफा, रकीबों ने उसे बना दिया,..(वीरेंद्र)/1-061

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Saturday, 25 August 2012

1-034-"अब न रही कोई शिकायत..

अब न रही कोई शिकायत बाकी, न कोई शिकवा ही रहा,
गिले खुद-बखुद दूर हो गए, जबसे तूने मुझे अजनबी कहा..(वीरेंद्र)/1-034

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-162-"गम ये नहीं कि तूने मुझे

गम ये नहीं  कि तूने मुझे भुला दिया,
गम वो है कि जिसके लिए भुला दिया..(वीरेंद्र)/1-162

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Friday, 24 August 2012

0-283- मुझसे छिपी नहीं थीं, मेरे ........

1-519-तेरी निगाहें कातिलाना



Thursday, 23 August 2012

3-34- अब ज़माने के काबिल हो..

आखिरकार अब मै भी मजबूरन पत्थर बन गया हूँ,
अब तो मै बहुत खुश हूँ और सांस ठीक से ले रहा हूँ,
तन्हाई है कोसों दूर मुझ से, सबके बीच रह रहा हूँ,
आंसुओं का नाम नहीं, जम कर ठहाके मार रहा हूँ,
किसी का दर्द मुझे नहीं सताता, मै बहरा होगया हूँ,
किसी को मै तसल्ली नहीं देता, मै गूंगा हो गया हूँ,
ज़माने के हालात को भूलकर खुद में सिमट गया हूँ,
वफ़ा,प्यार किन चिडयाओं के नाम हैं भूल ये गया हूँ,

एहसासों और जज़्बातों से आज़िज़ आ गया था मै,
पत्थर बन कर अब मै ज़माने के काबिल हो गया हूँ ...(वीरेंद्र)/3-34
रचना: वीरेंद्र सिन्हा

 

Sunday, 19 August 2012

3-33- गज़ल.हम वहीँ के वहीँ रह.

2-85- "जब जब मैंने तुम्हे बुलाया तुम..

जब जब मैंने तुम्हे है बुलाया, तुम चली आती हो,


थोड़ी देर को ही सही, परन्तु खुशियाँ दे जाती हो,


ऐ यादों, मै तुम्हे प्यार करता हूँ, इस गुण के लिए,


बदल जाने से ज़माने के, तुम बदल नहीं जाती हो...(वीरेंद्र)/2-85


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")


Thursday, 16 August 2012

2-102- मत तोड़कर लाओ तुम चाँद..

मत तोड़ कर लाओ तुम ये चाँद मेरे लिए,


उदास हो उठेंगे कितने प्रेमी बिन चाँद के,


याद है वो उदास रात जब तुम दूर थे मुझसे,


और यही चाँद माध्यम था संपर्क का हमारे बीच.


दिलों के बीच की बात यही पहुंचाता था हमें,


यही तो करता था दूर हम दोनों का अकेलापन,


इसी को देखकर तोडती रही मै अपने व्रत,


यूं तो ये चाँद मुझे प्यारा है बहुत प्रिये, पर


 रहने दो उसको वहीँ, इसके सितारों के बीच,


तुम मत लाओ, इसको तोड़ कर मेरे लिए................(वीरेंद्र)

 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा


Wednesday, 15 August 2012

1-323- "झूँटो की वजह से सच्चों

झूंटो की वजह से सच्चों के ऊपर से एतबार गया, 

वजूद की लड़ाई में नफरतें जीतीं, प्यार हार गया..(वीरेंद्र)/1-323


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")


Saturday, 11 August 2012

3-37- "दीवार से दोस्ती........

Friday, 10 August 2012

3-32- "कभी पास आके रोया...

कभी पास आके रोया, कभी दूर जाके रोया,


 कभी काँधे पे रोया तो कभी पल्लू में रोया,


 कभी खुलकर रोया और कभी छुपकर रोया,


 कभी बिना आंसू रोया, कभी धार-धार रोया,


 कभी हंस हंसके रोया कभी गीत गाके रोया,


 कभी मिलके रोया, तो कभी जुदा होके रोया,


कभी ज़ुल्म सहके रोया तो कभी देखके रोया,


बेदर्द दुनियां में,  मेरा दिल हर हाल में रोया.........(वीरेंद्र)


रचना: वीरेंद्र सिन्हा

Thursday, 9 August 2012

2-103- "अंतरात्मा"

"अंतरात्मा" तू ही रोक लेती है अत्याचार व्यभिचार होते होते,
यदि तू ना होती तो, धरा पर सर्वत्र पापी ही पापी घूमते होते,
बेकाबू होकर इंसान के दिमाग अनैतिकता की ओर बढते होते,
चारों ओर वहशी ही वहशी दीखते, सद्पुरुष तो बस लुप्त होते.

तू भी कभी कभी थोडा विलम्ब से जागती है, धीमी गति से,
अनियंत्रित मस्तिष्क दौड़के अपराध कर देते हैं द्रुत गति से,
तेरे जागने से पहले ही अपराध हो जाता है, बदकिस्मती से,
प्रतीत होता है तू निकल चुकीहै अपराधियों की भ्रष्ट मति से,

हमने सुना है तू बहुत कचोटती है अपराधी मन को, अंत में,
पर क्यों सावधान नहीं कर देती अपराधी मन को अग्रिम में,
बचा क्यों नहीं देती तू इंसान को पापी बनने से इस जन्म मे,
पूर्व-चेतावनी दे कर, तू कचोट दिया कर अपराधी को मन में. .....(वीरेंद्र)/२-१०३

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Tuesday, 7 August 2012

3-4 दोस्ती रखनी है गर...


दोस्ती रखनी है गर कायम तो मुझसे ये अकल लो,

आपस में गलतफहमियां पालने से पहले संभल लो


झूटे लोगों को नहीं मिला करते, सच्चे दोस्त कभी,

पाने हैं अगर ऐसे दोस्त तो पहले खुद को बदल लो,


मुसीबत-ज़दाओं से दोस्ती करते नहीं लोग अक्सर,

पाने हैं कुछ दोस्त तो पहले मुसीबतों से निकल लो,


दोस्ती से गर बन रही है अज़ाब दोस्त की जिंदगी,

दुश्मनी होने से पहले, खुद ही दोस्ती से निकल लो,


दोस्ती दूर रहकर भी निभायी जा सकती है पुरजोर, 

मुमकिन है तभी, जब असूलों पे तुम कर अमल लो...(वीरेंद्र)


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

3-31- 'अपनों' को अपना बनते न..

अपनों को अजनबी बनते देखा,
अजनबियों को अपना बनते देखा,
दोस्तों को दुश्मन बनते देखा,
दुश्मनों को दोस्त बनते देखा,
गैरों को अपना बनते देखा,
अपनों को गैर बनते देखा,
सभी कुछ दुनिया में देखा,
'अपनों' को अपना बनते न देखा.........(वीरेंद्र)


रचना: वीरेंद्र सिन्हा.

Monday, 6 August 2012

0-046- रुबाई.."न दुखाओ किसी ..

न दुखाओ बेगुनाह का दिल इतना, कि


 वो खुद को गुनाहगार ही समझने लगे.


 भला क्यों देते हो उसे सज़ा बेगुनाही की,


 कहीं तंग आकर वो गुनाह न करने लगे....(वीरेंद्र)/0-046

   

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")


Sunday, 5 August 2012

2-101- कविता.....प्रकृति-संरक्षण......

प्रकृति तेरे संग रहूँ मै, तुझसे खुद को जोड़ लूं,
धरती पर नींद निकालूँ, आकाश को मै ओढ़ लूं,
नदी झरनों में स्नान करूं, वृक्षों को छत बनाऊँ,
भीनी भीनी फूलों की महक से खुदको महकाऊँ,
चन्दन को माथे पर धारण कर श्रृंगार मै कर लूं,

वर्षा से अग्नि शांत करूं,शीत-पवन का आनंद लूं,
पेड़ पोधे, यह समस्त जंगल, बने रहें कुटुंब मेरा,
आहत न करे कोई इनको,रक्षा इनकी मै सदा करूं,
पर्वत रक्षक बनके, बचाएं मुझे अनेक विपदाओं से,
इनका वंदन करता रहूँ, इनका नित गुणगान करूं,
हे प्रकृति, तू मेरी मैय्या, तू ही मेरी जीवन नैय्या,
तुझे कोई आघात न दे कभी, तेरी मै रक्षा सदा करूं........(वीरेंद्र)

 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा.

Saturday, 4 August 2012

2-99- "प्रेम है अब एक कला.....

मै तुझे पा न सका, मैंने व्यर्थ ही क्यों देखे सपने,


 मै तुझे सुना न सका, मैंने लिखे क्यों गीत इतने,


 व्यर्थ रही मेरे सपनों की आशा, मेरे गीतों की भाषा,


 नहीं पहचान पाया मै भाग्य ग्रह और गुण अपने,


 कोरी भावुकता नहीं, व्यवहार-चतुरता भी चाहिए,

वरना बने थे जो अपने, वो भी लग जाते हैं बचने,


 जीना तो थी एक कला, हरेक को जो आती न थी,


पर अब प्रेम भी है एक कला, जो सीखी नहीं मैंने. ...(वीरेंद्र)/२-९९

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-98- उड़ ले तू उनके दुपट्टे........

उड़ ले तू उनके दुपट्टे,
उनके गले में बाहें डालके,
कभी हमारा भी वक्त आयेगा,
एक तरफ रख देंगे तुझे निकाल के,
बन जायेंगे हम उनके गले का हार,
नशीली उनकी आँखों में आँखें यूँ डालके,
उन्हें होश भी ना रहेगा, कहाँ पड़ा है तू,
हम ही देंगे तुझे उनको ज़रा संभाल के.
इतना ना उड़ तू दुपट्टे उनके गले में बाहें डालके.......(वीरेंद्र)/२-९८
 
रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Friday, 3 August 2012

2-62A- चौका-"भ्रम मेरा है.

भ्रम मेरा है,
प्रभु नहीं मेरा है,
वो ही मेरा है,
प्रभु का सो मेरा है,
मै प्रभु तेरा,
प्रभु तू भी मेरा है,
क्या मेरा तेरा,
सर्व नाम तेरा है,
कुछ न मेरा,
मै तेरा तू मेरा है.
ये जीवन तेरा है.

--**वीरेंद्र**--

3-30-- नज़्म: "ग़मों पे शायरी करते रहो..

ग़मों पर तुम शायरी करते रहो, पर ग़मों से दूर रहो,
खुशियों पर लिखो न लिखो पर खुशियों से घिरे रहो..........(वीरेंद्र)

तन्हाई के गीत तुम खूब गाते रहो, सबको सुनाते रहो,
पर तनहा रहके अपने मासूम दिल को मत जलाते रहो.......(वीरेंद्र)

बेवफाई पर लोगों की तुम फातिये भले ही पढते रहो,
पर जिंदगी भर बेवफाओं को तुम मत आजमाते रहो..........(वीरेंद्र)

जज्बातों को तुम अपने, भले ही शायरी में लुटाते रहो,
पर असल जिंदगी में,  लुटने से उन्हें तुम बचाते रहो...........(वीरेंद्र)

हसीनों का कुछ नहीं भरोसा,  कब किधर लुढक जांयें,
शायरी में उनके हुस्न के चाहे जितने कसीदे पढते रहो........(वीरेंद्र)

 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा
 

Thursday, 2 August 2012

2-89- ये गिरती हुई बरसात..

ये गिरती हुई बरसात,
बिलकुल जैसे मेरे जज़्बात,
बूँदें जब तक आकाश में,
स्वच्छ,निर्मल, कोमल,
पर गिरकर धरा पर ये,
बन जातीं हैं कींचड,
मैला गन्दगी से मिलकर,
खो देतीं समस्त सौंदर्य,
बन जातीं कुरूप ये.

मेरे जज़्बात जब तक हैं,
मेरे पास, बड़े पाक-साफ,
लुटा देता हूँ जब मै उन्हें,
हो जातें हैं वो मैलेकुचेले,
टूटे फूटे और कटे-फटे,
बड़े सस्ते और  फ़िज़ूल
बे मूल्य दो कौड़ी के,
कोई कद्र्दान् नहीं,
कोई उपयोग नहीं,
उपेक्षित हैं हो जाते,
बिलकुल अवांछित,
निकृष्ट नितांत अकेले........(वीरेंद्र)/2-89



 रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Wednesday, 1 August 2012

3-28- नज़म.....तू मेरा दोस्त रह ना रह

तू मेरा दोस्त रह ना रह, पर मेरी नज़रों में तो रह,


 तू मुझसे मिल ना मिल, पर मेरे ज़हन में तो रह,


 तू अपना दर्द मुझसे ना कह, मेरे दिल से तो कह,


 तू रकीबों को पहचान ले, यूँ जज्बातों में तो ना बह,


 तू दे कोई भी इल्ज़ाम मुझे, पर बेवफा तो ना कह..........(वीरेंद्र)


रचना : वीरेंद्र सिन्हा.