Tuesday, 31 July 2012

2-96-रक्षा-बंधन-महिला जहाँ नहीं...

महिला जहां नहीं सुरक्षित, सरे आम घसीट दी जाती है,
जहां रक्षकों में ही भक्षक-भेड़ियों की प्रवृत्ति पाई जाती है,
क़ानून निर्जीव हो, जनता बस मूक दर्शक बनी रहे जहाँ,
वहां मेरी बहना, तेरी राखी की लाज कैसे बचाऊंगा,
ये सोच कर मै चिंतित हूँ,
जिस बहन का नहीं कोई भाई, क्या होगा उस बहन का,
ये सोच कर मै चिंतित हूँ,
क्या देश समाज यूं ही चुप बैठा रहेगा, बस नारे देता रहेगा,
महिला-सशक्तिकरण के नाम पर वोट आकर्षित करता रहेगा,
सदियों तक बस लुभावनी बातें करता रहेगा,
क्या महिला आयोग का दफ्तर बस व्यर्थ खुला ही रहेगा,
ये सोच कर मै चिंतित हूँ,
मेरे हाथ पर तो बाँध दे बहन तू ये प्यारी सी राखी,
देकर अपनी जान भी इस जंगल राज में, मै तुझे बचाऊंगा,
पर एक रक्षा-सूत्र देश के ठेकेदारों के हाथ पर भी बाँधकर कह दे,
यदि न दे सकें वो नारी को सुरक्षा, तो पहन लें चूडियाँ हाथों में....(वीरेंद्र)

रचना:----वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")../2-96

3-29- नज़्म :".उतना ही रुलाया है."


अजब सा दस्तूर है देखा, बदलते हुए इस ज़माने का,
जिससे की जितनी मुहब्बत उसने उतना ही रुलाया है,
ठोकरें मिल रहीं हैं आज, इंसान को उनसे ही खाने को,
जिनके क़दमों के सामने किसी ने खुद को बिछाया है,
ज़माने की मार से जब- जब कोई गश खाकर है गिरा,
'अपने' तमाशा देखते रहे, गैरों ने हाथ देकर उठाया है,
तूफानों और आँधियों को इलज़ाम क्यों दे कोई भला,
बहुतों ने उमीदों के चिराग को अपने आप बुझाया है,

अजब सा दस्तूर है देखा बदलते हुए इस ज़माने का,
जिससे की जितनी मुहब्बत उसने उतना ही रुलाया है. ..........(वीरेंद्र)

 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा.


Monday, 30 July 2012

3-27- नज़म...हाले-दिल.......

तुझे क्या मै सुनाऊँ अपना 'हाले-दिल,'


लिख-लिखकर उंगलियां थक गईं मेरी,


 बात के आदी नहीं रहे, होठ गए सिल,


 कभी मेसेज् बॉक्स से बाहर आकर तू,


 एकबार तो कम से कम, रू-ब्-रू मिल,


 कई शिकवे लिख-पढ़ने से दूर नहीं होते,


 मिलने से चंद सेकंडों में होजाते हैं निल,


 तुझे क्या मै सुनाऊँ, अपना 'हाले-दिल.'


 कभी तो मेसेज बॉक्स के बाहर तू मिल...............(वीरेंद्र)

 

रचना :वीरेंद्र सिन्हा


Sunday, 29 July 2012

2-93- ऊंचे पहाड़ों से गिरी..

ऊंचे पहाड़ों से वो नीचे गिरी,


तो मैदानों ने अपनाया उसे,


बहने को नयी राहें दीं उसे,


सीने पर अपने लिटाया उसे,


पर वक्त आने पर वो नदी,


अपने दरिया से जा मिली.



खुशियाँ मुझे खुदा से मिलीं,


मै खुश बहुत हुआ पाके उन्हें,


मैंने पुचकारा, दुलारा उन्हें,


मगर क्या करूं आखिर में,


वो भी ग़मों से जा मिलीं.............(वीरेंद्र)


रचना:  वीरेंद्र सिन्हा.


Friday, 27 July 2012

2-94- "बस तुम्हारी हूँ..........

कितने ही तूफ़ान यहाँ आऐ, चले गए,
कभी-कभी तो जीवन को झकझोर गए,
पर तुम्हारे जाने के बाद मै खड़ी हूँ,
वहां ही जहां तुम थे मुझे छोड़ गए,
सींच रहीं हूँ मै वो सब पोधे,
बीज जिनके तुम जाने से पहले बो गए,
मेरा विश्वास नहीं डिगा, न डिगेगा,
चाहे जितनी देर लगे तुम्हे आने में,
यह और भी बढ़ेगा, मज़बूत बनेगा,
मै अबला तो नहीं हूँ पर हाँ इंसान हूँ,
मुझे पूर्णता चाहिए तुमसे, इसलिए नहीं,
कि मै एक अक्षम, निर्बल नारी हूँ,
बल्कि इसलिए कि अर्धांगिनी मै हूँ,
मै न कभी हारी और न अब हारी हूँ,
प्रतीक्षा करूंगी तुम्हारी अंत तक,
अगर किसी की हूँ, तो बस तुम्हारी हूँ,........(वीरेंद्र)

रचना:  वीरेंद्र सिन्हा.

2-132- "रिश्ते"



सामाजिक प्राणी होने का गर्व,
रिश्ते नातों संबंधों का घिराव,
चहुँ ओर अपने परायों का जुड़ाव,
जीवन होता सबके बीच,
उत्सव अनेक त्यौहार अनगिनत,
सब तरफ ही गीत ओर संगीत,
किसी से बैर तो किसी से प्रीत,
जीवन बस ऐसे ही रहा बीत,

विचित्र युग का हुआ पदार्पण,
सिलसिला चला विदाई का,
रिश्ते टूटे, सम्बन्ध हुए समाप्त,
स्वार्थ ने गला दबाया भलाई का,
सुनाई नहीं देते गीत संगीत,
प्रीत अद्रश्य हुई, शत्रु गए जीत,
हर व्यक्ति बेबस, जीवन नीरस,
ना कोई आवाज़ दे ना पुकार,
दर्पण सिवा एक नहीं संगी साथी,
रही नहीं कोई रिश्तों की परिपाटी.........(वीरेंद्र)


 
रचनाकार: वीरेंद्र सिन्हा.

Thursday, 26 July 2012

2-130- "कहीं भीग न जाए....

प्यारी सखियों समान इन सुंदर हरीभरी पहाड़ियों के बीचोबीच,
बन आयी प्राकृतिक ममतामयी गोद में, जाकर सोना चाहूँ मै,
रंग बिरंगे इनके फूलों की क्यारियों में जाकर श्रृंगार जैसा पाऊँ मै,
फूलों की भिन्न महकों को पहचानने की कोशिश में व्यस्त हो जाऊं मै,
घुघूती चिरैय्या, कोयल, की आवाजों के अर्थ का अनुमान लगाऊँ मै,
घिर घिर आयें जब बदरा और चले जब शीतल पवन यहाँ से वहां,
भेजकर पवन-संदेसा अपने पिया को, परदेस से उन्हें यहाँ बुलवाऊं मै,
कहीं भीग न जाएँ वो, जाओ रे मेघ बरसने से पहले उन्हें तुम ले आओ,
तंग आ गई हूँ मै उदासी में रहते रहते, विरह में जलते जलते,
अबकी बार तो तुम इस सावन को मेरे सफल बनाओ.....(वीरेंद्र)/2-130
 
रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" 

 




2-90- स्पर्श तुम्हारा मिल रहा है




स्पर्श तुम्हारा मिल रहा है..............................

प्रिये, तुम हो हजारों मील दूर मुझसे,
पर इन हवाओं से स्पर्श तुम्हारा मुझे मिल रहा है,

तुम न कहो कुछ भी चाहे मुझसे,
पर मेरा दिल, सब कुछ तुम्हारे दिल से सुन रहा है,

तुम याद आती रहती हो हर समय,
बस इसीलिए वक्त मेरा सुकून से निकल रहा है,

ख्वाबों में तुम आती रहना हर दिन,
न सोचना तुम, मेरा काम बिन तुम्हारे चल रहा है,

यूँ तो तुम्हारी यादें साथ दे रहीं हैं मेरा,
देखने को मुस्कान तुम्हारी, मन कबसे मचल रहा है,

विरह क्या चीज़ है मुझे पता नहीं था,
आज बिछुड़ कर तुमसे, सब पता मुझे चल रहा है.

प्रिये, तुम हो हजारों मील दूर मुझसे,
पर इन हवाओं से, स्पर्श तुम्हारा मुझे मिल रहा है.....(वीरेंद्र)/2-90


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")


 

0-415-"वो गुम शुद बैठा था मेरी..

वो गुम शुद बैठा था,  मेरी ही महफ़िल में,
मै ढूँढता फिरा उसे, रकीबों की महफ़िल में,
क्या करूँ मै भी मजबूर हूँ अपनी आदत से,
खोजता रहता हूँ उसे,  गैरों की महफ़िल में..(वीरेंद्र)/0-415


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Monday, 23 July 2012

1-317- "आकाश के परिंदों.

आकाश के परिंदों, अपने पंखों पर बेजा फक्र न करो,

थक हार कर आना ही पड़ेगा तुम्हे हमारी ज़मीन पर. ..(वीरेंद्र)/1-317


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-518- उसने कहा था राहे-मंजिल

उसने कहा था राहे-मंजिल में मिलेगा हमें,
हमने तमाम उम्र यूं ही सफ़र में गुज़ार दी..(वीरेंद्र)/1-518


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Thursday, 19 July 2012

2-81- मै लेखक नहीं........


मै लेखक नहीं, कामचलाऊ लिख लेता हूँ,
मै जानता हूँ, मेरे लेखन में गहनता नहीं,
पर फिर भी थोड़ी अपनी बात कह देता हूँ.
शब्दों का जाल बनाना मुझे है आता नहीं,
टूटेफूटे भावों को, टूटेफूटे शब्द दे देता हूँ,
काव्यात्मकता की नहीं अधिक समझ मुझे,
बस जो भी मन में आता वो लिख देता हूँ,
बहुत सोचता हूँ मै भी लिखूं उच्चस्तर का,
प्रयत्न करके भी वो स्तर ला नहीं पाता हूँ,
शायद यही कारण है, नहीं मिलता प्रतिसाद,
मै सदा ही प्रशंसा पाने में पीछे रह जाता हूँ..........(वीरेंद्र)
 
रचना: वीरेंद्र सिन्हा.

Wednesday, 18 July 2012

2-56- ".लाख दीपक मै जलाऊँ."

लाख दीपक मै जलाऊँ, सब व्यर्थ है,

उजियारे का भी ना रहा कोई अर्थ है,

ह्रदय-तरंगों को तुम तक पहुँचाने में,

ये ह्रदय मेरा अंततः रहा असमर्थ है...(वीरेंद्र)/2-56


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

 


2-77- जब कोई संवाद नहीं.......

जब कोई संवाद नहीं, प्रश्नों का जवाब नहीं,
तो फिर मिलते रहते हैं क्यों हम,

जब कोई लगाव नहीं, कोई ऐसा झुकाव नही,
तो प्रतीक्षा करते रहते हैं क्यों हम,

जब कोई दुराव नहीं, ऐसा कोई दुर्भाव नहीं,
तो खिंचे-खिंचे से रहते हैं क्यों हम,

जब कोई मित्रता नहीं, कोई भी समीपता नहीं,
तो एकदूजे की चिंता करते हैं क्यों हम,

जब बनना अपरिचित अजनबी संभव ही नहीं,
तो उसकी कोशिश करते हैं क्यों हम,

जब सुख-दुःख एक हैं, लाभ-हानि अलग नहीं,
तो फिर पृथक सोचते हैं क्यों हम, ...........................(वीरेंद्र)


रचना: वीरेंद्र सिन्हा.

3-25- गज़ल:.....हमने खुद से धोखे..


सब खाते हैं दुनियां से धोखे, हमने खुद से खाए हैं,
होश में रह कर भी,  हम बहुत बार लडखडाए हैं.

दुनिया ने तो दीं नसीहतें हमें बहुत वक्त बेवक्त,
हम ही हैं, जो उन्हें नज़रंदाज़ करते चले आए हैं.
...
ज़माने के उसूलों के साथ ही चलना बेहतर था,
खिलाफ चलके हमने खुद ही खुदपे ज़ुल्म ढाए हैं.

तलातुम से बचने का रास्ता खोजता है हर कोई,
हमने तो खुद अपनी जिंदगी में तूफ़ान बुलाए हैं.

रोज नए दोस्त नए रिश्ते कैसे बना लेते हैं लोग,
यहाँ तो जो थे अपने, वो भी अब लगते पराये हैं.

ऐ मेरे खुदा, अब तो जीने की तौफीक देदे मुझे,
लेले ये जज़्बात, ज़ख्म बहुत इन्होने मुझे दिलाये हैं..........(वीरेंद्र)
 
 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा.


Tuesday, 17 July 2012

3-24- हमसे नाराज़गी की इन्तहा........


हमसे नाराजगी की इंतहा तो देखे कोई उनकी,
ख्वाब में भी न मना सकूं, इसलिए सोये भी नहीं,

सबको मालूम है, दिल हमारा तोडा है उन्होंने ही,
नाज़ुक मिजाज़ जान कर उन्हें, हम रोये भी नहीं.
...
दोस्ती लग रही थी बोझ तो तोड़ देते कौन रोकता,
पर बेदर्दी से छुडा लिया हाथ, ज़रासा बोले भी नहीं.

कसूरवार फिर भी हमें ही ठहरा देते हैं वो जबकि,
ज़ख्म दफन कर लिए हमने, उन्हें दिखाए भी नहीं.

ये जानकर भी कि अब खत्म हो जायेंगे शिकवे,
वक्त-आखिरी मेरा आगया,, पर वो आये भी नहीं......(वीरेंद्र)

रचना : वीरेंद्र सिन्हा .

Thursday, 12 July 2012

3-40- "शाख-ऐ-शजर से जुदा होकर...

शाखे-ए-शजर से जुदा होकर गिरा,

सूखा खडंक ज़र्द नाज़ुक एक पत्ता,

कुछ ज़ाया सा, कुछ ठुकराया सा,

उतरन की माफिक फेंका हुआ सा,

चरचरा कर चटसे चूरचूर हो जाये,

ज्यों ही ज़रा सा पैर तले आ जाये,

गिरा हुआ, पड़ा हुआ, अभागा सा,

मेरी जिंदगी के मानिंद वो पत्ता...............(वीरेंद्र)


(रचना: वीरेंद्र सिन्हा)


Monday, 9 July 2012

.1-200-"कश्ती डूबा दूंगा अपनी

कश्ती डुबा दूंगा अपनी, गहराइयों में जाकर,
मेरी शान के खिलाफ है, साहिल पे आके डूबना.. (वीरेंद्र)/1-200


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Sunday, 8 July 2012

0-208-"मेरी आँख से छुप जाना

मेरी आँख से छुप जाना हुनर है तुम्हारा,
जाओ छुप जाओ, जहां मन करे तुम्हारा,
बस एक बार, मिला जाओ नज़रें मुझसे,
समाने दो मेरी आँखों में अक्स तुम्हारा...(वीरेंद्र)/0-208


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Friday, 6 July 2012

0-414-तेरी नफरतों की आग ने..

तेरी नफरतों की आग ने मुझे जला दिया,
मेरी राख को भी तेरी साँसों ने उड़ा दिया,
जब खात्मा-ए-मरासिम ही बहुत था, तो
क्यूँ मेरा वजूद ही ख़ाक में तूने मिला दिया..(वीरेंद्र)/0-414


रचना : वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी

1-172-"ज़माने को क्यों भुला दिया

ज़माने को क्यों भुला दिया हमने, उनसे मिलने के बाद,
किस मुंह से ज़माने पर जाएँ उनके बेवफा होने के बाद...(वीरेंद्र)/1-172

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")