Friday, 29 June 2012

3-23- मै समझा था दुनियां मेरी...



मै समझा था, दुनियां मेरी उजाड कर कहीं वो चला गया,

पर नहीं,, दुनियां का असूल मुझे समझाके वो चला गया,

प्यार वफ़ा न सही, इल्म की दौलत तो दे दी उसने मुझे,

मै ही नासमझ रहा, हकीकत तो बता कर वो चला गया.

आँखें मेरी बंद थीं गफलत में, मुझे कुछभी होश नहीं था,

 खोल कर मेरी आँखें, कौन जाने खुद कहाँ वो चला गया,

अफ़सोस, शुक्रिया भी कुछ मै अदा ना कर सका उसका,

ज़ुबान पर मेरी, खामोशी का ताला लगाके वो चला गया. ........(वीरेंद्र)/३-२३
 
 
रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")


Thursday, 28 June 2012

3-22- .".मतलब निकल जाने के बाद.




किसने दिया साथ मतलब निकल जाने के बाद,
परिंदे भी उड़ जाते हैं पंख निकल आने के बाद.

मत कर इतने भी वादे किसी से दौराने मुहब्बत,
के शर्माना पड़े उन पर, दोस्ती टूट जाने के बाद.
...
इलज़ाम देकर कत-ए-ताल्लुक करना है आसान,
रूह बहुत सताती है मगर जुदा हो जाने के बाद.

सारे जहां की लेलो हमदर्दी अपनी दास्ताँ बताके,
कौन रह जायगा हमदर्द, राज़ खुल जाने के बाद.

कुछ दिन तो कट जाएंगे जोश जोश में तुम्हारे,
याद आयगा दोस्त, जोश ठंडा हो जाने के बाद.

क़त्ल कर दे खुशी से, मगर इतना लिहाज़ कर,
छाँव में डालना मुझे मेरे क़त्ल हो जाने के बाद.

ग़मों का भी एहसास रहे बरकरार ये ज़रूरी है,
तकलीफ बड़ी होती है खुशियों के जाने के बाद. . . . . . .(वीरेंद्र)
 

रचना : वीरेंद्र सिन्हा  २७ जून, २०१२


1-305- जल कर भी मोम का



जल कर भी मोम का वजूद बचता रहा,
पर धागा बेचारा नेस्तनाबूद होता रहा. ..(वीरेंद्र)/1-305

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")


Saturday, 23 June 2012

1-199-"वो आग तो बुझ जायगी

वो आग तो बुझ जायगी जिसकी लपटें दीख रहीं हैं,
पर उसका क्या, जो दिलों में चुपचाप सुलग रही है...(वीरेंद्र)/1-199

रचना : वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Thursday, 14 June 2012

3-3- नज़म....जानना चाहो कि तुमसे...

जानना चाहो कि कोई तुमसे करता है प्यार कितना,
तो एक बार उससे तुम नाराज़ होकर देख लो,

किसी को तुम्हारी है परवाह कितनी,जानना हो अगर,
तो एक बार उससे तुम कुछ शिकायत करके देख लो,

लेना हो तुम्हे किसी की वफ़ा का इम्तहान अगर,
तो उस से थोड़ी सी तुम  बेवफाई करके देख लो,

 है संजीदा प्यार में तुम्हारे कोई, जानना हो अगर,
तो एक बार उससे मिलने का वादा लेकर देख लो,

हमख्याल, हम-मिजाज़ सब होते नहीं, फिर भी देखना हो,
तो एक बार उससे ज़रा तुम इत्तिलाफ करके देख लो.

गैर नहीं, अपने ही रूठा करतें हैं अक्सर तुमसे,
मनाने से बढेगा प्यार, नहीं है यकीं तो आजमा के देख लो..........(वीरेंद्र)

रचना: वीरेंद्र सिन्हा,


 

Sunday, 10 June 2012

1-274-"उससे क्यों पूछते हो

उससे क्यों पूछते हो हाल जिसका दिल टूटा हो,
उसे मौसम से क्या लेना जिसे बहारों ने लूटा हो..(वीरेंद्र)/1-274

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

 

Wednesday, 6 June 2012

1-273-"मेरे जज़्बात और एहसासात ,

मेरे जज्बात और एहसासात, मै शर्मसार हूँ तुम दोनों से,
गुनाहगार हूँ मै तुम्हारा, नहीं बचा सका मै तुम्हे रोने से ...(वीरेंद्र)/1-273

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Monday, 4 June 2012

0-314-"हम खुश थे बहुत

हम खुश थे बहुत, जब थे अजनबी,
ना दर्द था सीने में, ना थी तिश्नगी,
दोस्त बनना ही बस गुनाह हो गया,
अब ना रहे दोस्त, ना रहे अजनबी...(वीरेंद्र)/0-314

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")



Sunday, 3 June 2012

0-268- "अच्छा ही हुआ जो तूने....

अच्छा ही हुआ जो तूने कते-ताल्लुक कर दिया,
तुझे भूल जाने का मेरा काम आसान कर दिया,
यह गुज़ारिश है, जगा मत देना फिर से मुझमे,
जज़्बात जिन्हें मैंने निकाल के बाहर कर दिया..(वीरेंद्र)/0-268


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-267- "चटखा कर नाज़ुक आईने"....

चटखा कर नाज़ुक आईने को, ये न समझो,
तुमने उसे सच्चाई बता देने की सज़ा देदी.
देखोगे जब अपना चेहरा उसमे, फिर कभी,
पाओगे, तकलीफ उसने तुम्हे और भी देदी...(वीरेंद्र)0-267


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")