Wednesday, 30 May 2012

2-3- वो निकल गए आगे......

वो निकल गए आगे,
मै रह गया खड़ा वहीँ,
भावुकता से जकड़ा मै,
संवेदना से पकड़ा मै,
मै न निकल पाया बाहर कभी.
व्यथा दबाये अंतर्मन में,
प्रश्न लिए अनेक चिंतन में,
मै न व्यक्त कर पाया स्वयं को कभी,
व्याकुलता रही दबी दबी,
ह्रदय-सरलता रही भरी भरी,
मै न बदल पाया इस भाव को कभी,
संबंधों में नित नई कड़ी,
प्रेम-जाल बुनने वाली मकड़ी,
मै बुलाता रहा, पर रही वो दूर खड़ी,
मीठी मीठी वाक्-पटुता,
व्यवहार की चपल चतुरता,
मै न ले पाया इन्हें बस उधार कभी,

वो निकल गए आगे,
मै  रह गया खड़ा वहीँ. . . . .. . . . . . . . . . .(वीरेंद्र)

रचनाकार: वीरेंद्र सिन्हा, ९ सितम्बर, २०११.

 

2-1- "क्या बताऊँ".....

क्या बताऊँ, मैंने उसे कितना प्यार किया, दुलार किया,
सजाया , संवारा, संभाला, दुनिया के सितम से बचाया,
उसकी हर ख़ुशी, हर जिद पूरी की, रूठने पर उसे मनाया,
उसकी खातिर खुदको रुलाया, दुनिया को भी ठुकराया,

मगर क्या बताऊँ आज ये सब भूलकर  उसने मुझे बताया,
"न करो मुझसे बेजा प्यार, मत बनो मेरे आगे इतने लाचार,
मेरे स्वामी बनकर रहो, मुझपर रखो अपना पूरा अधिकार ,
मै हूँ "ज़िन्दगी" भगवान् से कुछ दिन को मिली हूँ तुम्हे उधार."...(वीरेंद्र)


रचनाकार :  वीरेंद्र सिन्हा,  २७ जुलाई ,२०११.

 

2-45- "आरक्षण का ज़हर"....


एक चिराग जलाने को, दूसरा मत बुझाओ,
देने के लिए एक को रोज़गार तुम,
दूसरे को बेरोजगार मत बनाओ,
पढ़ाने के लिए एक को तुम,
दूसरे को अनपढ़ गवार न बनाओ,
राजनीती करने के लिए तुम,
नौजवानों को भेदभाव मत सिखाओ,
दे सकते हो तो सामान अवसर दो,
प्रतिभाओं को दफ़न मत कराओ,
गरीब हो जो उसको मदद दिलवाओ,
पर हक़ न छीनों मेधावी बच्चों का,
उन्हें जाति- आधार पर न रुकवाओ,
आरक्षण का ज़हर फैलाकर तुम,
बेकसूरों का अधिकार-भक्षण न करवाओ
आरक्षण नहीं, संरक्षण दो गरीब को,
सम्पूर्ण भारत हो जाये रौशन,
ऐसे, दीप से दीप तुम यहाँ जलाओ..........................(वीरेंद्र)
 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा, २८ मई, २०१२.

 


Tuesday, 29 May 2012

2-2-"मेरे स्थूल मन.."

मेरे स्थूल मन, तू है अपरिपक्व  बहुत,
थोडा सूक्ष्म बन, थोडा चिन्तक बन,
बीत गया जो, अच्छा था, सुंदर था, परन्तु 
 प्रेम कर वर्तमान से भी तू,

खुश हो ले, दुलार ले, इसको भी तू,
भूत बन जायगा वर्तमान, तब तू,
याद करेगा इसे ही, होकर परेशान,
बचपन जवानी का हाल देख ले तू,
जब थे वो तेरा वर्तमान कभी, तो क्या 
हुआ था तुझे उनके मूल्य का ज्ञान,
मेरे व्याकुल मन तेरा स्वाभाव नहीं भाता,
बस तू अकारण ही दुखी हो जाता है,
केवल उसके पीछे जो बीतता जाता है। ....................(वीरेंद्र)


रचना :  वीरेंद्र सिन्हा  29 मई,2011

क्र. क.

 

 

 


Monday, 28 May 2012

0-262- "रहता था जो ख्याल

रहता था जो ख्याल कभी मेरे साथ-साथ,

वो आज मुझ से यूं बचा-बचा सा क्यूँ  है,

तन्हा-तन्हा सा बहुत हो गया हूँ मै आज,

जुड़ा-जुड़ा सा रिश्ता, कटा-कटा सा क्यूँ है....(वीरेंद्र)/0-262


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी") 


0-266- "दर्द मिलना अगर किस्मत.

दर्द मिलना अगर किस्मत में है तो मिल जाए,

भूलना उसकी फितरत में है तो बेशक भूल जाए,

हमें नहीं रही कभी दरकार किसी दवा-दारू की,

इतनी है आरज़ू, वक्ते-आखिरी में वो मिल जाए..(वीरेंद्र)/0-266


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")


0-203-"आजकल मेरी शिकायतें तुझसे

आजकल मेरी शिकायतें तुझसे बढ़ने लगीं हैं कुछ ज्यादा ही,

मै तुझे कहीं अपना तो नहीं समझने लगा हूँ, कुछ ज्यादा ही,

मै तो चाहता हूँ तेरी बेरुखी पर यूंही जाँ न्योछावर करता रहूँ,

पर क्या करूँ कभी कभी तू भी हद कर देती है कुछ ज्यादा ही..(वीरेंद्र)/0-203


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी"). 

Sunday, 27 May 2012

2-42- 'तांका' रचना.....

एक 'तांका' रचना:

भावना लुप्त,
संवेदनाएं सुप्त,
प्रेम-विहीन,
समाज अति शुष्क,
जीवन विष-युक्त. . . . (वीरेंद्र)/2-42


रचनाकार:  वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Wednesday, 23 May 2012

3-16- गज़ल.. माना कि ज़माना न...

माना कि ज़माना न मिलने देगा हमें आसानी से,
मेरे दिल ने तो आवाज़ लगा दी है तुझे, तू आ, न आ.

पूरा करेंगे हम गीत प्यार का, रह गया था जो अधूरा ही,
देदे अपने अहसासात मुझे, भले ये गीत तू गा, न गा।

प्यार अपना हासिल करने हद से गुज़र जाऊंगा मै,
नहीं होगा मुझे शिकवा, उस हद तक तू जा, न जा,

तेरे एहसासात और दुश्वारियां तमाम जानता हूँ मै,
हर बात ज़हन में है मेरे, मेरे इल्म में तू ला, न ला,

मत कर होंसले पस्त ज़माने से घबरा कर इस तरह,
ज़माने से टकराने की कसम खाता हूँ मै, तू खा, न खा।......(वीरेंद्र)/३-१६


रचना: वीरेंद्र सिन्हा('अजनबी')

1-264- मज़बूत रिश्ते भी टूट


मज़बूत रिश्ते भी  टूट जाते हैं,  बस कुछ दूर चल कर
मेरा रिश्ता भी टूटना था,आखिर इकतरफा था बेचारा..(वीरेंद्र)/1-264

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")



0-204- वो मेरी गलतफहमियां..

वो मेरी ग़लतफ़हमियाँ ना थीं हरगिज़,

उन्हें बस मैंने खुशफहमी था बना लिया,

ना किया था कभी इकतरफा प्यार मैंने ,

पता नहीं तूने मुझसे वो कैसे करा लिया...(वीरेंद्र)/0-204


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-279- तेरी जगह कोई और होता,,..

तेरी जगह  कोई और होता,  तो बंद कर देता  नाज़  उठाने उसके,

मै खुद नहीं जानता, तेरे नाज़ क्यों अभी तक उठाये जा रहा हूँ मै,

पत्थर भी मुझे गले लगा लेता, गर तेरे जितना मै उसको चाहता,

पता नहीं किस खुशफहमी को दिल में अब तक पाले जा रहा हूँ मै...(वीरेंद्र)/0-279


रचियिता; वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Monday, 21 May 2012

3-17- दिलकी आरजू है मै फिरसे बच्चा

दिल की ये आरजू है मै फिर से बच्चा बन जाऊं,
दाखिला लूं उनके स्कूल में, उनका छात्र बन जाऊं,
कमसे कम दिन भर रहेंगे वो मेरी आँखों के सामने,
भले ही होम-वर्क ने करने के लिए मै मुर्गा बन जाऊं.
खड़ा करेंगे वो बेंच पर मुझे तो ये भी मंज़ूर ख़ुशी से,
खड़े खड़े मै उन्हें निहारूंगा, खुद ही खा कर रहम वो,
मुझे बैठा देंगे, मिले उनका इतना साथ तो सब सह जाऊं,
दिल की ये आरजू है मै फिर से ...............................
उनका प्रिय छात्र अगर मै बन गया, तो वारे के न्यारे,
बन कर 'मोनिटर' बाकी सभी बच्चों पर मै रोब जमाऊं,
कोई करे तंग मुझे तो उनसे शिकायत कर उसे पिटवाऊं,
वो डांटे मुझे कभी ज्यादा, रो-रो कर उन्हें मै चिपट जाऊं,
दिल की ये आरजू है मै फिर से.................................
उनका दिल खुश करने को मै हर संभव हथकंडा अपनाऊँ,
कक्षा में जब बैठके वो स्वेटर बुनें, मै ऊन सुलझाता जाऊं,
चाट पकोड़ी का जब उनका जी करे, झट बाहर से ले आऊँ,
झांकूं कक्षा से बाहर, प्रिंसिपल आरही हो तो उन्हें चेताऊँ,
दिल की ये आरजू है मै फिर से...................................    ...  .....(वीरेंद्र)


रचयिता : वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")../3-17

Saturday, 5 May 2012

3-12- जिंदा रखता हूँ मै.(दिल)



जिंदा रखता हूँ मै इंसान को हर दम,
मिलाता हूँ मै अजनबियों को करीब से,
संजो के रखता हूँ राज़ जज़्बात सभी,
मैंने जगाई है मुहब्बत पत्थरों में भी,
लोगों के दर्द भी पी जाता हूँ मै सभी,
...
मगर ये इंसान है बड़ा एहसान-फरामोश,
तोड़ डालता है टुकड़ा-टुकड़ा करके मुझे,
चुरा लेता है और बेच भी डालता है मुझे,
कोई रोता तो कोई हँसता है देखके मुझे,

किसके आगे जाके अपना गम कहूं मै,
अबतो हालत मेरी ऐसी कर दी लोगों ने,
कोई पत्थर पे, कोई दीवार पे दे मारता है मुझे,
मै मासूम बेचारा "दिल" हूँ कोई तो समझो मुझे...........(वीरेंद्र)
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