Sunday, 26 February 2012

3-38- "झंकार नहीं है"........

झंकार नहीं है.........

तसल्लियों से नहीं मिलती अब कोई तस्कीन मुझे,
दिल है वो साज़ जिसमे आवाज़ तो है, झंकार नहीं है.

उसके बिना ज़िन्दगी में रहा अब कुछ ख़ास नहीं,
जिस्म में धड़कने साँसें हैं, पर चलती लगातार नहीं हैं,

मुहब्बत के मायने शायद बदल से गए हैं अब,
इश्क में एक कशिश तो है बाकी, पर प्यार नहीं है.

सहारे देने के लिए लाजिम है होना एक दिल का,
दिल तो हैं सभी के पास, पर कोई दिलदार नहीं है.

बेवफाई हो गई है सस्ती और वफ़ा महंगी इस दौर में,
खरीदते हैं सभी सस्ता, महंगे का कोई खरीदार नहीं है.   ..(वीरेंद्र)

              रचनाकार: वीरेंद्र सिन्हा. "वीरेंद्र"