Monday, 31 December 2012

2-23-"काला-धन, लोकपाल जैसे आसान

काला-धन, लोकपाल जैसे आसान काम होते नहीं जिनसे,
वो इन्टरनेट और गूगल को नियंत्रित करने की सोच रहे हैं,
अपने देश की फ़िल्मी-टी.वी. अश्लीलता रूकती नहीं जिनसे,
वो फेसबुक पर विश्व-सेंसरशिप लागू करने की सोच रहे हैं.........(वीरेंद्र)/2-23


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-12-"मेरी पत्नी बोलीं महिला और

मेरी पत्नी बोलीं, महिला और पुरुष के समान अधिकार हैं,
अगर पति नहीं मानता इस बात को, तो ये भी भ्रष्टाचार है,
इसके विरुद्ध कोई आवाज़ नहीं उठाता सोचो इस बारे में,
पी.एम. भले ही न हो, हर पति हो "लोकपाल" के दायरे में......(वीरेंद्र)/2-12


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-142-"कभी मेरे सपनों में ही बसी

कभी मेरे सपनों में ही बसी थी तू, मुंबई,
आज मगर हकीकत में है तू मेरी, मुंबई,
मैंने खूब जी भरके पाया तुझसे वो सभी,
जो भी, जब भी माँगा, मैने तुझसे कभी,
परिवार मेरा सदा रहेगा तेरा ऋणी मुंबई,
तुझे नमन करता हूँ मै, मेरी प्यारी मुंबई.....(वीरेंद्र)/2-142

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Tuesday, 25 December 2012

2-105-"नहीं कोई मूल्य भावनाओं

नहीं कोई मूल्य भावनाओं का यहाँ,
चारों और स्वार्थ की तराज़ूएं रखीं हैं,

लेकर आओ इमान यहाँ बेचके जाओ,
खरीद भी लो, बस कीमत लेके आओ.....(वीरेंद्र)/2-105

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-140-"मुझ पर कविता चोरी का

मुझ पर कविता चोरी का इल्ज़ाम न दो,
मेरी दुखती रग को तुम ऐसे तो ना छेड़ो,
आता गर मुझको चोरी करना कविता का,
औरों की क्यों, मै अपनी "कविता" न चुराता?.....(वीरेंद्र)/2-140


रचना:वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-145-"देखो ज़रा आम-आदमी

देखो ज़रा आम-आदमी की कथित हितेशी सरकार का नेतृत्व,
बलात्कार विरोधी प्रदर्शनकारियों को बताए असामाजिक तत्व,
जनता मूर्ख नहीं, बड़ी है परिपक्व, नहीं खोएगी अपना वर्चस्व,
अकर्मण्य खो देंगे अस्तित्व, देश पे जो समझें अपना स्वामित्व...(वीरेंद्र)/2-145


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Monday, 24 December 2012

2-28-"मै और मेरी परछाईं

मै और मेरी परछाईं दोनों यहीं थे,
मै लौट गया पर परछाईं रह गयी,
तुमने अपना प्यार दिया उसे इतना,
मै आहत हुआ, पर एक आस जग गई...(वीरेंद्र/2-28

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-25-"तुम्हारे पास हैं भाव,

तुम्हारे पास हैं भाव,
परन्तु शब्द नहीं हैं,

मेरे पास हैं शब्द पर,
तुम्हारे भाव नहीं हैं,
क्या भाव लेके तुमसे,
शब्द उन्हें अपने देदूं,
बनेगी एक सुंदर रचना,
एक दिन तुम देखना.......(वीरेंद्र)/2-25

रचना : वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-38-"बिन मांगे प्रीत मिले,

बिन मांगे प्रीत मिले,
मांगे मिले झिडकी,
किसी को दरवाज़े मिले,
हमको बस खिडकी,
औरों पर लुटाई दौलतें
हमारे वक्त पे कड़की......(वीरेंद्र)/2-38

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-126-"मै और मेरी कविता जब भी

मै और मेरी कविता जब भी कहीं मिलते,
अक्सर इसी किस्म की बातें किया करते,


वो कहती तुम देते हो कैसे अलफ़ाज़ मुझे,
पसंद कतई नहीं करती ये दुनियां जिन्हें,

मै समझाता उसे, दुनियां तो पागल है,
नहीं देखती एहसास, अल्फाजों में छिपे,

वो कहती, जब पढते ही नहीं लोग मुझे,
तो ऐसे एहसास जज़्बात किस काम के.

मै कहता मेरी नज़र में तू एक मोती है,
परखने को तुझे मेरी दृष्टि ज़रूरी होती है......(वीरेंद्र)/2-126

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-147-"सभी त्रस्त हैं समस्याओं से

सभी त्रस्त हैं,
समस्याओं से ग्रस्त हैं,
बस रट लगाते रहते,
और
चिल्लाते रहते हैं,
'नेता लोग भ्रष्ट हैं,'
चुनाव का समय आते ही,
वोट भूलके हो जाते,

हम अपने कामों में व्यस्त हैं,
सारे मुद्दे भूल जाते,
सब अत्याचार भूल जाते हैं,
मतदान केन्द्र जाते नहीं,
इण्डियागेट का जोश ठंडा,
और होंसले हो जाते पस्त हैं,

सरकार कोई आए,
कोई भी जाए,
हम तो अपने में मस्त हैं,

आज़ाद तो हो गए,
लोकतंत्र भी मिल गया,

पर गुलामी में अभी गिरफ्त हैं,
हम बस अपने में ही मस्त हैं......(वीरेंद्र)/2-147
रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Sunday, 23 December 2012

3-8-"मैंने कर रखी थी दोस्ती फिजाओं

मैंने कर रखी थी दोस्ती खिजाओं से,
भला कैसे थाम लेता मै हाथ बहार का,

कर देते हैं ज़मींदोस जज्बातों को लोग,
हमें तो तोडना भी न आया ऐतबार का,

आज बिकती है तो बिक जाने दे मुहब्बत को ऐ बेवफा,
कल मिले न मिले अच्छी कीमत क्या भरोसा बाजार का....(वीरेंद्र)/3-8

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

 

3-6-"वो मिला मुझे हमेशा बिजलियों

वो मिला मुझे हमेशा बिजलियों की तराह,
मैंने कहा कभी तो मिल ज़रा वक्त निकाल के,

मुशायरों में देखा सिर्फ कनखियों से ही जिसे,
कभी तो देखूं उसे ज़रा आँखों में आँखें डालके,

पूछने जो दुश्वार रहे सवाल उससे आज तक,
इस बार मिल जांयगे जवाब बिना सवाल के,

चुनिन्दा शेर जो लिखे थे उसपे, पढ़े न मैंने,
सुनाने को उसको रखें हैं मैंने सब सम्भालके.

उसको रखा हुआ है मैंने बतौर निशानी उसकी,
हुई थी मुलाकात उससे,बदौलत जिस रूमाल के.....(वीरेंद्र)/3-6

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")



 

3-5-"बहुत रो लिए हम और तुम

बहुत रो लिए हम और तुम दोस्ती में बार-बार,

शिकवा,शिकायत,रूठना,मनाना बहुत हो चुका,

वफ़ा, बेवफाई, भरोसे की दुहाई, अब और नहीं,

आओ, हम दोस्ती का आधुनिक चलन अपनाएं,

जिसमे न बंधन हो, और न ही कोई जज़्बात हो,

दोस्ती के जैसा फ़क्त हल्का सा एक एहसास हो,

चले जब तक चले, पर तोड़ने का हक पास हो,

टूट जाये तो, फर्क न पड़े और न दिल उदास हो....(वीरेंद्र)/3-5



रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

3-2-"चराग उम्मीदों के जल गए


चराग उम्मीदों के जल गए थे तेरे आने से,              
छंटने लगे थे ज़िन्दगी के अँधेरे तेरे आने से,

जीने की ललक दिल में फिर जगने लगी थी,
बेसाख्ता यूं दिल के नज़दीक तेरे आने से,

मैं भला क्यों मानकर बैठ गया उसे  ख़ुशी,
हलचल सी हुई थी जो इस दिल में तेरे आने से,

फिर से चिंगारी बुझ गईं ,उमीदें हो गईं धुंआ,
ख़त्म हुआ सब जो पाया था मैंने तेरे आने से.

मेरी तन्हाइयां जिन्होंने साथ निभाया मेरा,
वो नाराज़ हैं, मै भूल गया था उन्हें तेरे आने से.

रचना:  वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"



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3-1-"खुद ही न समझें जुबाने-वफ़ा

खुद ही न समझें जुबाने-वफ़ा, मुझसे पूछें तुम बेगाने क्यों हो,
मेरे लिए रहे न बेताब कभी, मुझसे कहें इतना तडपते क्यों हो,

खुद करें मुझे दीवाना,मुझी से पूछें तुम इतने दीवाने क्यों हो,
खुद तो बने रहते हैं शम्मा, मुझसे कहें तुम परवाने क्यों हो,

खुद ही करें परेशां मुझे,और मुझसे ही पूछें कि परेशां क्यों हो,
खुद ही रहते हैं नाराज़ मुझसे, और मुझसे पूछें नाराज़ क्यों हो....(वीरेंद्र)/3-1

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")
 

Wednesday, 19 December 2012

2-228-"मुझसे शिकायत करता

मुझसे शिकायत करता है यह अंतर्मन मेरा,
बाहर दीप जला दिया, मुझ मे तो है अँधेरा..(वीरेंद्र)/2-228

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-131-"भेद न समझा मै अभी तक

भेद न ये समझा मै अभी तक,
ये कैसा मिला है मुझे वरदान,
जिस दिशा में भी निहार लूं मै,
मुझे मिल जाते हैं मेरे भगवान...(वीरेंद्र)/2-131

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-143-"ये दुनिया बहुत बदल चुकी है

ये दुनियां बहुत बदल चुकी है अब,
मेरे दिल तूभी वक्त रहते बदल जा,
जब सब लोग बेवफा हो जायेंगे तो,
तू भला किससे वफादारी निभाएगा,
बदलना तो पड़ेगा तुझे भी एकदिन,
आज बदल, या फिर कल बदल जा,
उतना ही रहेगा तू खुश, ऐ मेरे दिल,
जितनी भी जल्दी तू बदल जायगा.
जिसे कहते थे मुहब्बत एक ज़माने में
वो है अब कोम्प्लिकेटेड रिलेशनशिप,
तेरी तो आदत है सिंपल रहने की,
तू 'कोम्प्लीसिटी' क्या समझ पायेगा,.
मान जा मेरी बात, अब भी बदल जा,
वरना देखले, कल बेइंतहा पछतायेगा....(वीरेंद्र)/2-143
 
रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-130-"तेरी तवज्जो का था

तेरी तवज्जो का था तलबगार मै एक मुद्दत से,
आज सुनकर तेरी शिकायत तमन्ना पूरी हो गयी...(वीरेंद्र)1-130

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-359-"ऊंचाइयों को बेशक छुओ

ऊंचाइयों को बेशक छुओ, मगर इतना,
ज़रुरत पर, नीचे भी उतर सको उतना,

ज़मी पर सांस में ऐसी घुटन नहीं होती,
घुटने लगती है सांस ऊंचाई पर जितना...(वीरेंद्र)0-359

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-159-"मै कुछ नहीं लिखता खुद से

मै कुछ नहीं लिखता खुद से कभी,
ना जाने क्यूँ, कैसे लिखा जाता है,
तुम्हारा तसुव्वुर आते ही दिल में,
उँगलियों से कलम चल जाता है...(वीरेंद्र)/0-159

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")


Tuesday, 18 December 2012

0-211-"ये भला कौन सी क़यामत

ये भला कौन सी, क़यामत आपने ढाई है,
मार डाला इस लट ने,रुख पर जो आई है,
यूँ आँखों से हमको क़त्ल करते जा रहे हो,
गज़ब है ये छुरी, कलेजे पर जो चलाई है.(वीरेंद्र)/0-211


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-21-"आप-धापी के इस दौर में,

आपा-धापी के इस दौर में,
उल्टा-सीधा कमाने के दौड़ में,

अपनों,दोस्तों और दुश्मनों में,
फर्क रह गया है उन्नीस-बीस का.......(वीरेंद्र)/2-21


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-322-"ता-उम्र ज़माने ने सताया

ता-उम्र ज़माने ने सताया मुझपे ढाए सितम बेशुमार
उम्र गुज़ार दी, तसल्ली करके, मुझी में थी कमी कोई.

रचना:वीरेंद्र सिन्हा )"अजनबी")/1-322

0-064-"सिलसिला विसाल का

सिलसिला विसाल का बढ़ता गया,
बुखार मुहब्बत का चढ़ता गया,
ज़िन्दगी के मायने जब समझ आए,
दर्जा-ए-हरारत-ए-इश्क गिरता गया...(वीरेंद्र)/0-064

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Monday, 17 December 2012

0-280-यकीनन तुम्हे भूल जाने में

यकीनन तुम्हे भूल जाने में देर लगेगी,
दिल को समझाने बुझाने में देर लगेगी,
यूं तो रिश्ते तोडके हो गया एक अरसा,
'अजनबी तुम्हे मान जाने में देर लगेगी..(वीरेंद्र)/0-280

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-099-"हसीन ख्वाब जो मिलकर

हसीन ख्वाब जो मिलकर देखे थे कभी हमने तुमने,
उनसे कहना, अब वो बिखर जाएँ खुद बखुद टूटके....(वीरेंद्र)/1-099

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-534-"भुला दिया तुझे, तेरी

भुला दिया तुझे, तेरी अनकही मर्ज़ी को मैंने मान लिया,

देर से सही, पर वक्त के इस तकाजे को मैंने जान लिया...(वीरेंद्र)./1-534


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-219-"उन्हीं को आदत है रूठ

उन्हीं को आदत है रूठ जाने की,
हमको भी सिफत है मनाने की,
भारी पड़ता है उनको ही रूठना,
जब हमें ज़िद होती है मनाने की...(वीरेंद्र)/0-219

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-196-इश्क के दुश्मन खुद

इश्क के दुश्मन खुद चाहने वाले भी हुआ करते हैं,
चाहत के कातिल ज़माने को इल्जाम दिया करते हैं ..(वीरेंद्र)/1-196

रचना: वीरेंद्र सिन्हा("अजनबी")

1-202-"जागते रहे हम रातों को

जागते रहे हम रातों को, उनकी यादों ने सोने न दिया,
नींद आती तो ख्वाबों में उनसे मुलाकात तो हो जाती....(वीरेंद्र)/1-202

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-578-"खुद ही रूठ कर कहते हैं

खुद ही रूठ कर कहते हैं मनाते भी नहीं,
हम जब मनाते हैं, तो कहते हैं, 'हटो भी'...(वीरेंद्र)/1-578

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-002-"अपने शेर का मतलब खुलासा

अपने शेर का मतलब खुलासा मै कर नहीं सकता,
जो नहीं जज्बाती वो मेरी शायरी समझ नहीं सकता...(वीरेंद्र)1-002

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-060-"हमसे बिछुड कर तन्हा बहुत

हम से बिछुड कर वो तन्हा बहुत हो जाता,
अच्छा हुआ किसी गैर को गले लगा लिया,
हम भी कहाँ तन्हा हुए हैं जब से आजतक,
हमने यादों को उसकी, सीने से लगा लिया....(वीरेंद्र)/0-060

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-061-"आगाज़े-सफर उस जानिब

आगाज़े-सफर उस जानिब हो ,जिधर से तेरी सदा आए,
रुख मेरा उस तरफ हो जिधर से तेरे शहर की हवा आए,
गुज़रती है गर तो गुज़रे पूरी ज़िन्दगी सफ़र ही सफ़र में,
जुस्त्जुए-मंजिल खत्म हो वहीँ मेरी, नज़र तू जहाँ आए....(वीरेंद्र)/0-061 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")


1-116-मै कातिल हूँ मैंने किया है

मै कातिल हूँ, मैंने किया है खून अपनी हसरतों का,
कैद करलो मुझे अपनी जिंदगी में,फैसला होने तक....(वीरेंद्र)/1-116

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Sunday, 16 December 2012

1-129-"बहुत दिनों से उसे मुझसे

बहुत दिनों से उसे मुझसे कोई शिकायत नहीं है,
कहीं ऐसा तो नहीं अब उसे मुझसे मुहब्बत नहीं है...(वीरेंद्र)/1-129

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-195-"अब आ भी जाओ लौट के

अब आ भी जाओ लौट के,
कितने और दोगे हमें झटके,
जीना शुरू कर देंगे तुम बिन,
आए ना अगर तुम पलटके....(वीरेंद्र)/0-195

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-184-"चर्चा ये हो गई गर्म,

चर्चा ये हो गई गर्म, शहर में जब से,
उसने किया क़त्ल मेरा तीरे-नज़र से,
दुश्मनों से निपटने के लिए अब तो,
दूरदूर से आने लगे हैं देने सुपारी उसे...(वीरेंद्र)/0-184


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Saturday, 15 December 2012

0-375-"जिसने दिया दर्द उसकी

जिसने दर्द दिया, उसकी तस्वीर टांग रक्खी है,
उस बेवफा के लिए हमने,  दुआ मांग रक्खी है
बस इन्तहां-ए-बेवफाई की अब है इंतज़ार हमें,
वरना तो हमने छत में एक रस्सी टांग रक्खी है...(वीरेंद्र)/0-375

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-278-"ये माना कि अब जुदा

ये माना कि अब जुदा हम हो गए,
वस्ल के अब इम्कान कम हो गए
दोस्ती टूटने की वजह याद रखना,
ये न कहना कि बेवफा हम हो गए ..(वीरेंद्र)/0-278

रचना: वीरेंद्र सिन्हा("अजनबी")

1-530-"मुद्दत गुज़र गई

मुद्दत गुज़र गई, दुनियां पहुँच गई कहीं की कहीं,

मगर ये क्या, मै अब भी हूँ "अजनबी" तेरे लिए..(वीरेंद्र)/1-530


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी") 

1-303-"तुम भी ठहरे पत्थर और

तुम भी ठहरे पत्थर और मै भी हूँ एक पत्थर,

पैदा होने दो चिंगारियां , मिल बैठें दोनों पत्थर..(वीरेंद्र)/1-303


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-361-"सब आओ मैदाने-जंग .

सब आओ मैदाने-जंग में, पूरी तैयारी से,
वक्त है जंग का हमारे वतन के गद्दारों से,
मिलकर लड़ना पड़ेगा इन दहशतगर्दों से,
मुकाबला नहीं चाकुओं से, है तलवारों से...(वीरेंद्र)/0-361

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी") 

0-119-"तू मेरी ज़िन्दगी से निकल

तू मेरी ज़िन्दगी से निकल गया एक शातिर की तरह,
पर मै औरत हूँ, एक माँ हूँ, नहीं हूँ बेपरवाह तेरी तरह,
ज़माने से अकेले लड़ने की कूबत, मुझे बक्षी है खुदा ने,
पाल लूंगी तेरे दिए ग़मों को भी, तेरी औलादों की तरह..(वीरेंद्र)/0-119

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Friday, 14 December 2012

1-098-"आसानी से अलविदा

आसानी से अलविदा कहकर ज़िन्दगी से निकल गए तुम,
कमी थी कोई तो कह देते,सर से पाँव तक बदल जाते हम.
..(वीरेंद्र)/1-098

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-051-"पुरानी दोस्ती की खातिर

पुरानी दोस्ती की खातिर मेरी दुआ है, ऐ बेवफा,
खुदा तुझे मेरी बद-दुआओं के असर से महफूज़ रखे. ...(वीरेंद्र)/1-051

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-049-"अब बढ़ा दो हाथ "वीरेंद्र"

अब बढ़ा दो हाथ "वीरेंद्र" दुश्मनों की तरफ भी दोस्ती का,
के दोस्त-दुश्मन में रह गया है फर्क बस उन्नीस-बीस का...(वीरेंद्र)1-049

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-122-"जुदा हैं हमारी रहें

जुदा हैं हमारी राहें, पर तेरे शहर का हर रास्ता मुझे पहचानता है,
मै अजनबी हो गया हूँ तेरे लिए, पर तेरा शहर मुझे पहचानता है...(वीरेंद्र)/1-122


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("आजनबी ")

1-058-"हमारी बेमिसाल दोस्ती,

हमारी बेमिसाल दोस्ती, निगाहें-बद ने छीन ली,
हमारी वफ़ा की मिसालें भी बहुत देने लगे थे लोग...(वीरेंद्र)/1-058


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-213-"जीते थे हम जुबां पे

जीते थे हम जुबां पे तुम्हारा ही नाम लेकर,
सीखा था प्यार निभाना अपनी जान देकर

पहले ही कहा था, मत आजमाया करो हमें,
खो दिया न अब तुमने हमें, इम्तिहान लेकर..(वीरेंद्र)0-213


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-312-"मुद्दत से हम खुश थे

मुद्दत से हम खुश थे, दोस्ती में अपनी,
सोचा दुनिया आबाद यूँही रहेगी अपनी,
फ़क्त एक ग़लतफहमी ने ही बता दिया,
वो कितनी नापायदार थी दोस्ती अपनी..(वीरेंद्र)/0-312


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-276-"तुम बिन छा जाते हैं

तुम बिन छा जाते हैं सन्नाटे मेरी ज़िन्दगी में,
छिन जाती है रौशनी किसी इंतकाम की तराह,
दफ्फातन आजाते हैं ज़लज़ले,तूफ़ान भी यहाँ,
रोज़ सहर भी होती है तो किसी शाम की तराह..(वीरेंद्र)/0-276

रचना : वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-263-" कुदरत के तूफ़ान अक्सर

कुदरत के तूफ़ान अक्सर अकेले आते हैं,
पर मेरे दिल में, ज़लज़ले के साथ आते हैं..(वीरेंद्र)/1-263

रचना:वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-141-"मेरी गिनती यदि सफल

मेरी गिनती यदि सफल व्यक्तियों में है,
तो श्रेय इसका मेरे माता व पिता को है,
माँ  ने दी ममता तो पिता ने दी क्षमता,
अभाव झेलकर, उन्होंने दीं सुख-सुविधा,
मार्ग प्रशस्त किया मेरी उपलब्धियों का,
हे पिता मै भी बनूँ तेरे जैसा अपने बच्चों का....(वीरेंद्र)/2-141

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-155-"मुझसे आँखें तो मिलाया

मुझ से आँखें तो मिलाया करो, भरी बज़्म में,
हकीकत और भी आने दिया करो मेरी नज़्म में .(वीरेंद्र)/1-155

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-142-"वो ना शामिल हो सके


वो ना हो सका शामिल मेरे जनाज़े में,
शायद मेरी मौत उसकी फुर्सत में न हुई...(वीरेंद्र)/1-142

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Thursday, 13 December 2012

2-138-"दुनियां भर की खुशियों से

दुनिया भर की खुशियों से मै भर दूं उसका दामन,
झिलमिल सितारों से भर दूं उसका प्यारा आँगन,
आने  से उसके, जीवन में मिली हैं इतनी खुशियाँ,
हर पल हर घडी लगती है मुझे सुहानी मन-भावन.....(वीरेंद्र)/2-138

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-529-"ओढ़ लो तुम कितना भी


ओढ़ लो तुम कितना भी उसूलों का मुखौटा,
इश्क करने से तुम्हें खुदा भी रोक नहीं सकता,..(वीरेंद्र)/1-529

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी") 

1-120-"तन्हाई में नहीं दीखता जब

तन्हाई में नहीं दीखता जब कोई दूसरा चेहरा,
तस्वीर खुद की बदल बदल कर देख लेता हूँ मै ...(वीरेंद्र)/1-120



रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-434-"मत कर खड़ी तू अपनी खाट

मत कर खड़ी तू अपनी खाट,
तू भी नाप ले दूसरों की औकात,
दिखे बड़ी तो मांग ले लाख दो लाख,
दिखे छोटी तो तू भी मार दे उनके लात...(वीरेंद्र)/1-434

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-296-"जिसमे पिरोये थे दिल के

जिसमे पिरोये थे दिल के बिखरे मोती वो धागा ढूंढ रहे हैं,
ऐसी हसीं शख्सियत को हम, आज यहाँ वहां ढूंढ रहे हैं...(वीरेंद्र)/1-296

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-295-"हम दुनियां से क्या 'ऊपर' वाले,

हम दुनिया से क्या 'ऊपर' वाले से भी गम छुपा रहे हैं,
दिल में रो रहे हैं धार-धार, ऊपर से हँसे हम जा रहे हैं...(वीरेंद्र)/1-295

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-294-"ज़माने वाले रोए इस

ज़माने वाले रोए इस कदर मेरी मौत पर,
समझते थे आबे-हयात पीकर बैठा था मै ..(वीरेंद्र)/1-294

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी") 

Wednesday, 12 December 2012

0-264-"अश्क बहने दो गर

अश्क बहने दो गर दिल परेशान है,
आंसू तो तुम्हारे दिल की ज़ुबान है,
टूटे दिल का दर्द कौन बयाँ करेगा,
आखिर दिल भी बेचारा बेज़ुवान है...(वीरेंद्र)/0-264


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-402-"धूप देखी, छाँव न देखी

धूप देखी, छाँव न देखी, फर्क कभी देखा नहीं,
धरती पर चले, आकाश की उड़ान सोची नहीं,
बीत जाते हैं रात-दिन ज़ख्म गिनने में हमारे,
दिलकश मौसम का इंतज़ार, कभी किया नहीं..(वीरेंद्र)/0-402

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")/

1-332-"इंतज़ार में तेरे लज़्ज़त वो

इंतज़ार में तेरे लज़्ज़त वो पाई हमने,
अब तेरे वस्ल के तलबगार भी न रहे..(वीरेंद्र)/1-332


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-86-"नियति में जो निर्धारित है,

नियति में जो निर्धारित है, वो
वक्त आने पर घटित हो जाता है,
समुद्र कितना भी उफान मारे,
जिसको बचना है बच ही जाता है.......(वीरेंद्र)/2-86


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी)

2-87-"व्यग्र मन न रख सका धैर्य

व्यग्र मन न रख सका धैर्य मिलन के लिए,
खिलते पलाश देखकर जागने लगे एहसास,
मगर मै क्या करता, शांत बैठ गया होके उदास........(वीरेंद्र)/2-91


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी)

2-87-"निकृष्ट उसका जीवन है,

निकृष्ट उसका जीवन है, जो भ्रष्ट है,
वो समझता रहता है खुद को उत्कृष्ट,
किन्तु भाग्य में उसके कष्ट ही कष्ट है.....(वीरेंद्र)/2-87


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी)

2-113-"मुझमे नहीं प्रतिभा ऐसी,

मुझमे नहीं प्रतिभा ऐसी, प्रभावित हो जाय तू,
तू स्वयं है बड़ी सुंदर एक काव्य की रचना,
और मै ठहरा बस एक अदना सा हिंदी हायकू...........(वीरेंद्र)/2-113

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-139-"आज ही के दिन हुई थी

२६ नवंबर..

आज ही के दिन हुई थी मानवता लहू-लुहान,

इंसान बना था वहशी, चुप बैठे थे भगवान,
गाफिल हम ही थे, रोक न पाए प्रवेश उनका,
कैसे हमारे घर में हो गया शत्रु इतना बलवान,
दे गया आजीवन -पीड़ा, ले गया कितने प्राण,
एक फांसी नहीं रोक सकेगी पुनरावर्ती इसकी,
शल्य-क्रिया ही अब है इस कर्क-रोग का निदान....(वीरेंद्र)/2-139

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-137-"तुमने बहुत देर कर दी,

तुमने बहुत देर कर दी, अब जाकर तुमको मुझ पर प्यार आया,

बड़ी देर हुई, अबतो भावनाओं का दाह-संस्कार भी मै कर आया,

यह देखो मेरे हाथ में मृत-भावनाओं के अवशेष-फूलों का कलश,

इन्हें विसर्जित करने अब तो सागर के किनारे भी मै चला आया.....(वीरेंद्र)/2-137


रचना: वीरेंद्र सिन्हा (अजनबी")

Tuesday, 11 December 2012

2-71-"जब आ जाए सम्पन्नता

जब आ जाए सम्पन्नता और संपत्ति,
कदापि नहीं होवे गरीब की विस्मृति,
महत्व दें सामाजिक कर्तव्यों को हम,
मन में न हो अनादर भाव की उत्पत्ति...(वीरेंद्र)/2-71

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Monday, 10 December 2012

2-35-"सत्य की वेदी पर प्रतिदिन.

सत्य की वेदी पर प्रतिदिन सत्य के चढाऊँ फूल,
कर्म करूं आचरण रखूँ निस्वार्थ, निश्छल बनूँ,

अस्तित्व मेरा बना रहे सदा ही लोक-समर्पित,
असफलता न देखूं, और असत्य को मै जाऊं भूल....(वीरेंद्र)/2-35

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-55-"मत तोड़ कर लाओ तुम,

मत तोड़ कर लाओ तुम ये चाँद मेरे लिए,
उदास हो उठेंगे कितने प्रेमी बिन चाँद के,
याद है वो उदास रात जब तुम दूर थे मुझसे,
यही चाँद माध्यम था संपर्क का बीच हमारे...(वीरेंद्र)/2-55

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-58-"मेरी जिंदगी की किताब

मेरी जिंदगी की किताब बहुत छोटी है,
इसमें हैं कुछ ही पन्ने कोई भी पढ़ ले,

भाषा है सरल ग्राह्य पर भाव हैं गहन,
भावनाविहीन पढ़े, तो पुस्तक मोटी है......(वीरेंद्र)/2-58

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-112-"मेरे प्रेम में मेघ नहीं है,

मेरे प्रेम में मेघ नहीं, पवन दूत है,
वही लाती है सुगंध उसकी मुझ तक,

और लाती है कोमल स्पर्श यहाँ तक,
मेरे साथ मेरी प्रेयसी भी पवन-वशीभूत है.....(वीरेंद्र)/2-112

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-70-"स्वागत करूं आगंतुक का

स्वागत करूं आगंतुक का सदैव ही मै,
याद रखूँ संस्कार, उन्हें न बिसराऊं मै,
मन रे, कर्तव्य स्मरण करा देना मुझे,
यदि विचलित कभी उससे हो जाऊं मै.....(वीरेंद्र)/2-70

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

2-29-"क्या रोटी भी विलासिता है मेरी.

क्या रोटी भी विलासिता है मेरी,बताओ,
इसे भी छीन रहे हो, ये तो हद हो गई है,

कुछ ना छोडोगे हमारे लिए तुम अब तो,
लगता है जिंदगी भी बद्जायका हो गई है....(वीरेंद्र)/2-29


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

3-47-"बेवफाई भी तुम्हारी भुला दी,

बेवफाई भी तुम्हारी भुला दी, के भुला देने की आदत है हमें,
बला का ज़ब्त है, गमे-इश्क झेलने की बहुत महारत है हमें,

तुम्हारी मुहब्बत के मुगालते में ही जीना बेहतर लगा हमें,
वफ़ा का तुम्हारी कोई इम्तिहान लेना लगी हिमाकत है हमें,

तुमने तो जुदा होके मुडकर भी ना देखा पुराने रिश्तों को,
हमने ज़रा सा तो राब्ता रक्खा, इतनी तो मुरव्वत है हमें,

रकीब से तुम्हारी कुर्बत बढती गयी, तन्हा होते गए हम,
ये तन्हाई ही सही, इसमें भी तो मिली एक मसर्रत है हमें...

बा-मुश्किल बचाया है, इस चराग को बुझने से हमने,
रूदादे-इश्क दोहराई न जाय, एक यही दहशत है हमें.......(वीरेंद्र)/3-47
 

 रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Saturday, 8 December 2012

1-146-"लोग देखते हैं जो ख्वाब

लोग देखते हैं जो ख्वाब, वो बन जाते हैं हकीकत कैसे,
हमने तो जो भी देखा हकीकत में, वो भी ख्वाब बन गए..(वीरेंद्र)/1-146


रचना:वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-161-"मेरे यार ने ऐसा मुंह

मेरे यार ने ऐसा मुंह मोड़ा मुझसे,
अब समझ नहीं आता जाऊं कहाँ,
सुनाऊँ मै जिसे दर्द भरे शेर अपने,
वैसा जज्बाती कद्रदान पाऊँ कहाँ..(वीरेंद्र)/0-161

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-207-"वो गिरता ही गया

वो गिरता ही गया इंसानियत से पैहम,
उसे इल्म था मै उतना गिर नहीं सकता...(वीरेंद्र)/1-207

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-081-"रकीबों की इनायतों से

रकीबों की इनायतों से मैंने खो दिया तुझे,
ये मेरी हार नहीं, तेरी जफ़ाओं की जीत है...(वीरेंद्र)/1-081

रचना:वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-137-"अब तलक बड़ी गफलत

अब तलक बड़ी गफलत में जिए जा रहा था मै,
अब मालूम हुआ ज़मीर नाम की कोई शै नहीं होती...(वीरेंद्र)/1-137

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-177-"रूठे यार की कहीं खाली


रूठे यार की कहीं खाली न चली जाए बद-दुवा,
मुझे बीमार ही रहने दो लोगों, हटा लो ये दवा..(वीरेंद्र)/1-177

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-176-"बड़ी हिमाकत की हमने जो.

बड़ी हिमाकत की हमने, जो तुझे आजमा के देख लिया,
इससे तो अच्छा था हम उसी ग़लतफ़हमी में जिए जाते..(वीरेंद्र)/1-176

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-509-"वक्त ने दे रखी थी हमें सज़ा

वक्त ने दे रखी थी सज़ा हमें,
हमारे ज़ख्म कबसे पल रहे थे,
ज़ख्म भरते भी कैसे बेचारे,
'अपने'जो मरहम मल रहे थे...(वीरेंद्र)/0-

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-124-"बस एक आजाब बनती .

बस एक अज़ाब बनती जा रही है जिंदगी,
लम्हा लम्हा ख़त्म होती जारही है जिंदगी,
चारागर क्या करे लाइलाज हो गए हैं ज़ख्म,
मरहम से मर रहे हम, रोए जारही है जिंदगी...(वीरेंद्र)/0-124

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-038-"जीना चाहते हैं हम, वो मगर


जीना चाहते हैं हम, वो मगर हमें जीने नहीं देते,

बोलने नहीं देते, होठों को भी हमें सीने नहीं देते,

खुदा जाने क्या चाहते हैं, क्या है अदावत हमसे,

हमारे बनते भी नहीं, गैर का हमें बनने नहीं देते..(वीरेंद्र)/0-038



रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Friday, 7 December 2012

1-014-"नकाब रुख से हटा कर

नकाब रुख से हटा कर दीदार हो जाने दीजिये,
आप पर मेरी ग़ज़ल अधूरी है, पूरी हो जाने दीजिये...(वीरेंद्र)/1-014


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

3-41-"न जाने क्यों मैंने ज़हमत..

न जाने क्यों मैंने ज़हमत दी जज्बातों को,
जब चल सकता था काम, महज़ बातों से.


किसलिए सुनी मैंने रूह से निकली आवाज़,
क्यों ना किया समझौता, बदले हालातों से,

दोस्ती,वफ़ा,अपनापन ये सब हैं महंगे यहाँ,
क्यों चाहा पाना इन्हें मैंने चंद मुलाकातों से,

येभी भूल गया मै, वक्त है मौका-परस्तों का,
किसीको क्या लेना-देना फालतू रिश्ते-नातों से...(वीरेंद्र)/3-41


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-157-"मै उन तक दिल की बात

मै उन तक दिल की बात पहुंचाने के लिए,
शेरो-शायरी मै अक्सर कर लिया करता हूँ
दाद देने के बजाय वो भड़क जाया करते हैं,
कहते हैं राज़े-इश्क मै आम किया करता हूँ (वीरेंद्र)/0-157

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-039-"कौन किसी का हुआ कभी..

कौन किसी का हुआ कभी, जो अब होगा,

जो सब का हुआ वो ही हमारा बस होगा,

हम नहीं हैं इस दुनिया, में कोई  निराले,

जो सबका हुआ वही हमारा भी हश्र होगा...(वीरेंद्र)/0-039 


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-045-"तकदीर से टकराने की ज़िद.

तकदीर से टकराने की ज़िद कर ली हमने,
ज़ख्मों की तपिश में बढ़ोतरी कर ली हमने 
जीने की ख्वाहिश में न हुआ कोई इजाफा,
तमाम जिंदगी इस तरह पूरी कर ली हमने.....(वीरेंद्र)/0-045

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")


0-050-"उखाड फेंकी छत मेरे..

उखाड फेंकी छत ,मेरे आशियाने की तूने,
नोंच कर मेरे रिश्ते, दूसरों के सर रख दिए,
फ़ना कर दिया हमें पूरा मय दरों-दीवार के,
ये धड़कने,ये साँसें भी भला क्यों छोड़ दिए...(वीरेंद्र)0-050

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")



0-181-"एक मुद्दत सी हो गई.

एक मुद्दत सी होगई, उन्हें हमसे जुदा हुए,
फिर भी जाने हम कैसी आस लिए बैठे हैं,

तमाम दुश्मन भी बन चले हैं दोस्त अबतो,
वो हैं कि अब भी दिल में फाँस लिए बैठे हैं..(वीरेंद्र)/0-181

रचन: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")



0-360-"मुफलिसी दूर न हुई

मुफलिसी दूर न हुई,मजलूम तो बस मजलूम रहा,
हमदर्दी तो मिली, इमदाद से मगर वो महरूम रहा,
बंट रही थी सरकारी इमदाद, इन्तेखाबात से पहले,
जिंदा होके भी सरकारी फेह्रिस्तों में वो मरहूम रहा....(वीरेंद्र)0-360


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-330-"सभी सहूलियतें थीं.

सभी सहूलियतें थीं मुहैय्या मेरे इस दिल में,

फिरभी न जाने क्यूँ, वो इसमें रह नहीं पाते,

मानते नहीं इस दिल को अपना आशियाना,

ठहर जाते गर बा-वफ़ा होते, चले नहीं जाते...(वीरेंद्र)0-330


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-086-"लोग कहते हैं तुम भी.

लोग कहते हैं तुम भी बदल जाओ,
बदलते वक्त और ज़माने के साथ,
कोई बताए ज़मीर को मनाऊँ कैसे,
कैसे बदलूं मै अपने ज़हनो-जज़्बात..(वीरेंद्र)/0-086

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")





0-040-बेमुरव्वती की चादर ओढ़कर

बेमुरव्वती की चादर ओढ़कर शहर में सो गए सभी,
दरीचे, दरवाज़े और झरोखे अबतो बंद हो गए सभी,
जाग क्यों रहे हो भला, तुम भी सो क्यों नहीं जाते,
मेरे लिए क्यूँ खुला रहे झरोखा जब बंद हो गए सभी....(वीरेंद्र)/0-040

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")



0-275-"तुम तो चले ही नहीं.

तुम तो चले ही नहीं, एक बार जो रुक गए,
थक गए हम रुके-रुके तुम्हारे इंतज़ार में,
मंजिलें दूर न थीं, गर चलते रहते तुम भी,
हम-कदम तुम हुए नहीं, हालाते-दुश्वार में....(वीरेंद्र)0-275

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-152-"तेरा हुस्न रहा मौजू

तेरा हुस्न रहा मौजू हमेशा गज़ल का मेरी,
तेरी हर बात रही, आइना जिंदगी का मेरी,
दूर-दूर क्यों बैठें रहें अब हम महफिलों में,
आ, बन जा तू फलसफा ज़िन्दगी का मेरी..(वीरेंद्र)/0-152

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")


Thursday, 6 December 2012

1-154-"बड़े भोले हैं वो, जो

बड़े भोले-भाले हैं वो, जो मेरे रकीब को सलाम करते हैं,
उनको क्या पता, मेरे इश्क का काम वो तमाम करते हैं...(वीरेंद्र)/1-154

रचना: वीरेंद्र सिन्हा("अजनबी")

0-030-"ठूंस-ठूंस कर डकार रहे

चन्द हैवान ठूंस-ठूंस कर डकार रहे हैं पकवान,
समक्ष खड़ा ठंड में ठिठुरा नंगा भूखा इंसान,
ठलुए खूब मार रहे ठहाके, दया का नाम नहीं,
गरीब भूखी आत्मा पूछ रही कहाँ हो भगवान् ..(वीरेंद्र)/0-030

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-256-"बड़े ठाट से जी रहे थे.

बड़े ठाट से जिए जा रहे थे हम,
सभी को ठेंगा दिखा रहे थे हम,
वक्त ने ली अचानक ही करवट,
दुनियां से ठुकराए जारहे थे हम ...(वीरेंद्र)/0-256

रचना: वीरेंद्र सिन्हा("अजनबी")

0-217-"कभी खुद को तो कभी

कभी खुद को, तो कभी प्यार को अपने, मैंने खोया है,
खो देने कीआदत हो गई मुझे,सभी कुछ मैंने खोया है,
इस दिल को अब तुम्हीं संभालके रख लो अपने पास,
इस मासूम को भी, अनजाने में कई बार मैंने खोया है..(वीरेंद्र)/0-217

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Tuesday, 4 December 2012

0-342-"अजनबी, दोस्तों से बेहतर..

अजनबी, दोस्तों से बेहतर होते हैं,
न करते हैं आहत, न आहत होते हैं,
परिचित तो बदल लेते हैं पाले,पर
अजनबी तो बस अजनबी रहते हैं..(वीरेंद्र)/0-342

रचना:वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-298-"मुहब्बत है इबादत हमारे लिए

मुहब्बत है इबादत हमारे लिए, खेल नहीं,
इसीलिए हमारे दिल का तेरे दिल से मेल नहीं..(वीरेंद्र)/1-298

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-110-"मुसलसल गर्दिशों से आजिज

मुसलसल गर्दिशों से आजिज मै मुन्तजिर था किसी हसींन सहर का,
आज फिर शबे-गम ने कह दिया, यहाँ कुछ हस्बे-आरज़ू नहीं मिलता..(वीरेंद्र)/1-110

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-307-"अच्छा है तुमने न दी

अच्छा है तुमने न दी मुबारकबाद मुझे सालगिरह की,
हमें भी कहाँ तमन्ना थी तुम्हारी बेवफाई में जीने की..(वीरेंद्र)1-307

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-256-"उससे और कुछ पूछना भी..

उससे और कुछ पूछना भी होगा मेरी हिमाकत,
जिसकी एक मुस्कराहट ही मुकम्मल जवाब हो..(वीरेंद्र)/1-256

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-152-"मै गम-कदा हूँ, अजायबघर हूँ

मै गम-कदा हूँ, अजायबघर हूँ, मुख्तलिफ रंजो-गम का,
तेरा मशकूर हूँ, तूने इसमें इज़ाफ़ा किया है दर्दे-इश्क का...(वीरेंद्र)/1-152

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-084-"उनसे जुदा होने के बाद

  
उनसे जुदा होने के बाद, मेरा पीने का अंदाज़ बदल गया है,
आँखों की जगह गिलास ने लेली और साकी बदल गया है...(वीरेंद्र)/1-084

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-163-"हम आखरी सांस तक


हम आखिरी सांस तक ज़िन्दगी से लड़ेंगे,

मौत को आड़े नहीं आने देंगे इन्तिजारे-यार में...(वीरेंद्र)/1-163

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-010-"साथ निकले थे किसी


साथ निकले थे किसी मुश्तरका जुस्तजू में हम,

वो मुड गए किसी मोड़ पे, अजनबी बन गए हम,

ज़िन्दगी का सफ़र पूरा किया जाता है अकेले ही,

इस हकीकत को "वीरेंद्र" भला क्यों भूल गए हम .....(वीरेंद्र)/0-010



रचना:वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-147-"पत्थरों के शहर में दीखे


पत्थरों के शहर में दीखे कुछ लोग इंसानों की शक्ल में,
वास्ता पड़ा रू-ब्-रू होने का तो वो भी संग-दिल निकले....(वीरेंद्र)/1-147

रचना : वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Monday, 3 December 2012

1-107-"चल क्यों दिए मेरे अरमानों को

चल क्यों दिए मेरे अरमानों को सुपुर्दे-आतिश करके,
तसल्ली तो कर लेते इनके राख में तब्दील होने तक...(वीरेंद्र)/1-107

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-289-"ज़ख्म भर भी जाते हैं तो

ज़ख्म भर भी जाते हैं तो, कुछ निशान रह जाते हैं बाकी,
क़र्ज़ गैरों के चुक जाते हैं, पर अपनों के रह जाते हैं बाकी. (वीरेंद्र)/1-289

रचना:वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")


1-085-"पैमाने से पीते हों तो


पैमाने से पीते हों अगर हम, तो शराब छोड़ भी दें,
आँखों से पीने वाले क्या करें, दीदार करना छोड़ दें..(वीरेंद्र)/1-085


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-052-"अपनी दोस्ती में तुमने मुझे

अपनी दोस्ती मे तुमने मुझे कुछ और दिया न दिया,
मेरी हर एक ग़मगीन गज़ल को मौजू तो ज़रूर दिया...(वीरेंद्र)/1-052

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-185-"नशा है बुरी चीज़ फिर भी

नशा है बुरी चीज़, फिरभी लत लग जाती है,
मुहब्बत शै है दुखदाई, फिर भी की जाती है,
भूलने को भूल जाओ कितना भी, बेवफा को,
पर रह-रहकर याद कई बार उसकी आती है...(वीरेंद्र)/0-185

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-128-"फूल गुलाब का कर सकता है

फूल गुलाब का कर सकता है प्यार का इज़हार,

किसी से मगर करवा नहीं सकता प्यार का इकरार..(वीरेंद्र)/1-128


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-094-"वो जो शरीक था मेरी

वो जो शरीक था मेरी हर खुशी में हमसाया बनकर,
आज खुद कहाँ गायब है,  मुझे मौत की खुशी देकर...(वीरेंद्र)/1-094

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-382-"इस कदर खफा होके गया

इस कदर खफा होकर गया था वो मुझसे,
फिर भी मुझे उसकी याद सताने लगी है,
हिचकियाँ बेशुमार आईं होंगी वहां पे उसे,
अब तो एक-दो मुझे भी यहाँ आने लगीं हैं...(वीरेंद्र)/0-382

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-079-"मै हरदम साथ था तेरे

मै हरदम साथ था तेरे, जब-जब तुझे मेरी ज़रूरत थी,
आज मुझे है तेरी ज़रूरत, तो तेरी ज़रूरत कोई और है,..(वीरेंद्र)/1-079

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-160-"बेशक कर दे मुझे तन्हा,

बेशक कर दे मुझे तन्हा, पर इतना तो सिलसिला रख,
भले रख अदावत, मगर फिर भी मुझसे कुछ तो राब्ता रख....(वीरेंद्र)/1-160

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-115-"मै चलूँ तो ज़मीन मेरी,

मै चलूँ तो ज़मीन मेरी, मै उडूँ तो आसमान मेरा,
मुमकिन ये मंज़र तभी, गर हमसफ़र हो तू मेरा...(वीरेंद्र)/1-115

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-309-"दोस्ती अगर है एक रिश्ता

दोस्ती अगर है एक रिश्ता ,तो क्यों नहीं मानते इसे,
नफे-नुक्सान से ऊपर उठ कर क्यों नहीं जानते इसे,
लेके पैमाना इसकी नपाई का क्यूं घूमते रहते हैं हम,
आंकते हैं क्यों इसे, बेशकीमती क्यूँ नहीं मानते इसे ...(वीरेंद्र)/0-309

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-300-"वो मंज़र वो मरहले वापस आ

वो मंज़र, वो मरहले, वापस आ तो गए हैं, मगर
तेरी आँखों में वो पहली सी चमक देखना चाहता हूँ..(वीरेंद्र)/1-300

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-158-"दीवारों से करता रहा गुफ्तगू.

दीवारों से करता रहा गुफ्तगू, परिंदों को मै बुलाता रहा,
नामौजूदगी में तेरी जो लिखे थे शेर,उनको सुनाता रहा,
दाद को तेरी, कब तक मुन्तजिर रहते मेरे शेर आखिर,
लिख-लिखके,पढ़-पढके तमाम रात खुदको सुनाता रहा...(वीरेंद्र)/0-158

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Sunday, 2 December 2012

3-46"मेरी वीरान जिंदगी में अगर..

मेरी वीरान जिंदगी में अगर तुम आऐ न होते,
पन्ने मेरी डायरी के इतने भर गए न होते,
अहदे-वफ़ा तुमने ना निभाया होता अगर,तो
शायरी को मेरी पंख इतने लग गए न होते,
ज़माना रह जाता महरूम सुनने से हसीं गज़ल,
गर महफ़िल में मेरे साथ तुम आए न होते,
तरुन्नुम न पैदा होता, दाद न मिलती इतनी,
गर कलाम पे मेरे संग-संग तुम गुनगुनाए न होते,
राज़ हमारे इश्क का यूँ फाश न होता बज़्म में,
गर कलाम पे मेरे तुम इस कदर मुस्कुराए न होते...(वीरेंद्र)/3-46

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Thursday, 29 November 2012

0-207-"चेहरे पे आज, कैसी परेशानी

चेहरे पे आज, कैसी परेशानी सी छाई है
कहाँ खोए हो भला, क्यों उदासी छाई है,
ग़मगीन बहुत ही लग रहे हो आज तुम,
उभर कर क्या कोई चोट पुरानी आई है..(वीरेंद्र)/0-207


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Friday, 23 November 2012

2-136-"कैसा विचित्र है जग में

कैसा विचित्र है,
जग में ये चलन,
जीते जी होता है,
महान का दमन,
पर मरणोपरांत,
उसे करते नमन,
जीवित को मान न दें,
पर मृत्यु पर श्रद्धा-सुमन.
निधन पर अश्रु बहाए,
जीवन में करें चरित्र-हनन,
महापुरुषों को मान मिला, पर
कष्ट मिला जीवन-पर्यंत.............(वीरेंद्र)2-136


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Thursday, 15 November 2012

2-135-"साफ़ कर लिया मन-आँगन.

साफ़ कर लिया मन-आँगन झाड़ू से सकेर दीं भावनाएँ,
सजा ली काया, उतरन की मानिंद फ़ेंक दीं संवेदनाएं,

परिवर्तनशीलता के युग में परिवर्तन था अत्यंत ज़रूरी,
भाव और स्वाभाव ही क्या, बदल दीं समस्त परिभाषाएँ,

व्यवहारिकता की आड़ में, व्यापारिकता का हुआ स्वागत,
आत्मीयता हुई व्यर्थ का चोंचला, आ गईं नई मान्यताएं,

टूटते हैं तो टूटें, बिखरते हैं तो बिखरें, संबंधों में रहा क्या,
टूटना-बिखरना, यह तो अब हो गईं सामान्य सी समस्याएं..(वीरेंद्र)

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")/ 2-135

Wednesday, 14 November 2012

2-134-"बालक भोर में निकला

बाल-दिवस १४ नवंबर की प्रातः एक बालक घर से निकलता है:-
 
बालक भोर में निकला 'काम' पर,  .. .('पढाई पर नहीं)
लेकर बड़ा सा थैला नन्हें कंधों पर.. . .(बस्ता नहीं)
खड़ा था कचरा-गाडी की प्रतीक्षा में.....(स्कूल-बस नहीं)
लपका साथियों  संग 'कूड़ा-ढेर पर......(छात्रों संग नहीं)
ढूँढता रहा ढूँढता ही रहा कुछकुछ. .  ...(अध्याय नहीं)
खास न मिला उदास था 'दिन' पर,
गहरे ढेर में मिलीं उसे दो मैली थैली,
'भावनाएँ','संवेदनाएं ' लिखा उनपर,
नादान ने खोला उन्हें कौतूहलवश,
पर कुछ नहीं पाया 'बाल-दिवस' पर. ...(वीरेंद्र)/2-134
 
रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी") 

Tuesday, 13 November 2012

2-133-"फ़िज़ूल रिवायतों से तंग

फ़िज़ूल रवायतों से तंग आ गए,
रस्मे-वफ़ादारी को तोड़ देंगे हम,
बहुत जी लिए हम उनके लिए,
खुद के लिए भी अब जियेंगे हम,
रकीब का नसीब देखा कमाल का,
दोस्त नहीं, रकीब ही अब बनेंगे हम,
कोसता है ज़माना हमें तो कोसले,
बहुत सुना,एक न अब सुनेंगे हम ,

दोस्त होकर भी अजनबी बन गए,
'अजनबी' ही अब बने रहेंगे हम......(वीरेंद्र)/3-133

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Friday, 9 November 2012

3-44-"अपनी नाकाम जिंदगी के लिए.

अपनी  नाकाम जिंदगी के लिए,
मै ज़माने को इलज़ाम नहीं देता, 
कोसता मै नसीब को नहीं,
और ना ही खुदा को दोष देता,

खुद ही हूँ कसूरवार मै,
नाकामियों के लिए, क्योंकि
ज़माने के साथ मै नहीं चलता,
कुछ चलने की कोशिश की भी,
तो वक्त के साथ नहीं बदलता,

थोडा बदला भी पर, ये ज़मीर,
छोड़ देता है देना साथ मेरा.
इब्तदा हुई थी जहाँ से वहीँ ,
लाकर मुझे है पटक देता,
मै खुदा, नसीब, ज़माने को
सच में, कोई इलज़ाम नहीं देता........(वीरेंद्र)/3-44

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Wednesday, 7 November 2012

0-329-"देखा देखी मै भी निकला बेचने.

देखा देखी मै भी निकला बेचने अपना दिल, मगर
मेरा दिल था बड़ा, उसका ज्यादा भाव नहीं आया,
एक जगह मुझे मिला भी कुछ अच्छा भाव मगर,
जिसका था मुझे इंतज़ार वैसा खरीदार नहीं आया ..(वीरेंद्र)/0-329

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-328-"बिक रहे थे चारों तरफ दिल.

बिक रहे थे चारों तरफ अफरा-तफरी में दिल ही दिल,
मैंने भी सीने पर पत्थर रखके बेच दिया मासूम दिल,
पैसे गिन रहाथा मै जोर से रोया मेरा बिका हुआ दिल,
मै भी रोया, पैसे वापस करके उठा लिया अपना दिल...(वीरेंद्र)/0-328

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")/ 1-223

0-333-"मै देखने गया दिलों की 'सेल'

मै देखने गया दिलों की 'सेल',
ढूँढा मेरे यार का जैसा दिल,
झटसे पूछी कीमत मैंने, पर,
दुकानदार बोला 'नोट फॉर सेल'...(वीरेंद्र)/0-333

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-111-"तूफ़ान तो जिंदगी के हो

तूफ़ान तो ज़िन्दगी के हो गए रफा-दफा सभी,
तुम भी तो हो जाओ मुहब्बत में संजीदा कभी...(वीरेंद्र)/1-111

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-268-"उनसे वादा कर लिया

उनसे वादा कर लिया, कभी गम-ज़दा न होंगे हम,
अब यह आलम है, गम छुपाके हँसते जा रहे हैं हम ..(वीरेंद्र)/1-268

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-269-"अब मालूम चला वो शख्स

अब मालूम चला वो शख्स कितना अहम् था,
उसके बिना जी सकता हूँ मै, ये मेरा वहम था...(वीरेंद्र)/1-269

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-272-"खुद ही सर पे लेलेते थे

खुद ही मांगके सर पर ले लेते थे ज़माने भर के गम,
अब ज़माने को आदत सी हो गई है हमें गम देने की...(वीरेंद्र)/1-272

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-104-"बिक रही है तो बिक जाने दे.

बिक रही है तो बिक जाने दे अपनी मुहब्बत को ऐ बेवफा,
कल मिले न मिले अच्छी कीमत, भरोसा क्या बाज़ार का...(वीरेंद्र)/1-104

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-195-" जुदा होने से पहले

जुदा होने से पहले, जो लिखे थे शेर मैंने, 
ये तो बता दे कि अब मै उनका क्या करूँ....(वीरेंद्र)/1-195

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-265-"क्या हुआ जू तमाम

क्या हुआ जो तमाम रात सो न सके, वो खफा होकर,
हमने भी तो कितनी ही रातें गुजारीं थी, यूं रो-रो कर ..(वीरेंद्र)/1-265

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-267-"कुछ खुशबुएँ बस बहती

कुछ खुशबुएँ बस, बहती हवाओं में रहा करती हैं,
मगर कुछ ऐसी भी हैं,  जो रूह में बसा करती हैं....(वीरेंद्र)/1-267

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-273-"जिंदगी कहाँ ले जायगी.

जिंदगी कहाँ ले जायगी, हमें मालूम नहीं,
अँधेरे छटेंगे कि बढ़ेंगे, ये भी मालूम नहीं,
हम तो चल पड़ें हैं ज़िन्दगी के पीछे-पीछे,
या तो कहीं सुबह हो जायगी या शाम कहीं...(वीरेंद्र)/0-273

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-301-"बहुत मुतमईन हूँ,

बहुत मुतमईन हूँ देख कर मै तेरा इन्साफ ऐ खुदा,
जिसने मांगी मौत, तूने उसे कर दी मुहब्बत अता,..(वीरेंद्र)/1-301

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-112-"ला इलाज दर्द-ऐ-गम

ला इलाज दर्द-ऐ-गम की शिफा तलाशते उम्र हो गई,
नासूर बनते चले गए ज़ख्म, जब इंतहा-ऐ-सब्र हो गई .(वीरेंद्र)/1-112


रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

0-044-"अक्सर एहसान महज़

अक्सर एहसान महज़ एहसान होते हैं,
पर कुछ-कुछ, एहसान-ओ-क़र्ज़ होते हैं,
पलते है वो ता-उम्र दिल-ओ-दिमाग में,
क्योंकि वो तो ला-ईलाज मर्ज़ होते हैं...(वीरेंद्र)/0-044

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-276-"क्या करूं इन खुशियों का

क्या करूं इन खुशियों का, ऐ खुदा, समझ में आता नहीं,
रख ले वापस इन्हें, दर्द अपनों का मुझसे सहा जाता नहीं...(वीरेंद्र)/1-276

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-113-"हम अपना हर गम उनसे

हम अपना हर गम उनसे छुपा लेते हैं, के हमें पता है,
उनको आदत है, बस खुशियों को ही गले लगाने की..(वीरेंद्र)/1-113

रचना : वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-056-"हमने सीखा था प्यार निभाना

हमने सीखा था प्यार निभाना अपनी जान देकर,
तूने खो दिया हमें दोस्त, हमारा इम्तिहान लेकर..(वीरेंद्र)/1-056

रचना : वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-148-"कभी न निकला धुंआ

कभी न निकला धुंआ, जब भी अपनों ने दिल जलाया है,
हर मर्तबा निकली है दुआ उनके लिए जलते हुए दिल से...(वीरेंद्र)/1-148

रचना : वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-310-"दिल केदर्द का खुद ही

दिल के दर्द का खुद ही सामाँ करता चला गया,
पत्थर को एहसासो-जज्बात सौंपता चला गया..(वीरेंद्र)/1-310

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-309-" मुहब्बत पाना नसीब वालों

मुहब्बत पाना नसीब वालों का काम है, मगर 
तेरी नफरत भी तो मुहब्बत का दूसरा नाम है..(वीरेंद्र)/1-309

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

1-006-"जान फूँक डाली अपनी,

जान फूँक डाली अपनी, शेरों में इस गरीब ने,
पर उन्हें पसंद आये शेर, जो लिक्खे रकीब ने..(वीरेंद्र)/1-006

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")