Sunday, 18 December 2011

0-022 मुहब्बत पर ज़िन्दगी

मुहब्बत पर ज़िन्दगी वार बैठे,
दिल हारे, उम्मीद भी हार बैठे,
यादों को भी अब क्या संजोना,
हसरतों को जब अपनी मार बैठे....(वीरेंद्र)/0-022 

रचयिता:  वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Saturday, 17 December 2011

2-111- "मै अंतर्मन था".

जीवन की व्यथाओं से होकर त्रस्त,
अपनी संवेदनाओं से पूर्णतः ग्रस्त,
लेकर आहत भावनाएं अपने संग,
मै जा रही थी हार कर एक जंग.

तुम कौन थे जिसने राह मेरी रोकी
अनजान राहगीर? या कोई परदेसी,
तुम्हारे मधुर वचन के वशीभूत हुई,
भूल गंतव्य, क्यों मन्त्र-मुग्ध हुई.

अब अपरिचित तुम कहाँ लुप्त हो गए,
मार्ग अवरूद्ध कर, स्वयं कहाँ खो गए,
पुकार,प्रश्न व्यर्थ हुए, बस स्वर आया,
"मै अंतर्मन था, तुझे था समझाने आया.   ....   ..(रचना: वीरेंद्र)

             .......रचयिता: वीरेंद्र.

Monday, 12 December 2011

2-49- "आ तुझे संवार दूं."


अरी ओ, चली कहाँ तू,
तनिक इधर तो आ देख,
मेरी नन्ही सी, प्यारी सी,
मेरी दुलारी सी 'ज़िन्दगी'.

कितनी मैली हो रही है,
आ तुझे ज़रा संवार दूं,
कितनी झल्ली दीख रही है,
बिखरे केश ज़रा काढ़ दूं.

मुंह भिनक रहा है,
थोडा श्रंगार दूं तुझे,
मुंह लटक रहा है,
कुछ निखार दूं तुझे.

चंचला इधर-उधर घूमकर,
अपना-मेरा वक्त नष्ट न कर,
तू क्या चाहती है बता दे,
मै भी क्या बैठूं बेफ़िकर.

काम पड़े हैं कितने घर में,
मुझे-तुझे ही निपटाने हैं,
आधा दिन यूँही निकल गया,
शेष आधा मत निकाल तू.

चल, जल्दी आ अब तो,
नाम मेरा खराब न कर,
लोग कहेंगे पगली तुझे,
मुझे भी कहेंगे मूरख.

तू खुद से पूछेगी एक दिन,
हर जगह सब लोग पूछेंगे,
क्या सीखा,क्या किया अबतक,
चल, मान जा, आ तुझे संवार दूं. .....(वीरेंद्र)

रचनाकार: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

Monday, 5 December 2011

2-6- मै नारी हूँ और....

मै नारी हूँ, और मानव भी हूँ,
प्रकृति ने मुझे पत्थर नहीं बनाया,
मानव-सुलभ सभी भाव-स्वाभाव दिए,
मानव से भिन्न रहने को नहीं कहा,

मै हंस सकती हूँ, झूम सकती हूँ,
मै खिलखिला सकती हूँ, ठहाका लगा सकती हूँ,
स्वछन्द रहकर खेलकूद कर सकती हूँ,
मै नारी हूँ, और मानव भी हूँ.

फूलों को आँखें देकर उनमे अश्रू भर दें क्या?
फूलों की महक छीन लें क्या?
फूलों को खिलने से रोक दें क्या?
फूलों को परदे में ठूंस दें क्या?
नहीं? तो नारी ने क्या बिगाड़ा है?

पक्षी के पंख काट देना क्या ठीक होगा?
पक्षी को कैद में रखना क्या ठीक होगा?
पक्षी की चहचहाहट रोक देना ठीक होगा?
कोयल की कू-कू बंद करना क्या ठीक होगा?
नहीं ना?, तो नारी पर आघात क्यों?

मेरी भागीदारी केवल मानवीय-कष्टों में ही क्यों?
मानवीय-सुखों और आनंदों में क्यों नहीं?
मै नारी हूँ, और मानव भी हूँ.                  ...............(वीरेंद्र)

           रचयिता:  वीरेंद्र

3-18- "ये मौत भी क्या चीज़ है"

ये मौत भी क्या चीज़ है, कितना सबको सताती है,
कभी बुलाए से आए नहीं, कभी बिन बुलाए आती है.

किसी पे है ये रहमदिल बहुत, किसी पे है बेरहम,
किसी को एकमुश्त तो किसी को किस्तों में आती है.

किसीने दुत्कारा किसीने माँगा, अपनी सहूलियत से इसे,
पर ये मानती नहीं, कभी वक्त पे, कभी बेवक्त आती है.

खाली रहते सभी कब्रिस्तान और ना होता कोई शमशान,
मौत टलती नहीं, वो टल भी जाए तो, पलट के आती है.

बैठा दो सख्त पहरे इस पर, कर लो चौकसी जितनी मर्ज़ी,
मौत कभी खुले आम,  तो कभी नींद में भी आती है.

जिंदा दिलों को मौत आती है बस एक ही बार, "वीरेंद्र"
 बुजदिलों को मगर,  यह ज़ालिम बार बार आती है.     

मौत देती है सिला सब इंसानों को जुदा-जुदा दुनियां में,
लेके जान ये, किसीको शहीद, किसीको 'कसाब' बनाती है.

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

                         रचियता:   वीरेंद्र

3-20- नज़म....डरता हूँ (पार्ट २)

खुदगर्ज़ हवाओं ने उड़ा दी मेरे आशियाने की छत,
अब मै उन हवाओं से नहीं, खुले आसमान से डरता हूँ.

ज़िन्दगी को मेरी बार बार झकझोरा है तूफानों ने,
अब मै तूफ़ान आने से नहीं, उसके इमकान से डरता हूँ.

कश्ती मझधार से महफूज़ निकली, साहिल पे आके लुटी,
अब मै मझधार जाने से नहीं, किनारे पे आने से डरता हूँ.

खायीं हैं मैंने ज़िन्दगी मै छोटी मोटी ठोकरें कई बार,
अब मै पहाड़ों से नहीं, छोटे छोटे पत्थरों से डरता हूँ.

कड़वाहट मुद्दत तक दूर ना हुईं उससे, बिना गुफ्तगू के,
अब मै गुफ्तगू से नहीं, उसकी ख़ामोशी से डरता हूँ.

बेगानों से रहा होशियार मै, धोखे अपनों से खाए हैं मैंने,
अब मै गैरों से नहीं, धोखे अपनों से खाने से डरता हूँ.

झरोखों से आती रोशनी तोड़ जाती है हसीं ख्वाब मेरे,
अब मै शाम होने से नहीं, सहर हो जाने से डरता हूँ.       ....(वीरेंद्र)/३-२० 

 रचना :  वीरेंद्र सिन्हा ("अजनबी")

3-19- नज़म....डरता हूँ

इंसानियत हो चुकी है आज फनाह इस कदर खूनखराबे में,
अब मै जंगली जानवरों से नहीं, खूंखार इंसानों से डरता हूँ.

इंसानियत के दुश्मन वहशियों के होंसले है इतने बुलंद,
कि अब मै खुदा से ज्यादा इन नाखुदाओं से डरता हूँ.

बेरहम दुनियां ने ज़ुल्मों-सितम किये इतने मुझ पर,
खुदकशी कर लेता मै, पर इल्जामे-बुजदिली से डरता हूँ,

दिलों से खेलने वालों ने तोडा दिल मेरा इतनी बार,
अब मै दिल के टूटने से नहीं, दिल लगाने से डरता हूँ,

चोट खाए दिल को इतनी मुश्किल से बचाया मैंने,
अब मै चोट खाने से नहीं, इलाजे- ज़ख़्म से डरता हूँ.

पाल रहा हूँ अपने मर्ज़ को जैसे तैसे मुफलिसी में, मै,
अब मै मर्ज़ से नहीं, मिजाजपुर्सी करने वालों से डरता हूँ.

सीने से लग जाने से उनके, एक सनसनी सी फैल जाती है,
अब मै उनके दूर जाने से नहीं, करीब आने से डरता हूँ.

खुशियाँ मिलीं जो, कीमत बड़ी चुकानी पड़ी  उनकी,
अब मै गम के आने से नहीं, किसी ख़ुशी आने से डरता हूँ.    ......: वीरेंद्र/३-19 

रचना: वीरेंद्र सिन्हा ('अजनबी')