Monday, 20 November 2017

2-548 उमीदें ही हमे मायूस

उम्मीदें ही हमे मायूस करती हैं,
मायूसी से ही उम्मीदें जगती हैं..(वीरेंद्र)/2-548


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-975 बेवफाओं के दिल कभी

बेवफाओं के दिल कभी तड़पा नहीं करते,
पत्थर मोम नहीं हैं वो कभी पिंघला नहीं करते..(वीरेंद्र)/1-975


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-974 मुहब्बत से डरने लगा

मुहब्बत से बहुत डरने लगा हूँ ,
कहीं कोई बेवफा न निकल जाय..(वीरेंद्र)/1-974


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-973 मेरे पास अब बची हैं

"मेरे पास अब बची हैं चंद सांसें,
क्यूँ न इन्हें भी तेरे ही नाम कर दूं"
रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"




1-972 खुश रहना है तो

खुश रहना है तो दूसरों को भी तो खुश रहने दो,
खुद अपना ली खामोशी, दूसरों को तो कुछ कहने दो.(वीरेंद्र)/1-972


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-971 बेशक आप थे बेवफा

बेशक आप थे बेवफा, पर आपके तेवर इतने चढ़े तो न थे,
दुआ सलाम भी बंद हो जाय, हम कभी इतने बुरे तो न थे..(वीरेंद्र)/1-971


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-970 शनासाई न रास आई

"शनासाई न रास आई कभी मुझे, 
अपनों ने ही बनाया अजनबी मुझे"

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"