Wednesday, 13 June 2018

2-576 आओ सियासी चोर लुटेरों

आओ सियासी चोर-लुटेरों, आपस में सब मिल जाएं,
घोट कर लोकतंत्र का गला, सब माल हज़म कर जाएं..(वीरेंद्र)/2-576


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-994 यूं तो बेवफा याद करने

यूं तो बेवफा याद करने के काबिल न था, मगर
इस दिल की ज़िद के आगे हम बेअख्तियार रहे..(वीरेंद्र)/1-994


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-575 चाल अजब हो गई

चाल अजब  हो गई, न दिन को चैन न रात को सकूं आए,
यूं लगे है ज़िन्दगी जड़ हो गई और सर पर पौधे उग आए..(वीरेंद्र)/2-575


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-574 गरीबों को लूटने वाले

गरीबों को लूटने वाले, सरकारी बंगलों में ऐश कर रहे हैं,
सरकारी संपत्ति देखो किस तरह से तहस नहस कर रहे हैं..(वीरेंद्र)/2-574


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Tuesday, 5 June 2018

2-582 लियाकत नज़रंदाज़ होती

लियाक़त नज़रअंदाज़ होती नहीं,
बंदा हुनरमंद होशियार चाहिए,
प्लेट में नोकरियाँ परोसी जाती नहीं,
पाने के लिए सही हक़दार चाहिए,.(वीरेंद्र)/2-582


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-993 इतनी भी न अख्तियार

इतनी भी न अख्तियार लो खामोशी कि हम भी बेजुबाँ हो जाएं,
इतनी भी न पाल लो अदावतें कि आप खुद ही पशेमाँ हो जाएं..(वीरेंद्र)/1-993


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-573 सत्तर साल किसानों

सत्तर साल किसानों का खून चूंस कर अब उनके मसीहा बन रहे हैं,
फिंकवा कर सड़क पे उनकी फसलें, सियासत के खलीफ़ा बन रहे हैं..(वीरेंद्र)/2-573

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"