Tuesday, 2 January 2018

2-552 इच्छाधारी भटक रहे थे

इच्छाधारी भटक रहे थे यत्र-तत्र सर्वत्र बौराय,
बलिहारी "अजनबी" की जिसने मंदिर-मार्ग दियो बताय..(वीरेंद्र)/2-552


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-979 मै तनहा का तनहा

मैं तन्हा का तन्हा रहा, इस ज़माने में,
निकला भी तो एक वीराने से दूसरे वीराने में..(वीरेंद्र)/1-979


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-978 जाहिद शराब पीने दे

ज़ाहिद शराब पीने दे, ज़रा आराम से बैठ कर,
मयकशी पे पाबंदी इंसां ने लगाई है, खुदा ने नहीं..(वीरेंद्र)/1-978


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-977 मेरे आंसुओं, तुम

मेरे आंसुओं, तुम अब सूख क्यों नहीं जाते,
वो था तुम्हारा कभी, यह भूल क्यों नहीं जाते।
रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-614 क्यों बहे जाते हो

क्यों बहे जाते हो मेरे आंसुओं, थम क्यों नहीं जाते,
गर्माहट खत्म हो गई मेरे रिश्तों, जम क्यों नहीं जाते,
जाते-जाते ही, जाते हैं ज़ख्मो के निशाँ ऐ "अजनबी",
मुझसे अब ये न पूछो, वो एक दम क्यों नहीं जाते..(वीरेंद्र)/0-614


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-976 मै मदहोश हूँ अपनी

मैं मदहोश हूँ अपनी यादों में,
यकीं करो मैं नहीं गया मैखानों में..(वीरेंद्र)/1-976


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Sunday, 24 December 2017

edit 2-558

धर्मनिरपेक्षों और नास्तिकों को हिन्दू बनवा दिया,
राम को नकारने वालों को मंदिरों का चक्कर लगवा दिया,
इन चुनावों में है ये कैसी अलौकिक दैविक शक्ति,
कि कुछ लोगों को स्वेच्छा से धर्म-परिवर्तन करवा दिया.
"अजनबी"