Sunday, 1 October 2017

2-539 You are mine from

You are mine from toe to head,
I am truly yours from A to Z,
Before I miss you for a minute,
Believe, I am completely dead..(वीरेंद्र)/2-539


रचना; वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-954 मेरे ये मामूली से शेर

मेरे ये मामूली से शेर ग़ज़ल हो जाते,
अगर महफ़िल में कभी तुम आ जाते..(वीरेन्द्र)/1-954

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Monday, 25 September 2017

0-610 यूं तो बहुत तनहा है

यूं तो बहुत तन्हा है इंसाँ मगर,
मर ही जाता, गर यादों का सहारा न होता।
बड़े बे-रहम हैं ये दरिया रंजो-गम के,
कौन लड़ता इनसे गर इनका किनारा न होता।/0-610


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Sunday, 24 September 2017

1-953 मै आगे आगे बढ़ता ही

मैं आगे आगे बढ़ता ही गया, क्यों मै रुका नहीं,
वहाँ दरियाऐ इश्क था, मुझे पता कैसे लगा नहीं..(वीरेंद्र)/1-953


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-538 कुछ निशाचरों की शाम

कुछ निशाचरों की शाम, रात ग्यारह बजे के बाद होती है,
मैं हैरान हूँ सोच कर, उनकी कब सुबह कब रात होती है।..(वीरेंद्र)/2-538


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Tuesday, 12 September 2017

2-537 मोटी चमड़ी वाले का इलाज

मोटी चमड़ी वाले का इलाज कोई नीम क्या करेगा,
खोटी हो नीयत तो इलाज कोई हकीम क्या करेगा..(वीरेंद्र)/2-537


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-952 काश असल में भी

काश असल में भी होते उतने ही अच्छे लोग,
तस्वीरों में दिखाई देते हैं जितने अच्छे लोग..(वीरेंद्र)/1-952


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"