Sunday, 24 September 2017

1-953 मै आगे आगे बढ़ता ही

मैं आगे आगे बढ़ता ही गया, क्यों मै रुका नहीं,
वहाँ दरियाऐ इश्क था, पता मुझे कैसे लगा नहीं..(वीरेंद्र)/1-953


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-538 कुछ निशाचरों की शाम

कुछ निशाचरों की शाम, रात ग्यारह बजे के बाद होती है,
मैं हैरान हूँ सोच कर, उनकी कब सुबह कब रात होती है।..(वीरेंद्र)/2-538


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Tuesday, 12 September 2017

2-537 मोटी चमड़ी वाले का इलाज

मोटी चमड़ी वाले का इलाज कोई नीम क्या करेगा,
खोटी हो नीयत तो इलाज कोई हकीम क्या करेगा..(वीरेंद्र)/2-537


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-952 काश असल में भी

काश असल में भी होते उतने ही अच्छे लोग,
तस्वीरों में दिखाई देते हैं जितने अच्छे लोग..(वीरेंद्र)/1-952


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-536 चाहे अपने मुल्क में,

चाहे अपने मुल्क में, मैं महफूज़ नहीं, तकलीफों के बगैर नहीं,
फिरभी मुल्क मेरा है,मेरे खानदान का है, किसी गैर का नहीं।


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

0-609 अपने ख्यालों को ज़हनियत

अपने ख्यालों को ज़हनियत दो,
रिश्ते-नातों को अहमियत दो,
खुद जैसे भी हो ठीक हो मगर 
अपनी औलादों को तरबियत दो..(वीरेंद्र)/0-609


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Friday, 8 September 2017

1-951 ये मेरा ही वहम है

ये मेरा ही वहम हैं, जो मुझे इस शहर में सता रहा है,
वर्ना यहाँ कौन है मेरा,जो "अजनबी" को बुला रहा है.(वीरेंद्र)/1-951

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"