Saturday, 12 August 2017

2-535 सारी दुनियां सोई होती है

सारी दुनिया सोई होती है, तब भी सूरज काम करता रहता है,
मौसम के कुफ्र में भी सरहद पर जवान काम करता रहता है...(वीरेंद्र)/2-535


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-535 मदारी बन जाऊंगा

मदारी बन जाऊंगा, गद्दार 'अंसारी' न बनूंगा,
बेगारी भले ही बन जाऊंगा 'अंसारी' न बनूंगा,
मुल्क से मैंने इज़्ज़त शोहरत दौलत सब पाया,
भिखारी भले ही बन जाऊं, 'अंसारी' न बनूंगा..(वीरेंद्र)/2-535


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-540 बूढ़े बकरे

बूढ़े बकरे जैसी शकल, 
फ्रांसीसियों  की नकल, 
ज़ुबाँ पर गिरा फालिज,
भैंस से बदतर अकल, 
नाशुकरा फैलाए घ्रणा, 
अमन-चैन में दे दखल,
जाने दो यारों उसे तुम,
सठियाया है दरअसल..(वीरेंद्र)/2-540


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी

1-949 देखके तुझे कभी कभी

देखके तुझे कभी कभी यूं लगा है ज़िन्दगी,
मुझसे यकीनन तुझे कोई गिला है ज़िन्दगी..(वीरेंद्र)/1-949


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Sunday, 6 August 2017

2-532 आज तलक इतने साल

आज तलक इतने साल हो गए,
जैसे साल नहीं कई युग हो गए,

इस बीच बहुत लोग मिले,मगर,
कुछ खास जाने कहाँ खो गए..(वीरेंद्र)/2-532


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-948 ज़ख्मों को अपने जब

ज़ख्मों को अपने जब कभी हवा दी,
हर बार ही एक नई ग़ज़ल उभर आई..(वीरेंद्र)/1-948


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-534 देश के गद्दारों को

देश के गद्दारों को ठिकाने लगवा दो यार!
कभी तो इस बात का भी फतवा दो यार!..(वीरेंद्र)/2-534


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"