Sunday, 18 February 2018

2-561 ये माना कि दुनियांदारी

ये माना कि दुनियांदारी को लात मार देनी चाहिए,
मगर अपने ज़िंदा होने की खबर तो देते रहनी चाहिए..(वीरेंद्र)/2-561


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" 

2-569 मेहनत हुई वसूल

मेहनत हुई वसूल हमारी तुम्हारी,
लगाए थे जो पौधे, दरख़्त हो गए,
वर्ना कौन करता भरपाई उनकी,
सूख के शजर जो रुखसत हो गए.(वीरेंद्र)/2-569


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Saturday, 10 February 2018

1-987 तुम खुशबू हो, महकती हो

तुम खुशबू हो, महकती हो बस तब तक,
बनके हवा, मैं महकाता रहूँ  तुमको जब तक..(वीरेंद्र)/1-987

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

1-986 वफ़ा की कोई उम्मीद नहीं

वफ़ा की कोई उम्मीद नहीं उनसे,
ज़ख्म देते हैं, यही एहसान है उनका..(वीरेंद्र)/1-986

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Friday, 9 February 2018

2-568 इतनी सीख, मुफ्त सलाह

इतनी सीख, मुफ्त सलाह-मशविरे रोज़ मुझे मिल जाते हैं,
सोचता हूँ इस जहाँ में इंसानियत भाईचारा अभी बाकी है.
हर दिन सुबह-सुबह सोच कर फिक्र में मै पड़ जाता हूँ,
सारी दुनियां तो सुधर चुकी, बस मेरा ही सुधरना बाकी है..(वीरेंद्र/2-568

रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

Wednesday, 7 February 2018

2-560 वो ही मेरा महबूब है

वो ही मेरा महबूब है,उसी से मेरा वजूद है,
वही है दुनिया मेरी,,वही मंज़िलें मकसूद है..(वीरेंद्र)/2-560


रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"

2-559 नौकरी पदोन्नति पक्की

नौकरी पदोन्नति पक्की फिर क्यों पढ़के दिमाग खपाने का,
कर्ज़ा माफी पक्की, फिर क्यों मुद्दल और ब्याज चुकाने का,
वोट बैंक वालों तुष्टिकरण का फायदा तुम उठाते रहो,
बस असंगठित मध्यम वर्ग ने लेलिया ठेका टेक्स चुकाने का..(वीरेन्द्र)/2-559
रचना: वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"